अवतार की लीलाएं
अवतार प्रक्रिया आदिकाल से चली आ रही है और आदिकाल से अब तक मनुष्य जाति ने अनेक प्रकार के उतार-चढाव देखे हैं। स्वाभाविक ही भिन्न-भिन्न कालों में समस्यायें और असन्तुलन भिन्न-भिन्न प्रकार के रहे हैं। ईश्वर इस धरती पर समय-समय पर अवतार लेकर अपनी लीलाएं करता है।

युग प्रवाह को उलटने
जिस प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुई है, तब उसी का समाधान करने के लिए एक दिव्य चेतना, जिसे अवतार कहा गया है प्रादुर्भूत हुई है और उसी क्रम से अवतार, युग प्रवाह को उलटने के लिए अपनी लीलाएं रचते रहे है। सृष्टि के आरम्भ में जल ही जल था। प्राणी जगत में जलचरों की ही प्रधानता थी, तब उस असंतुलन को मत्स्यावतार ने साधा। जब जल और थल पर प्राणियों की हलचलें बढी तो उनके अनुरूप क्षमता सम्पन्न कच्छप काया ने सन्तुलन बनाया। उन्हीं के नेतृत्व में समुद्र-मन्थन के रूप में प्रकृति दोहन का पुरुषार्थ सम्पन्न हुआ।

संचय की-प्रवृत्ति
हिरण्याक्ष समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूंढ़कर उसे अपने ही एकाधिकार में कर लिया तो भगवान् का वाराह रूप ही उसका दमन करने में समर्थ-सक्षम हो सका। जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमाने में समर्थ हो गया तो संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित संचय की-प्रवृत्ति भी बढी। संचय और उपभोग की पशु प्रवृत्ति को उदारता में परिणत करने के लिए भगवान् वामन के छोटे बौने और पिछडे़ लोग उठ खड़े हुए और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्तियों को स्वेच्छापूर्वक उदारता अपनाने के लिए सहमत कर लिया गया।
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