धर्म और अध्यात्म अलग-अलग हैं या एक? इनका आपस में क्या रिश्ता है? रिलीजन एक इटालियन शब्द है, जिसका अर्थ है वह चीज जो हमें प्रभु के साथ जोड़े। धर्म के दो पहलू हैं -एक बाहरी और एक अंदरूनी। अंदरूनी पहलू, रूहानी पहलू है। यह अध्यात्म है। अंदरूनी लक्ष्य सबका एक ही है -कि कैसे हम परमेश्वर से मिलें। और जो बाहरी पहलू है जिसमें हम कर्मकांड करते हैं -वो सबका अलग-अलग है। लोग इसे ही धर्म या संप्रदाय कहते हैं। मूल रूप से धर्म और अध्यात्म दोनों जुड़े हुए हैं। लेकिन हम लोग अक्सर सिर्फ बाहर की चीजों में उलझ कर रह जाते हैं, अंदर क्या है उसको भूल जाते हैं। और इससे कई कर्म कांड शुरू हो जाते हैं।
एक कहानी सुनाता हूं। एक स्वामी जी थे, जो एक धर्म स्थान के पास सत्संग किया करते थे। जब सत्संग किया करते थे तो एक बिल्ली वहां आकर शोर मचाती थी। स्वामी जी ने सब सेवादारों से कहा कि बिल्ली को दूर बांधकर आया करो, तो उन्होंने बिल्ली को दूर बांधना शुरू कर दिया, ताकि सत्संग के वक्त शोर न हो। जैसे समय गुजरा उन स्वामी जी मृत्यु हो गई। एक नए स्वामी जी आ गए, वे भी पहले वाले स्वामी जी की ही तरह पूजा-पाठ और सत्संग करने लगे। कुछ समय बाद पुराने वाले सेवादारों की भी मृत्यु हो गई। तो अब नए सेवादार आ गए। इसके कुछ समय बाद बिल्ली की भी मौत हो गई। तब उन्होंने नई बिल्ली लाकर बांधनी शुरू कर दी। क्योंकि उन्हें लगा कि इतने समय से बिल्ली बांधी जाती थी। जरूर इसका कोई धार्मिक महात्म्य होगा। जब तक बिल्ली नहीं बंधेगी, तब तक भला सत्संग कैसे शुरू होगा। तो कर्म कांड ऐसे ही बनते हैं। हम भूल जाते हैं कि कारण क्या था, आंख पर पट्टी बांधकर हम उन्हें करते रहते हैं। हमें जानना चाहिए कि उसके पीछे उद्देश्य क्या है। अध्यात्म अनुकरण नहीं है, वो धर्म या विश्वास को अनुभव करना है। यह नहीं कि आंखें बंद करके किए जाओ। लेकिन हम सोचते हैं कि हमने अगरबत्ती जला दी, घंटी बजा दी, और काम हो गया। जब सभी धर्म एक ही बात कहते हैं, तो विभिन्न धर्मों के बीच इतनी लड़ाई क्यों होती है? हम विभिन्नता से इतने भयभीत क्यों रहते हैं?
