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Category: ग्रह विशेष

आर्द्रा नक्षत्र

वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से आर्द्रा नक्षत्र को छठा नक्षत्र माना जाता है। आर्द्र का शाब्दिक अर्थ है नम तथा आर्द्रा का शाब्दिक अर्थ है नमी और इस नमी को विभिन्न वैदिक ज्योतिषी भिन्न भिन्न…

क्या आप बच्चे के अति आक्रामकता से परेशान है?

 किसी जातक की प्रकृति अथवा उसका मूलभूत व्यवहार उसके जन्म के समय से ही निर्धारित हो जाता है। कुछ गंभीर किस्म के तो कुछ लगातार क्रियारत रहने की प्रवृत्ति वाले होते हैं। अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी जैसी प्रसिद्धि तो दिलाना चाहते हैं किंतु…

आकस्मिक हानि से संबंधित ज्योतिष कारक

 व्यक्ति के जीवन में कई बार आकस्मिक हानि प्राप्त हेाती है साथ ही कई बार योग्यता तथा सामथ्र्य होने के बावजूद जीवन में वह सफलता प्राप्त नहीं होती, जिसकी योग्यता होती है। इस प्रकार का कारण ज्योतिषषास्त्र द्वारा किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रथम, द्वितीय,…

आपका हस्ताक्षर और आपका व्यक्तित्व

1. जो व्यक्ति हस्ताक्षर में अक्षर नीचे से ऊपर की ओर जाते हैं तो वह ईश्वर पर आस्था रखने एवं आशावादी और साफदिल के रहते हैं, लेकिन इनका स्वभाव झगड़ालू रहता है। 2. जो लोग बिना पेन उठाए एक ही बार में पूरा हस्ताक्षर करते हैं वह रहस्यवादी, लडाकु और…

आपकी कुंडली में दशम स्थान और राशियों का हाल

किसी भी जातक की कुंडली में चार केंद्र स्थान प्रथम, चतुर्थ, सप्तम व दशम भाव होता है। दशम भाव कर्म भाव भी कहलाता है। अतः जातक के जीवन में इसका विशेष प्रभाव होता है। कुंडली में दशम घर से कर्म, आत्मविश्वास, आजीविका, करियर, राज्य प्राप्ति, कीर्ति, व्यापार, पिता का सुख,…

क्यों महत्वपूर्ण है ग्रह दषाओं का विष्लेषण –

किसी भी जातक के जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अलावा उसके ग्रह दषाओं के अनुरूप उसका व्यवहार तथा कर्म निर्धारित होता है… जिसके कारण कुंडली के विष्लेषण के समय उस जातक के ग्रह दषाओं का असर उसके जीवन मे महत्वपूर्ण होता है… चूॅकि इंसान के जीवन में ग्रहो…

चंद्रोदय- मीन राशि में चंद्रमा का उदय और मानसिक अशांति का कारक-

आधुनिक भागदौड़ के इस जीवन में प्रायः सभी व्यक्तियों को चिंता सताती रहती है। हर आयुवर्ग तथा हर प्रकार के क्षेत्र से संबंधित अपनी-अपनी चिंता होती हैं। चिंता को भले ही हम आज रोग ना माने किंतु इसके कारण कई प्रकार के लक्षण ऐसे दिखाई देते हैं जोकि सामान्य रोग…

शनि का असर- प्रेम विवाह का होना

सृष्टि के आरंभ से ही नर और नारी में परस्पर आकर्षण विद्यमान रहा है, जिसे प्राचीन काल में गंर्धव विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त थी। आज के आधुनिक काल में इसे ही प्रेम विवाह का रूप माना जा सकता है। इस विवाह में वर-वधु की पारस्परिक सहमति के अतिरिक्त…

शुक्र का प्रभाव – ऐष्वर्या में वृद्धि या कैरियर में बाधक?-

ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रमुखता प्राप्त है। कालपुरूष की कुंडली में शुक्र ग्रह दूसरे अर्थात् संपत्ति एवं सुख तथा सप्तम स्थान अर्थात् पार्टनर का स्वामी होता है। शुक्र ग्रह सुख, संपत्ति, प्यार, लाभ, यष, क्रियात्मकता का प्रतीक है। शुक्र ग्रह की उच्च तथा अनुकूल स्थिति में होने पर…

क्यों हो जाता है कोई आक्रामक – मंगल की शांति से पायें राहत –

भारतीय वैदिक ज्योतिष में मंगल को मुख्य तौर पर ताकत और आक्रमण का कारक माना जाता है। मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक आमतौर पर दबाव से ना डरने वाले तथा अपनी बात हर प्रकार से मनवाने में सफल रहते हैं। मंगल से मानसिक क्षमता, शारीरिक बल और साहस वाले…

