जिज्ञासा

विकृतिजन्य व्यक्तित्व

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व्यक्तित्व विकृति अत्यन्त गहराई तक बैठे हुए कुसमायोजित। व्यवहारों का वह संरूप है जो प्राय: किशरोवस्था या इसके पूर्व दिखाई देता है, अधिकांशत: प्रौढावस्था में बना रहता है . यद्यपि मध्यावस्था एवं वृद्धावस्था में कम दिखाई देता है। विकृतिजन्य व्यक्तित्व अपने अवयवों के सन्तुलन और उनकी अभिव्यक्ति में असामान्य होता है परिणामस्वरूप न केवल वह व्यक्ति बल्कि पूरा समाज उससे प्रभावित होता है।

विकृतिजन्य व्यक्तित्व की साधारण तौर पर निम्नलिखित विशेषताएँ होती है
1.असमाजिकता-ड़न व्यक्तियों में सामाजिक व्यवहारों की कमी पाई जाती है। सामजिक परम्पराओं और मर्यादाओं का ये सम्मान करने नहीं जानते और न ही कानून के प्रति इनमें आदर होता है। सामाजिक प्रतिष्ठा एल यज्ञा के इन्हें परवाह नहीं होती। समाज के अन्य व्यक्तियों से सहयोग का इनमें अभाव रहता है। इनका संबंधसमाजविरोधी कार्यों से भी होता है। सामाजिक अवसरों अथवा उत्सवों में ये सम्मिलित नहीं होते। ये दूसरों की भलाई को ध्यान में रखे बिना ऐसे कार्यों में संलग्न रहते है जो उनके स्वार्थ से प्रेरित होते है।
2. आवश्यकताओं और क्रियाओं में असमानता -विकृतिजन्य व्यक्तित्व वाले अपनी आवश्यकताओं के प्रति समायोजनात्मक दृष्टिकोणा नहीं रखते और न ही उनकी पूर्ति के लिए समुचित व्यवसाय करते है। ये छोटी-छोटी कठिनाइयों या विफलताओं यर घबडा जाते है। कठिनाइयों के सामने ये अपना साहस खो बैठते है।
3. कुससमायोजनात्मक व्यवहार -एक सामान्य व्यक्ति अपने व्यवहार को समय तथा परिस्थिति के अनुरूप समायोजित करते हुए कार्यं करता है। सुखद स्थितियों में सुख के और दुखद स्थितियों म दुख के भाव प्रकट करता है परन्तु विकृतिजन्य व्यक्तित्व में व्यवहार का कुससमायोजनात्मक पक्ष दिखलाई देता है। ये समय और परिस्थिति का ध्यान रखे बिना आचरण करते हैँ। जीवन की विभिन्न दबावपूर्ण परिस्थितियों में ये अपना समायोजन बनाए रखने में असफल होते हैं।
4. असुरक्षा की भावना -ये व्यक्ति जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में समायोजन नहीं कर पाते इसलिए इनके अन्दर सदैव असुरक्षा की भावना विद्यमान स्मृती है। ये बिना किसी कारण के ही अपने को असुरक्षित अनुभव करते है।
5. अवास्तविक जीवन लक्ष्य -सामान्य एवं संतुलित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति अपने जीवन लक्ष्यों का निर्धारण अपनी क्षमताओं तथा सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप रखते है तथा इनकी प्राप्ति के लिए समुचित उपाय करते है परन्तु विकृतजन्य व्यक्तित्व वाले व्यक्ति अपनी सामर्थ, योग्यता तथा क्षमता से बाहर अपने लक्ष्य निर्धारित करते है।
6. अनुपयुक्ता-इन व्यक्तियों का व्यवहार समय, स्थान, व्यक्ति एवं परिस्थिति के लिए उपयुक्त नहीं होता। इनके व्यवहार में अस्वाभाविकता दृष्टिगोचर होती है अथवा स्वाभाविकता के नाटक के झलक होती है। कई कार व्यक्ति स्वय को विभिन्न परिस्थितियों में अनुपयुक्त गाता है । अनुपयुक्ता की यह भावना उसके व्यक्तित्व को कुसमयोजित करती है।

