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(दोष रहित, सत्य प्रधान, उन्मुक्त, अमर और भरा-पूरा जीवन विधान ही धर्म है।)

धर्म क्या है — एक प्रकार की ब्रम्हाण्डीय जानकारी और उस जानकारी के अनुसार अपने आपको स्थित और व्यवस्थित करना अर्थात् ब्रम्हाण्डीय स्थिति की यथार्थत: जानकारी रखते हुये अपने को उसके अनुसार व्यस्थित कर देना । जो कुछ और जितना भी हम ब्रम्हाण्डीय विधान से अलग हट चुके हैं, उसमें अपने को स्थित कर देना । पिण्ड (शरीर) ब्रम्हाण्ड की एक इकाई है । ब्रम्हाण्डीय विधान क्या है और उसमें यह जो हमारा पिण्ड है यह कहाँ और कैसा है– इसकी सम्पूर्ण जानकारी रखते हुये, यह जहाँ जैसा था, वहाँ वैसा रख देना, उसमें जोड़ देना या व्यवस्थित कर देना । ब्रम्हाण्डीय विधान से जानकारी रखते हुये उसमें पिण्डीय स्थिति को स्थित कर देना। जो ब्रम्हाण्डीय विधान से छूट चुके हैं अथवा किसी विपरीत गति में जा चुके हैं उस विपरीत गति से अनुकूल गति में स्थित कर देना । जब हम ऐसा कर लेंगे तो हमारा सारा उद्देश्य भगवन्मय होता रहेगा ! अपनी दृष्टि को हमेशा ‘तत्त्व’ के तरफ मोड़ते हुए तत्त्वमय बनाए रखना चाहिये। शरीर रूप में अपने को देखने की कोशिश कदापि नहीं करना चाहिये क्योंकि शरीरमय देखने से ही संसार में सारे दोष और दुष्कृत्य उत्पन्न होते रहते हैं जिससे पतन और विनाश को हर कोई ही जाने लगता और जाता ही रहता है।

‘धर्म’ अपने आप में एक परिपूर्ण शब्द है । ”परमाणु से परमात्मा तक का सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड शिक्षा (एजुकेशन) से तत्त्वज्ञान (नॉलेज) तक का सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण प्रयोग-उपलब्धि समाहित रहता है जिसमें वह विधान ही ‘धर्म’ है।”

जड़ जगत्-शरीर-जीव-ईश्वर और परमेश्वर:– संसार और शरीर के मध्य शरीर तक की पूर्ण जानकारी शिक्षा (Education); शरीर और जीव के मध्य जीव तक की पूर्ण जानकारी स्वाध्याय (Self Realization); जीव और ईश्वर के मध्य ईश्वर तक की पूर्ण जानकारी अध्यात्म (Spiritualization) और ईश्वर और परमेश्वर के मध्य की जानकारी, साथ ही साथ सम्पूर्ण जानकारी ( True Supreme KNOWLEDGE ) समाहित रहता है जिसमें, वही है ‘धर्म’ ।

भगवान श्री कृष्ण जी महाराज के अनुसार– ”जिस माध्यम से अनन्य भगवद् भक्ति-भाव होता रहता हो वही ‘धर्म’ है; जिस माध्यम से अद्वैत्तत्त्व बोध—भगवत्तत्त्व बोध रूप एकत्व बोध होता हो, वही तत्त्वज्ञान है; जिस माध्यम से सम्पूर्ण संसार के प्रति त्याग-भाव (विषयों से असंग) और भगवान के प्रति समर्पण-शरणागत भाव हो, वही वैराग्य है और अणिमा-गणिमा आदि सिध्दियाँ जिसमें हों, वही ऐश्वर्य है।” आप श्रीमद्भागवत् महापुराण के अधोलिखित श्लोक में जान-देख सकते हैं–

धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।

गुणेष्वसंगो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादय: ॥

(श्रीमदभागवत्महापुराण 11/19/27)

उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से सूत्र रूप में श्रीकृष्ण जी महाराज ने धर्म-ज्ञान-वैराग्य और ऐश्वर्य की जो परिभाषा दिया है, वह अपने आप में पूर्ण है । मगर सूत्र रूप में होने के नाते सभी पाठक जनों से उसे समझ पाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है और कोई चीज समझ में न आने का अर्थ उसका गलत होना नहीं है ।

स्वामी विवेकानन्द जी ने भी ‘धर्म’ की परिभाषा को अपने ‘मेरे गुरुदेव’ नामक पुस्तिका के पृष्ठ संख्या 18 के दूसरे पैरा में दिया है–

