यह सत्य कथा है एक ऐसी कल्पना की जिसे बचपन से कल्पना लोक में विचरने का बहुत शौक था। अपने खिलौनों से खेलते हुए वह अपने कल्पना लोक में चली जाती और फिर घंटों उसी आनंद में डूबी रहती। उसके माता-पिता ने भी शायद इसीलिए उसका नाम कल्पना रखा होगा। कल्पना को बचपन में ही उसके मामा-मामी ने गोद ले लिया था क्योंकि उनकी कोई अपनी संतान नहीं थी। मामा-मामी के लाड़ प्यार में कल्पना बड़ी हुई। बचपन से ही उसे पेंटिंग का बहुत शौक था और वह कुछ न कुछ अपनी कल्पना से पन्नों पर उकेरती रहती थी और फिर उन्हें अपने कमरे में लगा देती। कल्पना के नये माता-पिता एक रूढ़िवादी परिवार से संबंधित थे और वे यही चाहते थे कि कल्पना भी उनके परिवार की परंपराओं का गंभीरता से पालन करे। वहां आस पास की परंपराओं के अनुसार आमतौर पर लड़कियों को काॅलेज में बहुत ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता था पर कल्पना की जिद के आगे उनकी एक न चली और उसे उन्होंने वहीं के पोस्ट ग्रैजुएट काॅलेज में प्रवेश करा दिया। कल्पना सुंदर तो थी, साथ में उसकी कला क्षेत्र में रूचि ने उसे शीघ्र ही काॅलेज में बहुत लोकप्रिय बना दिया। यौवन की दहलीज पर खड़ी कल्पना भी अपनी लोकप्रियता से इतनी खुश थी कि अधिक से अधिक समय काॅलेज में बिताने लगी और उसे अपने युवा साथी का साथ भी अधिक अच्छा लगने लगा। लेकिन कल्पना की प्रेम की राह इतनी आसान नहीं थी। जैसे ही उसके माता-पिता को इस बात का पता चला उन्होंने फौरन उसे काॅलेज से निकाल कर वापिस उसके जन्मकालीन माता-पिता के पास भेज दिया। इससे कल्पना को बहुत बड़ा मानसिक आघात पहुंचा। वह अपने माता-पिता को कभी माफ नहीं कर पाई। जिन्होंने उसे अपना समझ कर पाला पोसा उन्हीं माता-पिता ने अपनी जिंदगी से तिनके की तरह निकाल फेंका। कल्पना को कई दिन तक हाॅस्पिटल में रहना पड़ा तभी वह आघात से उबर पाई। वइ इस आघात से उबर कर बाहर आई ही थी कि कुछ समय बाद एकाएक कल्पना का विवाह विवेक से कर दिया गया। विवेक एक सुशिक्षित परिवार से थे और सी. ए. कर बैंक में आॅफिसर के पद पर कार्यरत थे। विवाह के बाद कल्पना को अपने सास-ससुर से एडजस्ट करने में काफी मुश्किलंे आईं। कल्पना बहुत महत्त्वाकांक्षी थी और उसे खुला जीवन पसंद था। वह ऊंचे आकाश में अपनी कल्पना के संसार में उड़ना चाहती थी पर ससुराल का माहौल बिल्कुल अलग था। वे लोग काफी रूढ़िवादी और पुरानी परंपराओं को मानने वाले थे। सास ससुर की उपस्थिति व उनके हस्तक्षेप से कल्पना को अपना जीवन एक जेल की तरह लगता था और उसे लगता था कि वह इस पिंजरे में कैद एक पक्षी की तरह है जिसके पर काट दिये गये हैं इसलिए वह सबसे कटी-कटी रहती और अपनी सासु मां को खुश नहीं कर पाती थी। विवेक बैंक के काम से अक्सर लेट ही आते और आकर अपनी मां की बुराई सुनना पसंद नहीं करते थे। इसलिए अपनी कुंठा और मानसिक वेदना के चलते कल्पना ने कई बार स्वयं को समाप्त करने की कोशिश भी की पर समय को अभी कई करवटें और लेनी थी। इसी बीच कल्पना के दो बच्चे हो गये और समय का सदुपयोग करने के लिए कल्पना ने बी.एड और पीएच.