Home Articles जिज्ञासा
जिज्ञासा

जहां बरसते हैं कोड़े: अंधविश्वास

जहां बरसते हैं कोड़े: अंधविश्वास

हम बहुत सी परम्पराओं, अंधविश्वासों को बिना कुछ विचार किये ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते हैं. यह भी नहीं देखते कि आज के परिपेक्ष्य में इसकी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं इसके पीछे कोई तर्क संगत आधार है कि नहीं. कहीं अंधविश्वास का तो हम अनुपालन नहीं कर रहे हैं. हमारी बहुत सी मान्यताएं विज्ञान/आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं.यह हमारी बेडय़िाँ बन जाती हैं. समाज के विकास और प्रगति के लिए इन बेडिय़ों को तोड़ देना ही बेहतर होगा. एक गतिशील समाज को अपनी मान्यताओं / परम्पराओं की सार्थकता पर निरंतर विचार करते रहना चाहिए. जो मान्यताएं समय के अनुरूप हों, समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हों, उन्हें ही स्वीकृति मिलनी चाहिए आधारहीन परम्पराएं किस प्रकार अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं।

रायसेन मुख्यालय के समीपस्थ ग्राम बनगंवा में कई पीढिय़ों से एक अनूठी परंपरा चली आ रही है। जिसमें 25 फीट ऊपर खंबे पर बकरे को बांधकर 144 बार गोल घुमाया जाता है। इसके बाद ग्रामीण ही दोनों ओर निकली रस्सी पर दाएं-बाएं झूला झूलते हैं। फिर इन व्यक्तियों पर कोड़ा बरसाया जाता है। यह अनूठी परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

आप इस लेख का आधा भाग पढ़ चुके हैं

आगे पढ़ने के लिए लॉगिन करें। खाता बनाना पूरी तरह निःशुल्क है – Google या मोबाइल OTP से, एक मिनट में।

लॉगिन करें और आगे पढ़ें नया यूज़र? निःशुल्क खाता बनाएँ

क्या आपके जीवन में कोई प्रश्न है?

अनुभवी ज्योतिषियों से कुंडली, विवाह, करियर और वास्तु पर व्यक्तिगत परामर्श लें।

अभी परामर्श लें