‘मनुष्य को परमेश्वर प्राप्त करना चाहिए, परमेश्वर का अनुभव करना चाहिए, परमेश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहिए तथा उससे बातचीत करनी चाहिए–यही ‘धर्म’ है ।’ (यथार्थता हेतु ईश्वर के स्थान पर परमेश्वर प्रतिस्थापित)

स्वामी विवेकानन्द जी ने जो उपर्युक्त परिभाषा दिया है, उसमें कुछ भ्रामकता है । अर्थ और भाव तो बिल्कुल ही सत्य है मगर जानकारी और शब्द भ्रामकता को प्रदर्शित कर दे रहे हैं । जैसे स्वामी विवेकानन्द की स्थिति आत्मामय जीव प्रधानता की थी अर्थात् कभी-कभी आत्मामय और बराबर जीव की स्थिति में रहा करते थे। प्राय: जितने आत्मामय जीवधारी होते हैं, वे भी नाजानकारी और भूल-भ्रम के कारण आत्मा को ही परमात्मा, ईश्वर को ही परमेश्वर, ब्रम्ह को ही परमब्रम्ह, नूर-सोल-स्पिरिट को ही खुदा-गॉड-भगवान, पतनोन्मुख सोऽहँ–भ्रामक शिवोऽहँ–ऊर्ध्वमुखी हँसो- -स: ज्योति रूप शिव शक्ति को ही परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् रूप अद्वैत्तत्त्वं मान बैठते हैं । यह स्थिति आदिम काल से वर्तमान तक के सभी योगी-साधक तथा अध्यात्मवेत्ताओं की ही रही है और है भी। इसी के अन्तर्गत स्वामी विवेकानन्द भी आ जाते हैं । इसीलिए ‘धर्म’ की परिभाषा में इन्होंने परमेश्वर के जगह पर ईश्वर का प्रयोग कर दिया है ।

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आप पाठक बन्धुओं को योगी-योगेश्वर तथा तथाकथित भगवानों आदि-आदि आध्यात्मिक सन्त-महात्माओं और तथाकथित गुरुओं-सद्गुरुओं आदि के द्वारा दिग्भ्रमित कर-करा दिया गया है कि जीव-आत्मा और परमात्मा अथवा जीव-ईश्वर और परमेश्वर अथवा जीव-ब्रम्ह और परमब्रम्ह अथवा रूह-नूर और अल्लाहतआला अथवा सेल्फ-सोल एण्ड गॉड अथवा नूर-सोऽहँ-शिवोऽहँ- हँसो-स: ज्योति; दिव्य ज्योति रूप शिव और परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप अलम् रूप गॉड रूप अद्वैत्तत्त्वम् रूप भगवत्तत्त्वम् रूप खुदा-गॉड-भगवान तीनों को ही एक ही बता कर वास्तव में अपने जानकारी एवं नासमझदारी का और अपने मिथ्याज्ञानाभिमान और मिथ्या अहंकार का ही परिचय दिए हैं और दे भी रहे हैं, मगर सामान्य जनमानस तो यह समझ पाता नहीं और इन लोगों के भरमाने-भटकाने में भ्रम-भटककर तीनों; जीव-ईश्वर और परमेश्वर अथवा रूह-नूर और अल्लातऽला अथवा सेल्फ-सोल एण्ड गॉड अथवा नूर-सोऽहँ-हँसो ज्योति-शिव और परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् को एक ही मान-मनवा कर ‘परमसत्य रूप वास्तविक सत्य’ और उनके यथार्थत: ज्ञान से वंचित कर-करा दिया जा रहा है।

आप सत्यान्वेषी ज्ञानाभिलाषी बन्धुओं को निष्पक्ष एवं तटस्थ भाव से इन तीनों के नाम-रूप-स्थान- गुण-कर्म-प्रभाव -लीला भाव आदि को पृथक्-पृथक् रूप में बात-चीत सहित साक्षात् दर्शन एवं यथार्थत: जानने परिचय-पहचान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। ये उपर्युक्त तीनों ही तीन हैं और पृथक्-पृथक् हैं, न कि एक ही ।

