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दाह संस्कार :अंतिम संस्कार

हिंदू धर्म में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं माना गया है। मृत्यु होने पर यह माना जाता है कि यह वह समय है, जब आत्मा इस शरीर को छोड़कर पुनः किसी नये रूप में शरीर धारण करती है, या मोक्ष प्राप्ति की यात्रा आरंभ करती है । किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद मृत शरीर का दाह-संस्कार करने के पीछे यही कारण है। मृत शरीर से निकल कर आत्मा को मोक्ष के मार्ग पर गति प्रदान की जाती है। शास्त्रों में यह माना जाता है कि जब तक मृत शरीर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है तब तक उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्रों के अनुसार किये जाने वाले सोलह संस्कारों में से अंतिम संस्कार दाह संस्कार है। यह संस्कार दो प्रकार से किया जाता है 1. जब मृत शरीर उपलब्ध हो जब मृत शरीर उपलब्ध हो तो निम्न प्रकार से दाह संस्कार क्रिया करनी चाहिए- व्यक्ति की मृत्यु के बाद पुत्र या पौत्र को मरे हुए प्राणी को कंधा देना चाहिए। तथा उसका निम्न विधान से अग्निदाह करना चाहिए। मृत्यु के पश्चात् सबसे पहले भूमि को गोबर से लिपना चाहिए। जल रेखा से मंडल बनाना चाहिए। इसके बाद तिल और कुश बिछाकर व्यक्ति को कुश पर सुला देना चाहिए तथा उसके मुख में स्वर्ण तथा पंचरत्न डालना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मंडल युक्त भूमि पर प्राण त्याग करने से व्यक्ति को अन्य योनि प्राप्त करने में सहजता रहती है अन्यथा उसकी आत्मा वायुलोक में भटकती रहती है। मृत्युकाल में मरनासन्न व्यक्ति के दोनों हाथों में कुश रखना चाहिए। इससे प्राणी विष्णुलोक को प्राप्त करता है। व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर, पुत्रादि तथा परिजनों को स्वयं स्नान करने के बाद शव को शुद्ध जल से स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहनाकर, उसके बाद शरीर में चंदन आदि सुगंधित पदार्थों का लेप भी करना चाहिए। दाह संस्कार के अंतर्गत छः पिंड देने का विधान है। पहला पिंड मृत्यु स्थान पर, दूसरा द्वार पर, तीसरा चैराहे पर, चैथा विश्रामस्थान, पांचवां चिता, और छठा संचयन के समय। इसके बाद शव को बंधु-बांधवों को श्मशान घाट ले जाना चाहिए और वहां शव को दक्षिणी दिशा की ओर सिर करके स्थापित करना चाहिए। दाहक्रिया के लिए पुत्रादि-परिजनों को तृण, काष्ठ, तिल और घी लेकर जाना चाहिए। श्मशान घर में दाह संस्कार के सभी कार्य दक्षिणामुखी होकर करना चाहिए। दाह संस्कार करने से पूर्व स्वच्छ भूमि पर अग्नि स्थापित कर, शव को चिता में जलाने का उपक्रम करना चाहिए। जब शव के शरीर का आधा भाग चिता में जल जाए तो उस समय कर्ता तिलमिश्रित घी की आहुति चिता में जल रहे शव के ऊपर छोड़ना चाहिए। उसके बाद भाव विह्वल होकर उस आत्मीय जन के लिए रोना चाहिए। इस प्रकार करने से मृतक को अत्यधिक सुख प्राप्त होता है। दाह क्रिया करने के बाद अस्थि-संचयन क्रिया की जानी चाहिए। इसके बाद किसी जलाशय पर जाकर सभी परिजनों को वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए तथा दक्षिणामुखी होकर मृत प्राणी के लिए तिलयुक्त जलांजलि देनी चाहिए। शवदाह जलांजलि के बाद स्वजनों को अश्रुपात नहीं करना चाहिए। शास्त्रों में ऐसा माना जाता है कि इस समय रोते हुए अपने बंधु बांधवों के द्वारा आंख और मुंह से गिराए हुए आंसू और कफ का मृतक को पान करना पड़ता है। घर के द्वार पर पहुंचने पर नीम की पत्तियों को दांत से काटकर आचमन करें तथा बाद में घर में प्रवेश करें। दाह संस्कार मुहूर्त जब मृत शरीर उपलब्ध होता है तो दाह संस्कार के लिये मुहूर्त चयन की आवश्यकता नहीं होती है। केवल जब किसी के मृत शरीर का दाह-संस्कार पंचक के नक्षत्र समय में करना हो तो मुहूर्त समय का प्रयोग किया जाता है। पंचक नक्षत्रों में धनिष्ठा के अंतिम दो चरण, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद व रेवती आते हैं। इन पांच नक्षत्रों में मृत्यु होने पर दाह-संस्कार से पूर्व पंचक शांति करानी होती है। 