बच्चों की छः आदतें और असफलता

यदि गुरू या शुभ ग्रह लग्न में अनुकूल हो तो व्यक्ति को स्वयं ही ज्ञान व आध्यात्म के रास्ते पर जाने को प्रेरित करता है। यदि इसपर पाप प्रभाव न हो तो व्यक्ति स्व-परिश्रम तथा स्व-प्रेरणा से ज्ञानार्जन करता है। अपने बड़ों से सलाह लेना तथा दूसरों को भी मार्गदर्षन…

शनि का असर- प्रेम विवाह का होना

सृष्टि के आरंभ से ही नर और नारी में परस्पर आकर्षण विद्यमान रहा है, जिसे प्राचीन काल में गंर्धव विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त थी। आज के आधुनिक काल में इसे ही प्रेम विवाह का रूप माना जा सकता है। इस विवाह में वर-वधु की पारस्परिक सहमति के अतिरिक्त…

शुक्र की दषा का फल – सुख तथा समृद्धि का प्रारंभ –

  ज्योतिषिय विज्ञान में व्यक्ति को सुख तथा समृद्धि प्रदान कर्ता ग्रह शुक्र को माना जाता है। यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र क्रूर स्थान पर हो तो उसे शुक्र की दषा में विषेष लाभ प्राप्त होता है किंतु यदि शुक्र राहु या सूर्य से आक्रांत हो तो उसके…

कुशल प्रबंधन में सहायक ग्रह

जितनी सूक्ष्मता प्रबंधन विषय में आवश्यकता होती है, उससे कहीं अधिक बारीकियों और सूक्ष्म गणनाओं का विषय है-कुंडली विवेचन। कुशल प्रबंधन मानवीय श्रम के बेहतरीन संयोजन और कुशलतम व्यवस्थापन का नाम है। इसी प्रकारकुंडली की विवेचना भी सूक्ष्मतम गणनाओं और व्यापक अनुभव का फलितार्थ है। इन दोनों का तालमेल और…

चरावेती-चरावेती प्रचलाम्ह निरंतरम् – केतु के अधीन पौरूष्र्य –

निरंतर चलायमान रहने अर्थात् किसी जातक को अपने जीवन में निरंतर उन्नति करने हेतु प्रेरित करने तथा बदलाव हेतु तैयार तथा प्रयासरत रहने हेतु जो ग्रह सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है, उसमें एक महत्वपूर्ण ग्रह है केतु। ज्योतिष शास्त्र में राहु की ही भांति केतु भी एक छायाग्रह है तथा…

ग्रह दषाओं के अनुकूल फल प्राप्ति का स्वरूप-

प्रत्येक ग्रह कुछ विकिरण बल या शक्तिबल का केंद्र होता है। ग्रहों के इस विकिरण का संसार के सभी जीवों द्वारा अपनी क्षमता के अनुपात में ग्रहण किया जाता है। उन पर ग्रहों के बल का प्रभाव पड़ेगा जरूर पर कितना पड़ता है यह उनकी अपनी ग्रह स्थिति पर निर्भर…

तात्कालिक लाभ हानि – चंद्रमा के विपरीत प्रभाव शांति हेतु उपाय –

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को प्रमुख स्थान दिया गया है तथा माना गया है कि चंद्रमा मन का कारक होता है। चूॅकि किसी मानव के जीवन में उसकी सफलता तथा असफलता का बहुत बड़ा कारण उसका मन होता है अतः यदि कोई व्यक्ति सफल है या असफल इसका बहुत…

शुक्र से जीवन हो सुखमय

सौरमंडल से आने वाली किरणें खास कर शुक्र से आने वाली किरणें मनुष्य के व्यक्तित्व व दांपत्य जीवन में गाहे-वगाहे अनेक प्रभाव डालती हैं। व्यक्ति को वैवाहिक जीवन का सुख न मिल पाए, पति-पत्नी के संबंधों मेंं मधुरता न रहे या दोनों मेंं से किसी की कमी उनकी इच्छा की…

देता है गुरु भाव बृहस्पति

खगोलशास्त्रीय विवरण: बृहस्पति लघु ग्रहों की झुण्ड से परे है। सूर्य से इसकी दूरी 500मिलियन मील है और यह हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। इसका व्यास 88,000 मील है जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 12 गुना है। यह सूर्य का एक चक्कर लगभग 12 सालों में…

निरंतर बदलाव हेतु प्रयास – केतु की दषा –

निरंतर चलायमान रहने अर्थात् किसी जातक को अपने जीवन में निरंतर उन्नति करने हेतु प्रेरित करने तथा बदलाव हेतु तैयार तथा प्रयासरत रहने हेतु जो ग्रह सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है, उसमें एक महत्वपूर्ण ग्रह है केतु। ज्योतिष शास्त्र में राहु की ही भांति केतु भी एक छायाग्रह है तथा…

