वैज्ञानिकों की सर्वदा एक जिज्ञासा रही है कि ग्रह मानवीय जीवन पर कैसे असर डालते हैं। भौतिक जीवन में ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य के कर्म ही उसके फल का कारण होते हैं जबकि ज्योतिष के अनुसार मनुष्य ग्रहों के प्रभाव से बंधा हुआ है और वह वही करता है जो ग्रह उससे करवाते हैं।
इस तथ्य की परख कैसे की जाए क्योंकि यदि कुछ फल प्राप्त है तो कुछ कर्म भी हुआ होगा। ऐसा ग्रहों के कारण हुआ या कर्म के कारण यह कैसे जानें? यदि कोई डाॅक्टर बना तो अपनी मेहनत के कारण या ग्रहों के कारण? इसी प्रकार अमीर होना, स्वस्थ होना या विजयी होना व्यक्ति विशेष के भाग्य में, उसकी कुंडली में विदित था या इसके निमित्त उसने मेहनत की?
वैज्ञानिक स्तर पर इस तथ्य की परख हम केवल सांख्यिकी द्वारा कर सकते हैं। इसके लिए हम अनेक जातकों के जन्म विवरण एकत्रित करते हैं और उन्हें दो भागों में बांट लेते हैं – कुछ डाॅक्टरों की कुंडलियां एवं कुछ अन्य व्यवसायियों की। इसी प्रकार अमीर व गरीब की। तदुपरांत दोनों समूहों में ग्रहों की बारंबारता को गिनते हैं। यदि दोनों समूहों में किसी ग्रह का किसी विशेष राशि या भाव में अधिक अंतर आता है तो यह ग्रह उस स्थिति में समूह की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। इस प्रकार सभी ग्रहों का विभिन्न राशियों, भावों, नक्षत्रों आदि में अंतर देखने पर यह ज्ञात हो जाता है कि कौन सी स्थिति उसके अनुरूप है और कौन सी विपरीत।
चिकित्सकों के वर्ग में मंगल का दषम भाव से संबंध दूसरे वर्ग की तुलना में बहुत अधिक प्रभावी होता है। बुध और शनि का योग भी दषम भाव में बहुत अधिक पाया गया। विष्लेषण से ज्ञात हुआ कि छात्र ने पढ़ा तो सही लेकिन उसका चिकित्सक बनना ग्रहों से नियंत्रित था। सैकड़ों हृदय रोगियों की जन्मपत्रियां एकत्र की गईं और पाया गया कि गुरु, शुक्र, सूर्य दूसरे भाव में, चंद्र और राहु लग्न में, मंगल चैथे में, बुध दशम में एवं शनि नवम में आदि योग ही हृदय रोग उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार डीएनए के द्वारा यह जाना जा सकता है कि मनुष्य को कौन सा रोग हो सकता है, उसी प्रकार ग्रह स्थिति द्वारा भी रोग की पूर्व जानकारी हो सकती है।
लगभग 400 दम्पतियों की जन्मपत्रियों के मिलान से स्पष्ट हुआ है कि मंगल विशेष रूप से केवल प्रथम भाव में दुष्प्रभावी होता है। साथ ही अन्य ग्रह भी अलग-अलग स्थानों में अनपेक्षित फल देते हैं जैसे सूर्य तृतीय भाव में, चंद्रमा द्वादश में, बुध व शुक्र द्वितीय में, गुरु षष्ठ में, शनि दशम में व राहु एकादश में। इन सांख्यिकीय सूत्रों के अनुसार हम दो जातकों के समन्वय से 80 प्रतिषत तक सटीक फलकथन कर सकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जातकों की आपसी समझ-बूझ ही समन्वय बनाने में पूर्ण सक्षम नहीं है, बल्कि यह समझ-बूझ भी ग्रहों की देन है।
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