2. जब मृत शरीर उपलब्ध हो जब किसी व्यक्ति की मृत्यु भूख से, हिंसक प्राणी के द्वारा, फांसी के फंदे, विष से, अग्नि से, आत्मघात से, गिरकर, रस्सी बंधन से, जल में रखने से, सर्प दंश से, बिजली से, लोहे से, शस्त्र से या विषैले कुत्ते के मुख स्पर्श से हुई हो तो इसे दुर्मरण कहा जाता है। इन सभी स्थितियों में मृत्यु को सामान्य नहीं माना जाता और मृत्यु पश्चात् दाह संस्कार के लिए पुतला दाह संस्कार विधि का प्रयोग किया जाता है। यही विधि प्रवास में मृत्यु होने पर भी अपनाई जाती है। इस प्रकार की स्थिति तभी सामने आती है, जब सामान्यतः अप्राकृतिक मृत्यु होती है। जिसमें या तो शरीर किसी कारण वश नष्ट हो जाता है, अथवा प्राप्त ही नहीं होता है। इन स्थितियों में कुशा (एक प्रकार की घास), पलाश और चावल के आटे का पुतला बनाकर उसका दाह संस्कार किया जाता है। पुतला दाह-संस्कार अर्थात पुतले के दाह-संस्कार के लिये मुहूर्त चयन की निम्नलिखित प्रक्रिया अपनायी जाती है:- क) जब मृत्यु की सूचना सूतक (अशुद्धता) के दौरान प्राप्त होती है सूतक समय स्थान विशेष की रीति-रिवाज अनुसार सूतक, मृत्यु के दस से 16 दिन के अंदर समाप्त हो जाता है। यदि मृत्यु की सूचना इन दिनों के बीच ही प्राप्त हो जाती है तो पुतला-दाह पंचक के नक्षत्र समय को छोड़कर किसी भी समय किया जा सकता है। ख) जब मृत्यु की सूचना सूतक के पश्चात् अर्थात 16 दिनों से एक वर्ष के मध्य प्राप्त होती है, तो पुतला-दाह के मुहूर्त चयन के लिये निम्नलिखित बातों का विचार करना आवश्यक होता है। 1. पुतला दाह-संस्कार नक्षत्र पुतले का दाह-संस्कार करने के लिये श्रवण, हस्त, अश्विनी और पुष्य नक्षत्र सबसे अच्छे माने जाते हैं। इसके बाद उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वसु, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा नक्षत्र पुतला दाह- संस्कार के लिये मध्यम श्रेणी के नक्षत्र होते हैं। 2. पुतला दाह – संस्कार वार यह कार्य करने के लिये रविवार, सोमवार व गुरुवार को लिया जा सकता है। 3. दाह संस्कार त्याज्य समय पुतला दाह – संस्कार कार्य के लिये भद्रा त्याज्य है। दाह-संस्कार करने वाले व्यक्ति का जन्म व प्रत्यारि तारा (जन्म नक्षत्र वाला तारा, 5वां, 10वां, 14वां, 19वां व 23वां तारा त्याज्य होता है व दाह-संस्कार करने वाले व्यक्ति के जन्म चंद्रमा से गोचर के चंद्रमा की स्थिति 4, 8, 12 वें भावों में भी नहीं होनी चाहिए। शुक्रवार, मंगलवार, शनिवार नहीं लेना चाहिए। तिथियों में 1, 6, 11, 13, 14 तिथियां, त्रिपुष्कर योग, अधिमास, गुरु व शुक्र का अस्त होना और शुक्ल पक्ष का भी परित्याग करना चाहिए। साथ ही सब क्रूर नक्षत्रों अर्थात पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वा आषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद, भरणी व मघा आदि नक्षत्रों के अतिरिक्त तीक्ष्ण नक्षत्र अर्थात (मूल, ज्येष्ठा, आद्र्रा व आश्लेषा और रेवती) को भी त्याग देना चाहिए। 4. जब मृत्यु की सूचना एक वर्ष बाद प्राप्त हो जब मृत्यु की सूचना एक वर्ष के उपरांत प्राप्त हो, तो ऐसी स्थिति में पुतला दाह-संस्कार उत्तरायण में ही करना चाहिए और पुतला दाह के मुहूर्त चयन के लिए उन सभी बातों का विचार आवश्यक रूप से करना चाहिए जिन्हें ऊपर (ख) में बताया गया है।

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