व्रत एवं उपवास की कुछ प्रमुख आरतियाॅं
श्री गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
मता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
पन चढ़े फूल चढ़ें और चढ़ें मेवा।
लडुवन का भोग लगे सन्त करे सेवा।।
एकदन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी।।
अन्धन को आॅंख देत कोढ़िन को काया।
बाॅंझन को पुत्र देत निर्धन मो माया।।
दीनन की लाज राखो शम्भु-सुत वारी।
कामना को पूरा करो जग बलिहारी।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
’सूरश्याम’ शरण आये सुफल कीजे सेवा।।
श्री जगन्नाथ जी की आरती
आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी,
चरणविन्द आपदा हारी।
निरखत मुखारविन्द आपदा हारी,
कंचन धूप ध्यान ज्योति जगमागी।
अग्नि कुण्डल घृत पाव सथरी।। आरती’’’
देवन द्वारे ठाड़े रोहिनी खड़ी,
मारकण्डे श्वेत गंगा आन करी।
गरूण खम्भ सिंह पौय यात्री जुड़ो,
यात्री की भीड़ बहुत बेंत की घड़ी।। आरती’’’
सुर नर मुनि द्वारे ठाड़े वेद उचारे,
धन्य-धन्य सूरश्याम आज की घड़ी।। आरती’’’
श्री गंगा जी की आरती
ऊॅं जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवाॅछित फल पाता।।
चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता।।
पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता।।
एक ही बार जो तेरी शरणागति आता
यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता।।
आरती मातु तुम्हारी जो जन नित गाता।
दास वही सहज में मुक्ति को पाता।।
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