केमद्रुम योग: सफलता में बाधा बनने वाला यह योग क्या सच में इतना खतरनाक है ?

केमद्रुम योग क्या है ?
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति का कारक माना जाता है। जब कुंडली में चंद्रमा अकेला और असहाय स्थिति में होता है, तो इस स्थिति को केमद्रुम योग कहा जाता है । यह चंद्रमा से बनने वाले अशुभ योगों में से एक माना जाता है और इसका सीधा असर व्यक्ति के मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और जीवन में मिलने वाले सहयोग पर पड़ता है। पुराने ग्रंथों में इसे एक ऐसा योग बताया गया है जो व्यक्ति को भीड़ में भी अकेला महसूस कराता है — यानी बाहरी तौर पर सब कुछ ठीक दिखने के बावजूद व्यक्ति भीतर से असुरक्षित और अस्थिर अनुभव करता है।
केमद्रुम योग बनने के कारण
यह योग मुख्यतः तीन स्थितियों के एक साथ होने पर बनता है:
- चंद्रमा से दूसरे भाव में कोई ग्रह न हो (सूर्य को छोड़कर कुछ मतों में)
- चंद्रमा से बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो
- चंद्रमा के साथ स्वयं उसी भाव में भी कोई ग्रह स्थित न हो
सरल शब्दों में कहें तो चंद्रमा के आगे-पीछे और साथ में कोई भी ग्रह मौजूद न हो,तब केमद्रुम योग का निर्माण होता है। चूंकि चंद्रमा को सहयोग और सुरक्षा के लिए आस-पास के ग्रहों की आवश्यकता मानी जाती है, इसकी अनुपस्थिति में चंद्रमा “निर्बल” या “अकेला” माना जाता है।
केमद्रुम योग के प्रभाव
पारंपरिक ज्योतिष के अनुसार, यदि यह योग बिना किसी भंग (cancellation) के कुंडली में मौजूद हो, तो इसके निम्न प्रभाव बताए जाते हैं:
- मानसिक तनाव, चिंता और आत्मविश्वास की कमी
- जीवन में संघर्ष और आर्थिक अस्थिरता
- रिश्तों में अकेलापन या सहयोग की कमी महसूस होना
- निर्णय लेने में कठिनाई और मन का अस्थिर रहना
- मेहनत के बावजूद फल मिलने में देरी
ध्यान रहे — यह प्रभाव कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति, दशा और भाव-बल पर भी निर्भर करता है। हर केमद्रुम योग समान रूप से अशुभ फल नहीं देता।
केमद्रुम योग भंग (कैंसिलेशन) के कारण
ज्योतिष शास्त्र में इस योग को भंग करने वाली कई स्थितियां भी बताई गई हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- यदि चंद्रमा लग्न से केंद्र (1, 4, 7, 10वें भाव) में स्थित हो
- यदि चंद्रमा गुरु (बृहस्पति) से केंद्र में हो
- यदि चंद्रमा पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो
- यदि चंद्रमा अपनी उच्च राशि, स्वराशि या मित्र राशि में स्थित हो
- यदि कुंडली में कोई प्रबल राजयोग बन रहा हो
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