करागे्र वसते लक्ष्मी करमध्ये च सरस्वती।
करमूले च गोविन्दम् प्रभाते कर दर्शनम्।।
भावार्थ- कर अर्थात हाथ, अग्रे अर्थात अगला भाग अर्थात अग्रिम भाग, वसते- निवास करना, लक्ष्मी- धन (संपदा, सुख, वैभव) करमध्ये- हाथ का बीच का भाग, च- और, सरस्वती वाणी, वाक की देवी अर्थात विद्या की देवी, करमूले- हाथ का मूल स्थान, अर्थात हथेली व भुजा का संगम स्थल जहां से भाग्य हाथ शुरू होता है, अर्थात कलाई, गोविन्दम्- ईश्वर, प्रभाते- प्रात:काल, कर दर्शनम्- दर्शन करना।
अर्थात हाथ के अग्र भाग में अर्थात अंगुलियों पर लक्ष्मी का वास होता है और हाथ के मध्य हथेली में सरस्वती निवास करती हैं, तथा हाथ के मूल में ईश्वर का निवास होता है क्योंकि सृष्टि का आदिमूल परमेश्वर है। इसलिए प्रात: काल में इनका दर्शन अवश्य करो।
लक्ष्मी का आदान-प्रदान अंगुलियों से गिनकर किया जाता है, इसलिए लक्ष्मी का निवास अंगुलियों पर बताया है, इसके अलावा सरस्वती देवी हथेली के मध्य में रहती है और इन दोनों के मूल में ईश्वर का निवास है अर्थात ईश्वर का निवास मूल स्थान में है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि लक्ष्मी व सरस्वती दोनों का एक साथ निवास करना सौभाग्यशाली होता है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू तथा सरस्वती का वाहन हंस है और जिस प्रकार उल्लू व हंस एक समय पर, एक स्थान पर नही रह सकते उसी प्रकार सरस्वती व लक्ष्मी मनुष्य के पास एक साथ नही रह सकते और यदि मनुष्य के पास दोनों एक साथ रहती हैं, तो वह मनुष्य ईश्वर की असीम अनुकंपा का पात्र होगा और ऐसे मनुष्य विरले हुआ करते हैं।
लक्ष्मी मनुष्य को अहंकार प्रदान करती है। अहंकार अज्ञानता की निशानी है। सरस्वती का वाहन हंस शुभ्र, श्वेत, धवल निर्मल होता है और श्वेत ज्ञान का प्रतीक है। इसलिए अहंकार और ज्ञान जिस प्रकार एक जगह नही रह सकते, उसी प्रकार लक्ष्मी व सरस्वती एक जगह नही रह सकती। यह कठिन ही नही बल्कि असंभव है, लेकिन जो ज्ञानी पुरूष होते हैं, उनके यहां लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ निवास कर सकती हैं, परंतु तब निवास कर सकती हैं जबकि लक्ष्मी व सरस्वती दोनों के मूल में मनुष्य ने प्रथमत: जगदाधार ईश्वर को रखा है, जो ईश्वर आदिमूल है। अर्थात ईश्वर को प्रथमत: रखने वाला मनुष्य लक्ष्मी एवं सरस्वती दोनों की कृपा का पात्र होगा।
हाथ मनुष्य की कर्मेन्द्रिय है, मनुष्य के शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां व पांच ही कर्मेन्द्रियां होती हंै। हस्त इंद्रिय हाथ के ऊपर रहती है, जो लेनदेन की क्रिया समय अनुसार करती है। हाथों पर इंद्र देवता का निवास होता है। इसलिए अपने हाथों को (अपनी हस्त इंद्रियों को) हमेशा ही इंद्र के समान परमार्थ, परोपकार, लोकोपकार के कार्य में लगाना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर, लाभकारी, गुणकारी होता है। प्रात:काल में इसलिए अपनी हस्त इंद्रियों का दर्शन उपरोक्त विचार एवं प्रकार से अवश्य करना चाहिए। तभी जीवन सफल, सुफल, समृद्घ एवं परमार्थी तथा अंत में मुमुक्ष होकर मोक्ष पद प्राप्त करने में सफल होता है।
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