शनि प्रभाव -दबंगता तथा आत्मनिर्भरता

सृष्टि के आरंभ से ही नर और नारी में परस्पर आकर्षण विद्यमान रहा है, जिसे प्राचीन काल में गंर्धव विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त थी। आज के आधुनिक काल में इसे ही प्रेम विवाह का रूप माना जा सकता है। इस विवाह में वर-वधु की पारस्परिक सहमति के अतिरिक्त…

ग्रहों की दशा और मनुष्य का स्वास्थ्य

आधुनिक युग में अधिकांश मनुष्य चिंता, उन्माद, अवसाद, भय आदि से प्रभावित है। मनोविज्ञान में इन्हें मनोरोगों के एक प्रकार मनस्ताप (न्यूरोटाॅसिज्म) के अंतर्गत रखा गया है। मनस्ताप यद्यपि एक साधारण मानसिक विकार है, किंतु इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएॅं उत्पन्न होती हैं। मनस्ताप यद्यपि एक साधारण मानसिक विकास है,…

कुंडली में केतु का प्रभाव

केतु एक रूप में राहु नामक ग्रह के सिर का धड़ है। यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था। यह एक छाया ग्रह है। माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है। केतु को प्राय:…

शनि है राजा!!!

आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनिदेव ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा। राजा दशरथ ने विधिवत स्तुति कर उन्हे प्रसन्न किया। पदम पुराण में इस…

सप्तम भाव के ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति से बाधित वैवाहिक जीवन

सप्तमभाव लग्न कुंडली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न से सातवाॅ भाव ही दांपत्य व विवाह का ग्रह माना जाता है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ स्थिति ग्रहों की स्थिति और दृष्टि संबंध के अनुसार जातक का वैवाहिक जीवन के सुख-दुख का निर्धारण किया जाता…

सप्तमस्थ शनि से प्रभावित वैवाहिक जीवन

सप्तम भाव में यदि शनि स्थित होता है तो जातक का विवाह में विलंब व बाधा का संकेत माना जाता है। यदि सप्तम भाव में षनि हो तो या सप्तमेष से युक्त शनि हो तो जातक का वैवाहिक जीवन पारिवारिक सदस्यों के कारण बाधित होता है। वहीं पर यदि शनि…

कुशल प्रबंधन में सहायक ग्रह

जितनी सूक्ष्मता प्रबंधन विषय में आवश्यकता होती है, उससे कहींअधिक बारीकियों और सूक्ष्म गणनाओं का विषय है- कुंडली विवेचन।कुशल प्रबंधन मानवीय श्रम के बेहतरीन संयोजन और कुशलतमव्यवस्थापन का नाम है। इसी प्रकार कुंडली की विवेचना भी सूक्ष्मतमगणनाओं और व्यापक अनुभव का फलितार्थ है। इन दोनों का तालमेलऔर सामंजस्य कुल मिलाकर…

कुंडली में ग्रहों का ज्ञान तथा उनक उपयोगिता

प्राचीन भारतीय साहित्य तथा विचार अनुसार प्रत्येक ग्रह की अपनी एक दिषा निर्धारित है जोकि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी सच साबित हुई है। माना जाता है कि प्रत्येक ग्रह की अपनी एक उॅर्जा होती है उसी के अनुरूप उसकी दिषा तय करते हैं। सूर्य के लिए पूर्व दिषा निर्धारित है…

नक्षत्रों का स्वाभाव और क्या करें

नक्षत्र संख्‍या में 27 हैं और एक राशि ढाई नक्षत्र से बनती है। नक्षत्र भी जातक का स्वभाव निर्धारित करते हैं———– 1. अश्विनी : बौद्धिक प्रगल्भता, संचालन शक्ति, चंचलता व चपलता इस जातक की विशेषता होती है। इस नक्षत्र में वाहन खरीदना,यात्रा,शुभ हे…. नए वस्त्र धारण से सुख की प्राप्ति…

अपने कुंडली में कैसे करें मंगल को कैसे बनाएँ अनुकूल

कोई भी व्यक्ति चाहे वह लड़की हो या लड़का, सबसे पहले आँखों के माध्यम से फीजिकल ब्यूटी की ओर एट्रैक्ट होता है। उसके बाद म्युचअल अंडरस्टैंडिंग यानी कि वैचारिक समानता और फिर सहन-सहन की समानता। परंतु क्या शादी के बंधन के लिए मात्र सुंदर शरीर और वैचारिक या रहन-सहन की…