प्राय : सभी व्यक्तियों से दैनिक जीवन में भूलें होती हैँ। कुछ भूले हमारी अज्ञानता के कारण होती है जबकि कुछ भूलें ऐसी होती है जो शीघ्र ही हमारी स्मृति में आ जाती है जिनका हमें ज्ञान होता है और हम उनमें सुधार लाते है। कभी-कभी ऐसी भी घटनाएं घटित होती है जो आश्चर्यजनक होती है परन्तु इन घटनाओं पर हम अपना ध्यान नहीं देते है । इन घटनाओं तथा भूलों को करते समय तक चेतना व्यक्ति को नहीँ होती परन्तु तुरन्त ही चेतना अथवा ज्ञान हो जाता है। ऐसा नहीं है कि भूले बीमारी के कारण अच्छा अस्वस्थता के कारण हो। ये भूले प्रतिदिन स्वस्थ व्यक्तियों द्वारा भी होती रहती हैँ। जैसे— .
1लिखने की भूल
2 छपने की भूल
3 पहचानने में भूल
4 परिचित व्यक्ति का नाम भूल जाना
5 बोलना कुछ चाहते हों परन्तु बोल कुछ जाना
6 वस्तुओं को निर्धारित स्थान पर न रखने की धूल
7 भ्रांतिपूर्ण क्रियाएँ एवं प्रतीकात्मक कार्य
8 बोलने की भूले।
उपरोक्त सभी प्रकार की भूलें दैनिक जीवन की विकृतियो के अन्तर्गत आती है मनोविश्लेषकों ने इन भूलों का कारण अन्तर्द्धन्द्र माना है। कुछ मनौवैज्ञानिक शारीरिक
अस्वस्थता, थकावट, को भी इन प्रकार की भूलों का कारणा मानते है। इन भूलों की व्याख्या इन दैनिक छोटी-मोठी भूलों का कारणा हमारा अचेतन मन है। ये भूले ध्येयपूर्ण होती है तथा इनसे दमित भावनाओं को सुख एवं संतोष प्राप्त होता है।
1. लिखने को भूल-दैनिक जीवन में लिखने संबंधो अनेक भूल होती है तो मनोविकृत दशा की परिचायक होती हैँ। इनमें प्राय: देखने में आता है कि हम लिखना कुछ चाहते है तथा लिख कुछ जाते हे। यह स्थिति अचेतन मन में इच्छाओं को व्यक्त करती है। फ्रायड का कहना है कि यह गलती इस बात का धोतक है कि लिखने वाले की रुचि लिखने में नहीं हैँ। एक युवती हम प्राय पत्र लिखते समय पत्र में पता की गलती कर देते है जैसे एक मित्र ने अपने मित्र को पत्र लिखा जिसमें वह लिखा “To Chicago, England” क्योंकि व
जाना चाहता था इंगलैंड और पहुंच गया शिकागो। अत: उसके अचेतन मन में इंग्लैंड कहीं
न-कहीं दबा पड़ा था जिसकी अभिव्यक्ति उसने पत्र में कर दी|
2. छापने की भूलें- जिस प्रकार दैनिक जीवन में लिखेने की भूलें होती है उसी प्रकार छपने को भूले भी होती हैँ। प्राय: छपने की भूले हो जाया करती है वयक्ति प्रेस में छपने के लिये जो व्यक्ति सामग्री व्यवस्थित करता है उसकी दमित भावना यदा कदा अभिव्यक्त हो
जाती है और जिन अक्षरों को व्यवस्थित करना चाहिये वे न होकर दूसरे हो जाते है। जैसे एक अखबर में छपा कि ‘हम स्वार्थभाव से इस अखबार का संपादन करते हैं ताकि सबको सत्य एवं नवीन समाचार प्राप्त हो सके’ ’छपना तो ‘नि:स्वार्थ था परंतु छप गया ‘स्वार्थ’
3.पहचानने की भूल -कभी-कभी ऐसा होता है कि हम परिचित व्यक्ति, स्थान तथा वस्तु को शीघ्र भूल जाते है तथा शीघ्र पहचान नहीं पाते। जब कभी किसी परिचित व्यक्ति को देखकर सोचना पड़े कि यह व्यक्ति कौन है तथा कहाँ का रहनेवाला है तो इसे पहचानने की भूल कहेंगे। ऐसा इसलिये होता है कि पर्याप्त समय बीत जाने के कारण स्मृति चिह्न विलुप्त हो जाते हैँ। परिणामत: इस प्रकार की भूलें घटित होती है। मनोविश्लेषणवादीयों
के अनुसार इस प्रकार की भूल अचेतन की दमित इच्छा के कारण होती है।
4. बोलना कुछ चाहते है परन्तु बोल कुछ जाते हैं-कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति को नाम लेकर बुलाना चाहते है तथा नाम दूसरे व्यक्ति का लेकर बुला देते है। ऐसा इसलिये होता है कि जिसका नाम लेकर बुला दिया जाता है वह कहीं-न-कहीं हमारी इच्छा रहता है तथा अचेतन में दबा रहता है तथा अवसर आने पर चेतन में आ जाता है। ऐसा विस्थापन के कारण होता है।
