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|| ज्योतिर्विद्या लोकहिताय ||
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भोग कारक शुक्र और बारहवां भाव

द्वादश भाव को प्रान्त्य, अन्त्य और निपु ये तीन संज्ञायें दी जाती हैं और द्वादश स्थान (बारहवां) को त्रिक भावों में से एक माना जाता है, अक्सर यह माना जाता है कि जो भी ग्रह बारहवें भाव में स्थित होता है वह ग्रह इस भाव की हानि करता है और स्थित ग्रह अपना फल कम देता है। बलाबल में भी वह ग्रह कमजोर माना जाता है, लेकिन शुक्र ग्रह बारहवें भाव में धनदायक योग बनाता है और यदि मीन राशि में बारहवें भाव में शुक्र हो तो फिर कहना ही क्या? कारण यह है कि शुक्र बारहवें भाव में काफी प्रसन्न रहता है क्योंकि बारहवां भाव भोग स्थान है और शुक्र भोगकारक ग्रह, इसी कारण इस भाव में शुक्र होने से भोग योग का निर्माण करता है, चंद्र कला नाड़ी की मानें तो- व्यये स्थान गते कात्ये नीचांशक वर्जिते। भाग्याधिपेन सदृष्टे निधि प्राप्तिने संशयः।। यानि- शुक्र द्वादश स्थान में स्थित हो और नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो ऐसा मनुष्य निधि की प्राप्ति करता है। अर्थात शुक्र की द्वादश स्थान में स्थिति अच्छी मानी गई है। भावार्थ रत्नाकार में कहा गया है- शुक्रस्य षष्ठं संस्थानं योगहं भवति ध्रुवम्। व्यय स्थितस्य शुक्रस्य यथा योगम् वदन्ति हि।। अर्थात – शुक्र छठे स्थान में स्थित होकर उतना ही योगप्रद है जितना की वह द्वादश भाव में स्थित होकर योगप्रद है। उत्तरकालामृत में कहा गया है कि – ‘षष्टस्थो शुभ कृत्कविः यानि छठे स्थान में शुक्र की स्थिति इसलिये अच्छी मानी जाती है, क्योंकि बारहवें भाव में उसकी पूर्ण दृष्टि रहती है, जिस कारण वह भोगकारी योग बनाता है। इस तरह शुक्र की बारहवें भाव में स्थिति भोग योग बनाती है और भोग बिना धन के संभव नहीं है अतः यही भोग योग धन योग भी बन जाता है। जिन व्यक्तियों के बारहवें भाव में शुक्र स्थित होता है, वे बहुधा योग सामग्री द्वारा अपना जीवन सुविधा से चला लेते हैं। यदि अधिक धनी न हों तो दरिद्री को भी प्राप्त नहीं होता। परंतु जब यह ग्रह शुक्र लग्न के साथ सूर्य लग्न से व चंद्र लग्न से भी द्वादश हो या किन्हीं दो लग्नों में द्वादश स्थान में स्थित हो तो दो लग्नों से द्वादश स्थान में होने के कारण शुक्र दुगुना योगप्रद हो जाता है और तीनों लग्नों से द्वादश हो तो सोने पर सुहागा वाली बात होगी, ऐसी स्थिति में शुक्र अतीव शुभ योग देने वाला, महाधनी बनाने वाला बन जाता है- भावार्थ रत्नाकर के अनुसार – यह भाव कारको लग्नाद् व्यये तिष्ठति चेद्यदि। तस्य भावस्थ सर्वस्य भाग्य योग उदीरितः।। यानि – इस भाव से जातक को विषयक बातों का लाभ होगा, जिस भाव का कारक लग्न से द्वादश भाव में स्थित हो शुक्र जाया (पत्नी) भाव का कारक ग्रह है, अतः जिन जातकों के बारहवें भाव में शुक्र रहता है, उन्हें स्त्री सुख में कभी कमी नहीं होगी, प्रायः ऐसे व्यक्तियों की पत्नी दीर्घजीवी हुआ करती है।

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