डी भी कर ली और अपना अधिक से अधिक समय पेंटिंग को देने लगी। इससे उसको बहुत सुकून मिलता और वह यह कोशिश भी करने लगी कि वह पेन्टिंग को अपने व्यवसाय के रूप में अपना ले। लेकिन चाहकर भी इस कोशिश में कामयाब नहीं हो पाई। विवेक अपने काम में इतने मशगूल थे कि धीरे-धीरे एक के बाद एक प्रमोशन की सीढ़ियां चढ़ते रहे और अपने बैंक के उच्चतम पद सी. एमडी. तक पहुंच गये। कल्पना अपने पति की सफलता से बहुत खुश थी परंतु मानसिक रूप से अपने को उनसे जुड़ा नहीं पाती थी। इतना पैसा, मान-सम्मान होने के बाद भी उसके अंदर कुछ टूटता रहता था। विवेक ने सी. एम. डी. के पद पर पहुंच कर अपने दोनों सालों को अपने कुछ कामों में मिला लिया था। इस पद पर पहुंचने के लिए उसकी कबिलियत के अलावा उसे और भी बहुत कुछ करना पड़ा था और इस पद पर बने रहने के लिए भी बहुत से नैतिक अनैतिक कामों को अंजाम देना पड़ता था। कल्पना को इसका कुछ इल्म नहीं था, न ही विवेक उससे इस बारे में कुछ चर्चा करते थे और अचानक वह हुआ जिसकी उसने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। अचानक एक दिन उनके घर सीबी. आई का छापा पड़ा। विवेक घर पर नहीं थे। वह अकेली थी। उन्होंने आकर उसका फोन ले लिया और पूरे घर को उथल-पुथल कर सारा कैश, ज्वेलरी, फाइलें आदि ले गये। सभी लाॅकर सील कर दिये गये, सभी बैंक अकाउंट भी सी. बीआई ने सील कर दिये और उधर विवेक को रिश्वतखोरी के इल्जाम में धर लिया गया। कल्पना की दुनिया ही बदल गई उसके दोनों भाइयों को भी पुलिस पकड़ कर ले गई। कल्पना को पनाह देने वाला कोई भी न रहा। न जन्मकालीन माता-पिता न परवरिश करने वाले माता-पिता। सभी को अपने भविष्य की चिंता सता रही थी। ऐसे में जब कल्पना के पास कोई पैसा नहीं था और वह मानसिक और शारीरिक रूप से भी थक चुकी थी तो उसे सहारा दिया उसकी बचपन की सहेली मृदुला ने। उसने ऐसे विकट समय में उसका पूरा साथ दिया और परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत दी। कल्पना ने विवेक को बचाने के लिए रात दिन एक कर दिया और वास्तव में अपने पत्नी धर्म का पालन करते हुए बड़े से बड़े वकील कर विवेक और अपने भाइयों को बेल पर छुड़वा लिया। आज कल्पना अपने पति के साथ फिर से अपनी बिखरी हुई जिंदगी को संवारने में जुटी है और इसी कोशिश में है कि शीघ्र ही वे इस केस से बरी हो जाएं और कुछ ऐसा कार्य शुरू करें कि सुकून की जिंदगी जी सकें। आइये देखें क्या कहते हैं कल्पना और विवेक की कुंडलियों के सितारे? क्या अभी कोई इम्तहान बाकी है या फिर उनके अच्छे दिन आने वाले हैं?े कल्पना की कुंडली में लग्न भाव में नैसर्गिक पाप ग्रह राहु स्थित है तथा लग्न पाप कर्तरी योग से ग्रसित है। लग्नेश चंद्रमा भी अपनी नीच राशि में स्थित है। तीव्र पापकर्तरी योग होने से इनकी मानसिक शांति, आत्मविश्वास, आत्मबल तथा स्वतंत्रता को बार-बार चोट पहुंची व जीवन बहुत संपत्ति व सुविधा संपन्न होने के बावजूद भी नीरस लगने लगा तथा क्षुब्ध व उदास मन के कारण इनकी सदैव अपने घर में भी जेल जैसे जीवन की ही स्थिति बनी रही। लग्न में पापकर्तरी योग होने के अलावा राहु, केतु व शनि जैसे पाप ग्रहों का प्रभाव भी है। साथ ही लग्नेश भी नीच राशिस्थ है। न केवल आत्मबल, शारीरिक शक्ति व व्यक्तित्व का घर लग्न पीड़ित है अपितु मन का कारक राशि कर्क भी पीड़ित है और मन का कारक चंद्र लग्नेश होकर नीचराशिस्थ होने से दोहरा नुकसान कर रहा है। ऐसी स्थिति के चलते ऐसा लगता है कि उनको मानसिक शांति आसानी से सुलभ न होगी क्योंकि रिजर्व मेंटल एनर्जी का कारक गुरु भी अशुभ भाव में स्थित है। यदि वैवाहिक सुख या सोलमेट का विचार करें तो