विकृतजन्य व्यक्तित्व को उसके लक्षणों की गंभीरता के आघार पर दो वर्गों में रखा जा सकता है
1 अल्प गंभीर व्यक्तित्व विकृति
2 मध्यम गंभीर व्यक्तित्व विकृति
इससे अधिक गंभीर व्यक्तित्व विकृति को मानसिक रोगों के अन्तर्गत रखा जाता है।
1.अल्प गंभीर व्यक्तित्व विकृति-व्यक्तित्व विकार की इस श्रेणी के अन्तर्गत ये व्यक्ति आते है जो सामान्य से अधिक विचलित नहीं होते। इनके लक्षणों में भी गंभीरता कम होती है अर्थात् ये अल्प मात्रा में और कम समय के लिए विद्यमान होते है। अल्प गभीर व्यक्तित्व विकृति के अन्तर्गत आत्मप्रेमी व्यक्तित्व को रखा जा सलता हैं। आत्मप्रेमी व्यक्तित्व -नारसिसिज्म अथवा प्रेम का प्रत्यय फ्रांयड द्वारा प्रदान किया गया है। 2. मध्यम ‘गंभीर व्यक्तित्व विकृति – विकृतिजन्य व्यक्तित्व वाले वे व्यक्ति जिनके लक्षण अपेक्षाकृत अधिक गंभीर हां, इस श्रेणी में आते हैँ। इनके लक्षण सीमावर्ती होते है। इससे अधिक गभीर लक्षण मानसिंक रोगो की श्रेणी में आ जाते है। इस प्रकार की व्यक्तित्व विकृति के कई प्रकार है
1)शिजॉयड व्यक्तित्व- शिजयड व्यक्तित्व की सबसे प्रमुख विशेषता है उनकी संवेदनशीलता लज्जा एवं संकोच तथा सामाजिक सम्बन्धी की उपेक्षा।अधिकांशत: ये आत्मकेन्द्रित होते हैं। व्यक्तित्व में शिजॉयड प्रतिक्रियाएं बाल्यकाल से ही दिखलाई पड़नी प्रारंभ हो जाती है। इस श्रेणी में आने वाले व्यक्ति चिडचिडे एवं एकान्त प्रेमी के रूप में जाने जाते हैं। ये बहुत अधिक मात्रा में दिवास्वप्न देखते है लेकिन वास्तविकता पर भी इनकी पकड़ बनी रहती है। इनका चिन्तन आत्माभिमुखी होता है। शिजॉयड व्यक्तित्व वाले लोगों को अपनी अत्कामक्रता तथा विद्वेष को अभिव्यक्त करने मे अत्यन्त कठिनाई होती है। वे बाधा डालने वाली प्रतिबल एवं तनावपूर्ण परिस्थितियों में आभासी रूप से अलगाव की प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं। भावनाओं के अभिव्यक्त न कर सकने की अपनी कमी को छिपने के लिए वे ऊपरी तौर पर शांति और अलगाव की मनोरचनाओं का सहारा लेते हैं। ये सभी लक्षण उसके कुसमायोजन को बढावा देते है।

2)साईक्लायड व्यक्तित्व –व्यक्तित्व विकृति का यह संरूप उतह विषाद प्रतिक्रियाओं का यह सरल रूप है। साईक्लायड व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में उत्साह और विषाद के एक के बाद एक नियमित आवर्ती सत्र होते है। उत्साह के सत्र में व्यक्ति अत्यन्त उत्साही एवं जोशीले, आशावादी तथा मित्रवत होता है जबकि विषाद के सत्र में उसमें दुख, निराशा, कम उर्जा तथा व्यर्थता एबं अनुपयुक्तता का एहसास पाया जाता है। उत्साह के अवस्था में वह सामाजिक आकर्षणा का व्यक्तित्व रहता है। वह किसी समिति का सदस्य, संयोजक अथवा स्वयंसेवी के रूप में देखा जा सकता है जबकि विषाद की अवस्था में वह बुझ-बुझा रहता है। सामान्य तौर पर इन व्यक्तियों के मूड का यह परिवर्तन तनावपूर्ण परिवेशगत दशाओं के कारण नहीं होता। अधिकांश साईक्लायड व्यक्तित्व वाले व्यक्ति बिना मनोविक्षिप्ति की विशेषताएँ विकसित किये पूरा जीवन उपर्युक्त दो सत्रों में व्यतीत कर देते है।

3) पैरानॉयड व्यक्तित्व –पैरानॉयड व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता है उसकी अति संवेदनशीलता । इनका व्यवहार अत्यन्त कठोर एवं शत्रुतापूर्ण होता है। इनकी दृष्टि में स्वयं का महत्त्व बहुत अधिक होता है। इन व्यक्तियो में अकारण संदेह और ईंष्यों की भावना पाई जाती है। इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले दूसरों से सुदृढ़ तथा स्थायी संवेगिक सम्बन्ध बनने में कठिनाई का अनुभव करते है। ये अपने आपको अत्यधिक महत्त्व देते है और अपनी त्रुटियों के लिए दूसरों पर दोषरोपण करते है। बहुत से पैरानॉयड़ व्यक्तित्व वाले व्यक्ति जीवन की परिस्थितियों से सीमावर्ती समायोजन किसी तरह स्थापित क़र लेते है।