शनि है राजा!!!

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व्याख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनिदेव ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा। राजा दशरथ ने विधिवत स्तुति कर उन्हे प्रसन्न किया। पदम पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है।
ब्रह्मैर्वत पुराण में शनिदेव ने जगत जननी माँ पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मो तक जातक की करनी (कर्मो) का फल भुगतान करता हूँ। एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनिदेव से पूंछा कि तुम क्यों मनुष्यों को दारूण दु:ख देते हो, क्यों सृष्टि के सभी जीव तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं तो शनिदेव ने उत्तर दिया कि ”मातेश्वरी, इसमें मेरा किंचित भी कोई दोष नहीं है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है तो उसे दंडित करना मेरा कर्म है।
एक आख्यान और मिलता है कि किस प्रकार से ऋषि अगस्तय् ने जब शनिदेव से प्रार्थना की थी तो उन्होंने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी। जिस किसी ने भी अन्याय किया, उनको ही उन्होंने दंड दिया। चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों, जिन्होंने सीता का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया अथवा सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र रहे हों, जिनके दान देने के अभिमान के कारण उन्हें बाजार में बिकना पड़ा और शमशान की रखवाली तक करनी पड़ी। राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये जिनके तुच्छ पापकर्मों की सजा के लिये उन्हें दर-दर का होकर भटकना पड़ा। फिर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा, वाचा, कर्मणा, पापकर्म कर दिया जाता है वह चाहे जानबूझकर किया गया कर्म हो अथवा अनजाने में, उसे उस किए गये कर्म का भुगतना तो करना पड़ेगा ही।
मत्स्य पुराण में शनि देव का शरीर इन्द्र कांति की नीलमणि जैसा बताया गया है। वे गिद्ध पर सवार है, हाथ मे धनुष बाण है। एक हाथ से वर मुद्रा भी है। शनिदेव का विकराल रूप जहाँ पापियों के लिए भयावह हैं, वहीं सज्जनों के लिए उनकी वर मुद्रा अभय एवं सुख देने वाली है। कर्माधीश होने के नाते शनिदेव पापियों के लिये हमेशा ही संहारक हैं।
शनि मुख्य रूप से शारीरिक श्रम से संबंधित व्यवसायों तथा इनके साथ जुड़े व्यक्तियों के कारक होते हैं जैसे कि श्रम उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक, इमारतों का निर्माण कार्य तथा इसमें काम करने वाले श्रमिक, निर्माण कार्यों में प्रयोग होने वाले भारी वाहन चलाने वाले चालक तथा इमारतों, सड़कों तथा पुलों के निर्माण में प्रयोग होने वाली मशीनरी और उस मशीनरी को चलाने वाले लोग। इसके अतिरिक्त शनि जमीन के क्रय-विक्रय के व्यवसाय, इमारतों को बनाने या बना कर बेचने के व्यवसाय तथा ऐसे ही अन्य व्यवसायों, होटल में वेटर का काम करने वाले लोगों, द्वारपालों, भिखारियों, अंधें, लंगड़े व्यक्तियों, कसाईयों, लकड़ी का काम करने वाले लोगों, नेताओं, वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, अनुसंधान क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, इंजीनियरों, न्यायाधीशों, पराशक्तियों का ज्ञान रखने वाले लोगों तथा अन्य कई प्रकार के क्षेत्रों तथा उनसे जुड़े व्यक्तियों के कारक होते हैं।
शनि मनुष्य के शरीर में मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा ज्योतिषियों का एक वर्ग इन्हें तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इन्हें पुरुष ग्रह मानता है। तुला राशि में स्थित होने से शनि को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है तथा इस राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि भी कहा जाता है। तुला के अतिरिक्त शनि को मकर तथा कुंभ में स्थित होने से भी अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जो शनि की अपनी राशियां हैं। शनि के प्रबल प्रभाव वाले जातक आमतौर पर इंजीनियर, जज, वकील, आईटी क्षेत्र में काम करने वाले लोग, रिएल एस्टेट का काम करने वाले लोग, पराशक्तियों के क्षेत्रों में काम करने वाले लोग तथा शनि ग्रह के कारक अन्य व्यवसायों से जुड़े लोग ही होते हैं। शनि के जातक आमतौर पर अनुशासित, मेहनती तथा अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखने वाले होते हैं।
शनि पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव जातक को जोड़ों के दर्द, गठिया, लकवा, हड्डियों से संबंध्ति बीमारियों से पीडि़त कर सकता है। कुंडली में शनि पर किन्ही विशेष ग्रहों का प्रबल प्रभाव सामान्य सेहत तथा आयु पर भी विपरीत प्रभाव डाल सकता है।

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