पति का कारक गुरु अशुभ भाव में स्थित है व सप्तम भाव पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव है। इसके अतिरिक्त भावात् भावम् के सिद्धांतानुसार यदि अध्ययन करें तो पाएंगे की सप्तम से सप्तम अर्थात् लग्न की स्थिति अत्यधिक अशुभ होने के कारण सप्तम भाव में स्वगृही शनि भी वैवाहिक जीवन में सामंजस्य उत्पन्न नहीं कर पाया। इनके पति की कुंडली में भी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ योग न होने के कारण इन्हें पति की ओर से भी विशेष स्नेह व आत्मीयता प्राप्त न हो सकी और लगभग ऐसी स्थिति हो गई की ये दोनों चाहकर भी पूर्णरूपेण एक दूसरे के न हो सके। विवेक की कुंडली में नवांश में उच्चराशिस्थ शनि होने के चलते यह कह सकते हैं कि इनका तलाक नहीं होगा व वैवाहिक जीवन में स्थिरता बनी रहेगी। कल्पना की जन्मपत्री में स्वगृही शुक्र माता के घर अर्थात् चतुर्थ भाव में होने से मालव्य योग का निर्माण होने व चतुर्थ भाव पर गुरु की दृष्टि होने से इन्हें इनके मामा ने गोद लेकर बड़े नाजों से पाला। चतुर्थ भाव में शुक्र की श्रेष्ठतम स्थिति से जातक को जीवन में सुख, संपत्ति, समृद्धि, सुविधा, वाहन, गृह सुख इत्यादि किसी भी चीज की कमी नहीं रहती। ऐसे लोग कई बार गोद ले लिए जाते हैं तथा अच्छी शिक्षा व अमीरी की भी प्राप्ति होती है और विवाहोपरांत पति की निरंतर उन्नति भी होती है क्योंकि चतुर्थ भाव सप्तम भाव से दशम होता है। कल्पना की कुंडली में द्वितीयेश द्वितीयस्थ, तृतीयेश तृतीयस्थ व चतुर्थेश चतुर्थस्थ है। ऐसा योग अखंड लक्ष्मी योग समझा जाता है। चतुर्थ भाव से शिक्षा का विचार होता है। इस भाव में शुक्र अपनी मूल त्रिकोण राशि में स्थित होने से कल्पना की पेंटिंग व कला के क्षेत्र में रूचि बनी और बहुत से व्यक्ति इसकी कला से प्रभावित भी हुए परंतु कार्य क्षेत्र का स्वामी एवं पंचम भाव का प्रतिनिधि ग्रह मंगल बारहवें भाव में स्थित होने से तथा शिक्षा का कारक भाग्येश गुरु अष्टमस्थ होने से वह अपने ज्ञान व कला को व्यावसायिक रूप देने में असफल रही और कोशिश करने पर भी अपना करियर नहीं बना पाई। इनकी महत्वाकांक्षा अतृप्त रह गई तथा जीवन में व्यावसायिक दृष्टि से उच्चस्तरीय सफलताओं में बाधाएं आती रहीं और अति महत्वाकांक्षी होते हुए भी इन्हें साधारण जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा। कल्पना की कुंडली में चार ग्रह स्वगृही हैं तथा इनके पति की कुंडली में भी तीन ग्रह स्वगृही हैं। परंतु इनके पति की कुंडली में एक भी शुभ ग्रह केंद्र में नहीं है तथा राहु, केतु केंद्रस्थ हैं। इसी कारण इन्हें अनैतिक कार्यों से परहेज नहीं है और ग्रहों की ऐसी स्थिति के चलते ही इन्हें कानूनी पचड़े में भी पड़ना पड़ा। विवेक को बुध की दशा में राहु की अंतर्दशा आने के बाद जेल की हवा भी खानी पड़ी। उस समय गोचर के शनि का द्वादश भाव में स्थित मंगल के साथ परस्पर दृष्टि योग भी चल रहा था। चतुर्थ व द्वादश भाव में पाप ग्रहों के प्रभाव से जेल योग होता है। आगे का समय कल्पना के व्यावसायिक जीवन के लिए श्रेष्ठ है। जिस तरह शनि की साढ़ेसाती ने उसके जीवन में इतनी उथल-पुथल कर दी वहीं शनि अब उसके भाग्योदय में सहायक होगा और वह अपनी पहचान कला क्षेत्र के माध्यम से बनाने में अवश्य सफल होगी।
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