क्योंकि हम सिर्फ अपनी समझ और अपने विचारों को ही ठीक मानते हैं। हम सोचते हैं कि जो कुछ हमने सोच लिया, जो हमने कह दिया या कर दिया वही ठीक है, बाकी सब गलत हैं। अलग – अलग संस्कृतियां हैं, अलग -अलग तरीके हैं, अलग-अलग सोच है। हम ये समझ नहीं पाते कि अपने आराध्य की पूजा कई तरीकों से की जा सकती है।
इसीलिए जब शांत अवस्था में बैठेंगे, अंतर में प्रभु के साथ जुड़ेंगें तो हमें यह विश्वास हो जाएगा कि सब एक हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी चमड़ी का रंग क्या है , कि हम पढ़े-लिखे कितने हैं , या हमारे पासकितना पैसा है। या हम पूर्व में मुंह कर के प्रार्थना करते हैं या पश्चिम में मुंह कर के।
दूसरों के बारे अज्ञानता अथवा उन्हें पूरी तरह न समझ पाने के कारण कई मुश्किलें पैदा होती हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि हम कुछ समय दूसरों को जानने-समझने के लिए दें। अगर हम समय निकालेंगे, समझने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि सभी धर्मों की बुनियाद तो एक ही है। और जब एक बार इंसान को अनुभव हो जाएतो फिर उसकी तरफ से सबकी ओर सिर्फं प्यार ही जाता है, खिंचाव नहीं।
एक कहानी सुनाता हूं। एक स्वामी जी थे, जो एक धर्म स्थान के पास सत्संग किया करते थे। जब सत्संग किया करते थे तो एक बिल्ली वहां आकर शोर मचाती थी। स्वामी जी ने सब सेवादारों से कहा कि बिल्ली को दूर बांधकर आया करो, तो उन्होंने बिल्ली को दूर बांधना शुरू कर दिया, ताकि सत्संग के वक्त शोर न हो। जैसे समय गुजरा उन स्वामी जी मृत्यु हो गई। एक नए स्वामी जी आ गए, वे भी पहले वाले स्वामी जी की ही तरह पूजा-पाठ और सत्संग करने लगे। कुछ समय बाद पुराने वाले सेवादारों की भी मृत्यु हो गई। तो अब नए सेवादार आ गए। इसके कुछ समय बाद बिल्ली की भी मौत हो गई। तब उन्होंने नई बिल्ली लाकर बांधनी शुरू कर दी। क्योंकि उन्हें लगा कि इतने समय से बिल्ली बांधी जाती थी। जरूर इसका कोई धार्मिक महात्म्य होगा। जब तक बिल्ली नहीं बंधेगी, तब तक भला सत्संग कैसे शुरू होगा। तो कर्म कांड ऐसे ही बनते हैं। हम भूल जाते हैं कि कारण क्या था, आंख पर पट्टी बांधकर हम उन्हें करते रहते हैं। हमें जानना चाहिए कि उसके पीछे उद्देश्य क्या है। अध्यात्म अनुकरण नहीं है, वो धर्म या विश्वास को अनुभव करना है। यह नहीं कि आंखें बंद करके किए जाओ। लेकिन हम सोचते हैं कि हमने अगरबत्ती जला दी, घंटी बजा दी, और काम हो गया। जब सभी धर्म एक ही बात कहते हैं, तो विभिन्न धर्मों के बीच इतनी लड़ाई क्यों होती है? हम विभिन्नता से इतने भयभीत क्यों रहते हैं?
क्योंकि हम सिर्फ अपनी समझ और अपने विचारों को ही ठीक मानते हैं। हम सोचते हैं कि जो कुछ हमने सोच लिया, जो हमने कह दिया या कर दिया वही ठीक है, बाकी सब गलत हैं। अलग – अलग संस्कृतियां हैं, अलग -अलग तरीके हैं, अलग-अलग सोच है। हम ये समझ नहीं पाते कि अपने आराध्य की पूजा कई तरीकों से की जा सकती है।
इसीलिए जब शांत अवस्था में बैठेंगे, अंतर में प्रभु के साथ जुड़ेंगें तो हमें यह विश्वास हो जाएगा कि सब एक हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी चमड़ी का रंग क्या है , कि हम पढ़े-लिखे कितने हैं , या हमारे पासकितना पैसा है। या हम पूर्व में मुंह कर के प्रार्थना करते हैं या पश्चिम में मुंह कर के।
दूसरों के बारे अज्ञानता अथवा उन्हें पूरी तरह न समझ पाने के कारण कई मुश्किलें पैदा होती हैं। इसलिए सबसे जरूरी है कि हम कुछ समय दूसरों को जानने-समझने के लिए दें। अगर हम समय निकालेंगे, समझने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि सभी धर्मों की बुनियाद तो एक ही है। और जब एक बार इंसान को अनुभव हो जाएतो फिर उसकी तरफ से सबकी ओर सिर्फं प्यार ही जाता है, खिंचाव नहीं।
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