संभाव्य वर एवं वधू के स्वभाव, मानसिक स्तर, पसन्द एवं नापसंद की परख जन्मकुण्डली में ग्रहों की स्थिति के विष्लेषण एवं दोनों की कुण्डलियों में मौजूद ग्रहों के आधार पर किया जाता है। यदि दोनों साथियों के गुणों में अधिकतम समानता है तो उनके बीच प्रेम, सौहार्द तथा एक-दूसरे के प्रति एवं परिवार के प्रति आकर्षण निश्चित है। यदि स्थिति इसके विपरीत है तो दोनों का दाम्पत्य संबंध तनावपूर्ण, दुःखी एवं समस्याग्रस्त होगा तथा ऐसी स्थिति में कालान्तर में सम्बन्धों में दरार पड़ना भी अवश्यंभावी हो जाता है। अतः हमेशा यह सलाह दी जाती है कि पति-पत्नी के बीच चिर स्थायी सम्बन्धों की स्थापना, प्रेम तथा सामंजस्य को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य रूप से कुण्डली मिलान को प्राथमिकता दी जाय। यदि कुण्डली मिलान में दोनों के अधिकतम गुण मिलते हैं तो यह संभावित है कि दोनों के बीच गहरा प्रेम एवं एक-दूसरे तथा परिवार के लिए त्याग की भावना होगी। कुण्डली मिलान में खासतौर पर इन तथ्यों को दृष्टिगत रखना आवश्यक है:
1 2 आगे के अध्यायों में हम हरेक सिद्धान्त की विवेचना विस्तृत रूप से करेंगे जिन्हें कुण्डली मिलान के लिए आवश्यक समझा जाता है तथा जो विवाहोपरान्त पारस्परिक समझ, विश्वास, शान्ति, सौहार्द, खुशी तथा समृद्धि को सुनिश्चित करने में सहायक होते हैं। हम इसका श्री गणेश अष्टकूट मिलान के साथ कर रहे हैं तथा अलग-अलग अध्याय में हम एक-एक कर इन आठों घटकों के हर पहलू की विस्तृत विवेचना करेंगे।
अष्टकूट मिलान मंगल दोष एवं इसका परिहार
कुण्डली मिलान के कुल आठ घटक होते हैं जिन्हें अष्टकूट के नाम से जाना जाता है। इन आठ कूटों को कुल 36 गुण आवंटित किए गए हैं किन्तु हर कूट के गुणों की संख्या अलग-अलग 1 से लेकर 8 तक है। छात्रों के हित को ध्यान में रखते हुए नीचे गुणों की सारणी प्रस्तुत की जा रही है। हर कूट को निश्चित संख्या में गुण आवंटित किए गए हैं जो निम्नलिखित हैं:
वर्ण को क्यों सिर्फ 1 ही गुण आवंटित किया गया है जबकि नाड़ी को 8 गुण ? इस प्रश्न का कोई भी स्पष्ट एवं संतोषजनक उत्तर नहीं है क्योंकि किसी भी ज्योतिषीय ग्रन्थ अथवा पुस्तक मंे इस बात की चर्चा या व्याख्या नहीं है। लेकिन इतना तो निश्चित है तथा धर्मग्रन्थों में वर्णित है कि अष्टकूट के हर घटक को गुण आवंटित किया गया है तथा गुणों की कुल संख्या 36 है। ज्योतिर्विदों का ऐसा मानना है कि यदि कुण्डली मिलान में न्यूनतम 18 गुण मिल रहे हों तो विवाह किया जाने योग्य है। कुण्डली मिलान में गुणों की संख्या जितनी अधिक होगी आपसी सामंजस्य तथा मेल उतना ही उत्तम होगा। यदि दोनों के बीच मिलान में गण, भकूट एवं नाड़ी दोष मौजूद हों तो 36 में से कम से कम 21 गुण का मिलना आवश्यक है। नाड़ी स्वास्थ्य एवं संतान को इंगित करता है। स्वास्थ्य वैवाहिक जीवन एवं दाम्पत्य सुख के लिए सबसे महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य घटक है। सत्य ही कहा गया है- ‘यदि स्वास्थ्य नहीं तो कुछ भी नहीं।’ यही कारण है कि नाड़ी को सर्वाधिक 8 गुण आवंटित किए गए हैं जो अष्टकूट मिलान में किसी भी घटक का सर्वाधिक गुण है। भकूट संभावित पति-पत्नी का स्वभाव, उनके पसन्द-नापसंद, एक-दूसरे के प्रति आकर्षण आदि को निर्देशित करता है। दो अलग परिवारों के दो अलग-अलग एवं विपरीत लिंग के व्यक्तित्व के लोगों के बीच जिन्हें जीवन भर साथ निभाना है, उनके बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध रहेगा कि नहीं यह जाँचना आवश्यक है। इन्हीं कारणों से भकूट को दूसरा महत्वपूर्ण घटक माना गया है तथा अष्टकूट में इसे 7 गुण आवंटित किए गए हैं। योनि तीन प्रकार के प्राकृतिक गुणों- सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण को निर्दिष्ट करता है। योनि वर तथा कन्या के स्वभाव को प्रकट करता है। यह स्पष्ट करता है कि दोनों किस समूह से संबंध रखते हैं तथा यह भी निर्दिष्ट करता है कि क्या दोनों एक-दूसरे के इतने योग्य हैं कि आजीवन सुखपूर्वक साथ जीवन व्यतीत कर सकें या दोनों हमेशा कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते रहेंगे और एक-दूसरे का तथा परिवार का जीवन दयनीय तथा नारकीय बना देंगे ? अष्टकूट के सभी घटकों का मिलान आवश्यक है। आगे के अध्यायों में इन सभी घटकों का विश्लेषण एवं विवेचन किया जाएगा।
विवाह हेतु कुण्डली मिलान की कुछ अन्य पद्धतियाँ भी विद्यमान हैं किन्तु अष्टकूट मिलान पद्धति सर्वमान्य है तथा दो परिवारों के बीच सामंजस्य एवं समानता की जाँच के लिए, पति-पत्नी के आपसी संबंधों, प्रेम, मानसिक स्तर, दोष साम्य एवं दशा साम्य, दशा सन्धि, आयु तथा सुखी गार्हस्थ्य जीवनके लिए आवश्यक दूसरे तत्वों की जाँच एवं परख के लिए बिल्कुल पर्याप्त है।
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