वास्तव में हमारा इन उपर्युक्त तथाकथित भगवानों -सद्गुरुओं आदि महानुभावों से कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है और न ही किसी प्रकार के लेनी-देनी का टकराव या झगड़ा ही है । हाँ, उनसे टकराव अथवा झगड़ा अवश्य है जो असत्य-अधर्म-ढोंग-पाखण्ड आदि-आदि वाले रहते हुए अपने को सत्य-धर्म और वास्तविक ‘तत्तवज्ञान’ दाता अथवा भगवद् ज्ञान दाता होने की घोषणा करते हैं। जैसे कि बताते-जनाते हैं—नूर-सोऽहँ-शिवोऽहँ-ह्ँसो-ज्योति की आध्यात्मिक अथवा साधनात्मक क्रियाओं को यह घोषित करते-कराते हैं कि यही ‘तत्त्वज्ञान’ अथवा भगवद् ज्ञान, अथवा अद्वैत्तत्त्व ज्ञान है जबकि यह बिल्कुल गलत बात है। ऐसे लोगों के असत्य-अधर्म आडम्बर-ढोंग-पाखण्ड का पर्दाफास करना इनके वास्तविकता को समाज में उजागर करना तथा इनके गलत तथ्यों के जगह पर परमसत्य रूप वास्तविक सत्य को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करना या रखना और प्रत्येक जिज्ञासु को सत्य प्रधान बनाना और बनाए रखना ही हमारा उद्देश्य अथवा लक्ष्य है जिसका परिपालन करना-कराना ही हमारा कर्तव्य है और हम अपने कर्तव्य पालन में लगे भी हैं। अब हमारे इस कर्तव्य पालन करने में इन उपर्युक्त तथाकथित महानुभावों अथवा इनके अनुयायियों को अपना अथवा अपने गुरुदेव का पर्दाफास होते हुए अपमान और दु:ख-कष्ट ही होता हो तो आखिरकार हम क्या करें? क्या हम इनके असत्य- अधर्म और मिथ्याज्ञानाभिमान- मिथ्यावादिता रूप आडम्बर- ढोंग-पाखण्ड के वास्तविकता को जानते हुए भी उन्हें सत्य स्वीकार कर लें? ऐसा तो मेरे वश का नहीं! मेरे वश का कदापि नहीं, क्योंकि असत्य-अधर्म विनाशक और सत्य-धर्म संस्थापक एवं संरक्षक होने-रहने के कारण मुझसे ऐसा हो ही नहीं सकता। वास्तविकता तो यह है कि जीव, ईश्वर और परमेश्वर आदि तीनों की जानकारी तो इन्हें होती नहीं, प्राय: शरीर से हटकर मात्र ज्योति को ही कुछेक जान-देख पाते हैं, हालाँकि इनमें से अधिकतर यह भी समझ नहीं पाते कि साधनात्मक ध्यान के अन्तर्गत जिस ज्योति का दर्शन करते हैं, वह पंच पदार्थ तत्वों की है अथवा आत्मा-ईश्वर- ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट की । यदि ये शरीर और ज्योति मात्र, दो को ही मान-जान पाये हैं जिसे चेतन दिव्य-ज्योति, चेतन-दिव्य-ज्योति, चेतन-दिव्य-ज्योति कहकर गुण गाते हैं और जगत् सहित शरीर को जड़ कह-कह कर निन्दा करते हैं तो इनके दृष्टि में तो जड़-चेतन ब्रम्हाण्ड में दो ही रूप हैं।

ये उपर्युक्त योगी-साधक-अध्यात्म वाले जगत् सहित शरीर को जड़ तथा जीव-ईश्वर-परमेश्वर आदि तीनों उपाधियों वाले को चेतन ज्योति है– ऐसा ही नाजानकारी एवं नासमझदारीवश मानने वाले हैं। इनके दृष्टि में आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह तो चेतन है ही, बस यही चेतन ही जीव और परमेश्वर भी हैं अर्थात् जीव-ईश्वर और परमेश्वर अथवा रूह-नूर और अल्लाहतआला अथवा सेल्फ-सोल एण्ड गॉड अथवा नूर-सोऽहँ-हँसो-ज्योति-शिव और परमतत्त्वम् रूप आत्मतत्त्वम् शब्दरूप भगवत्तत्त्वम् तीनों ही एक ही चेतन के विभिन्न नाम-उपाधियाँ हैं । ये लोग समझ ही नहीं पाते कि जीव और परमेश्वर अथवा रूह और अल्लातऽला अथवा सेल्फ और गॉड दोनों ही इस आत्मा-ईश्वर- ब्रम्ह-नूर-सोल-स्पिरिट से भिन्न-भिन्न हैं अथवा पृथक्-पृथक् हैं । उपर्युक्त तथाकथित महानुभाव लोग शरीरस्थ जीवात्मा रूप हँस को ही परमात्मा-परमेश्वर- परमब्रम्ह-खुदा-गॉड आत्मतत्त्वम्

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