5. परिचित व्यक्ति का नाम भूल जाना -कभी-कभी हम परिचित व्यक्ति का नाम भूल जाते है। हम बार-बार प्रयास करते है कि नाम याद आ जाय पर याद नहीं आता। कभी-कभी हम पडोसी तथा सगे रिशतेदार का भी नाम भूल जाते है तथा इस प्रकार के भूलने पर आश्चर्य भी होता है। फ्रायड का इस संबंध में कहना है यदि कोई व्यक्ति अत्यन्त सुपरिचित व्यक्ति का नाम भूल जाता है या स्मरण करने में कठिन अनुभव करता है तो यह कहा जा पकता है कि वह व्यक्ति उस व्यक्ति को पसन्द नहीँ करता फ्रायड के अनुसार ऐसा इसलिये होता है कि हमने नामों को दमित कर लिया है। ऐसा कभी कभी व्यक्ति के प्रर्ती आक्रामक व्यवहार होने अथवा उसे नापसन्द किये जाने अथवा अधिक समय बाद मिलने के कारण होता है।
6.वस्तुओ को निर्धारित स्थान पर न रखने को भूल-वस्तुओं को निर्धारित स्थान पर न रखना, किसी की कोई वस्तु लेकर न लौटाना तथा भूल जाना, आदि दैनिक जीवन विकृतियाँ है। हम वस्तु को जो गलत स्थान पर रखते है उसके पीछे हमारा अचेतन मन है परन्तु हम कहते है कि ऐसा संयोगवश ही हुआ है कभी-कभी हम पेंसिल या रबर अपने हाथ में लिए रहते है तथा ढूंढने लगते है कि कहीं रख दिया। 7. शांतिपूर्ण क्रियाएँ तथा प्रतीकात्मक कार्य-अनजाने में की गई गलती भी दैनिक
जीवन की भूल के अन्तर्गत आती है। हम करना कोई कार्य चाहते है तथा कर कोई जाते हैं। प्राय: ऐसा होता है कि पत्नी पति से बाजार से कोई सामान मांगती है परन्तु सामान कोई आ जाता है और सामान लाना भूल जाते है । ऐसा दमित इच्छाओं के कारण होता है। बिल ने इस संबंध में एक उदाहरण दिया। एक डाक्टर ने भूल से अपने बीमार चाचा को जो
दवा देनी चाहिये थी उसके स्थान पर दूसरी दवा दे दी जिससे उसके चाचा की मृत्यु हो गई। उसे इस बात पर काफी दुख हुआ परन्तु विश्लेष्ण से ज्ञात हुआ कि उसके मन में चाचा के प्रति अचेतन मन में विद्वेष की भावना थी। इस प्रकार इस भूल में अचेतन मन की इच्छा व्यक्त हुई।फ्रायड के अनुसार प्रतीकात्मक या सांकेतिक क्रियाएँ भी दैनिक जीवन को मनोविकृति है। इन क्रियाओं का सामान्यत: कोई अर्थ नहीं होता फिर भी विश्लेषण से ज्ञात होता है कि ये क्रियाएँ सार्थक होती है। इनके द्वारा अचेतन दमित इच्छाएँ प्रकट होती है । उदाहरणार्थ दाँत पीसना, मुट्ठी बाँधना, बार-बार मूँछ ऐठना, सिर खुजलाना आदि। टिकट, पुस्तक, कलैण्डर अदि संग्रह भी अचेतन इच्छा का परिचायक होता है।
8. बोलने की भूले -कभी-कभी व्यक्ति ऐसी बाते कह जाता है जिसे वह कहना नहीं चाहता। ऐसा मात्र अचेतन के कारणा होता है। व्यक्ति को स्वयं आश्चर्य होता है कि ऐसा वह क्यूँ कह गया। फ्रायड के अनुसार इसका कारण अचेतन में दमित इच्छाएँ हैं जिन्हें वह व्यक्त करता है । ब्राउन ने एक उदाहरण प्रस्तुत किया। एक व्यक्ति को अपने पर बड़ा गर्व था । वह अपने मित्र को आदर के भाव से नहीं देखता था। एक दिन एक सभा मेँ उसे अपने मित्र के एक लेख पर बधाई देनी थी उसने बधाई है मेँ कहा कि “इस निम्न कोटि के लेख पर मैं अपने महान विचार प्रकट करता हूँ जबकि उसे कहना था कि इस उच्च कोटि के लेख पर मैं अपने अतिसाधारण विचार प्रकट करता हूँ यहीं उसने अपने दमित विचारों को ही प्रकट किया। फ्रायड ने एक उदाहरण के माध्यम से बोलने संबंधी भूल को स्पष्ट किया। वे एक रोगी महिला को दवा की पर्ची लिख रहे थे। रोगी महिला दवा के खर्च से परेशान थी अत: उसने कहा कि “मुझे इतना भारी बील न दे जिसे मैं निगल ही न पाऊँ।” यहीं बील से तात्पर्य पिल्स से था। ऐसी भूलें अचेतन की तरफ इंगित करती है।
सारांश रूप म कहा जा सकता है कि दैनिक जीवन में छोटी-छोटी भूलें दमित इच्छाओं की किसी-न-किसी रूप में पूर्ति करती है। इन भूलों का कोई-न कोई कारण अवश्य होता है। इसके पीछे इच्छा तथा आशय छिपा होता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दैनिक जीवन की मनोवृतियॉ आत्मगत होती है। अत: सार्वभौमिक व्याख्या नहीं की जा सकती फिर भी फ्रायड का कहना कहीँ-न-कहीँ महत्व रखता है।
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