कालसर्प दोष क्या है? जानिए कुंडली में इसका महत्व
वैदिक ज्योतिष में कालसर्प दोष एक चर्चित विषय है। कुंडली में राहु और केतु की स्थिति तथा उनके बीच आने वाले अन्य ग्रहों के आधार पर कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में कालसर्प योग या दोष की चर्चा की जाती है।
हालांकि इसके बारे में अलग-अलग ज्योतिषीय मत पाए जाते हैं। इसलिए केवल कालसर्प दोष का नाम सुनकर डरना या पूरी कुंडली को नकारात्मक मान लेना उचित नहीं है।
कालसर्प दोष क्या होता है?
पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार जब कुंडली में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि जैसे प्रमुख ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित हों, तो इसे कालसर्प योग कहा जाता है।
राहु और केतु हमेशा एक-दूसरे के विपरीत स्थित होते हैं। इसलिए उनकी धुरी के बीच ग्रहों की स्थिति को विशेष रूप से देखा जाता है।
कालसर्प दोष के प्रकार
ज्योतिष की विभिन्न परंपराओं में राहु और केतु की भाव स्थिति के आधार पर कालसर्प योग के अलग-अलग नाम बताए जाते हैं।
इनमें अनंत, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर और शेषनाग जैसे नामों का उल्लेख मिलता है।
हालांकि इन नामों और इनके प्रभावों को लेकर ज्योतिषियों के बीच अलग-अलग मत हो सकते हैं।
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