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भरणी श्राद्ध से पायें पुण्य और कालसर्पदोष के कष्ट से निवारण

भरणी श्राद्ध से पायें पुण्य और कालसर्पदोष के कष्ट से निवारण

प्राचीन काल से मान्यता है कि श्रवण और भरणी नक्षत्र में किए गए पूण्यकार्य से  पाप एवं शाप की निवृत्ति होती है। भरणी नक्षत्र में किए गए दान एवं कर्म से पितरों को लाभ होता है जिससे जीवन में सुख तथा समृद्धि की वृद्वि होती है। भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र होता है अतः भरणी नक्षत्र में जन्म लिए जातक सुख सुविधाओं एवं ऐसो आराम चाहने वाले होते हैं। इनके जीवन में प्रेम तथा लगाव का विषेष महत्व होता है। चूॅकि भरणी नक्षत्र के जातक की राषि मेष होगी अतः इस नक्षत्र के जातक के व्यवहार में मंगल का प्रभाव अनुकूल होने से साहस, उर्जा तथा महत्वाकांक्षा का समावेष होता है। भरणी नक्षत्र के जातक के जब भी मंगल अथवा शुक्र उपरोक्त नक्षत्र से गुजरता है तो अपना भावानुसार अनुकूल फल जरूर देने में समर्थ होता है। अतः भरणी नक्षत्र में किए गए दान और विषेषकर पितरों की मुक्ति हेतु किए गए प्रयास में लाभ होता है। अतः इस नक्षत्र में पितरपक्ष में किए गए कर्म से जीवन में पुण्य की प्राप्ति होती है साथ ही हानि तथा कष्ट का निवारण होता है। जिन जातकों की कुंडली में पितरदोष है, जिसमें राहु किसी प्रकार से शुक्र या मंगल को पीडि़त कर रहा हो तो उसे भरणी नक्षत्र का श्राद्धकर्म अवष्य करना चाहिए, जिससे कालसर्प दोष दूर होकर जीवन में समृद्धि प्राप्त होती है साथ ही इस नक्षत्र वाले जातको को दुर्गा सप्तषती का जाप या मंगल की उपासना भी करना लाभकारी होता है।

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