ग्रहों में छिपा है कष्टों राज,जानें ? कौन सा ग्रह किस रोग को देता है आंमत्रण
सूर्य अनिष्ट हो तो क्या करे-अगर सूर्य अनिष्ट हो तो हृदय रोग, उदर संबधी विकार, नेत्र संबंधीरोग, धन-नाश, ऋण का बोझ, मान हानि, अपयश एवं ऐश्वर्य-नाश आदि होतेहैं। ऐसे में जातक को सूर्य नमस्कार,सूर्यपूजा,हरिवंश पुराण आदि का पाठ करना चाहिए। चन्द्र अनिष्ट हो तो क्या करे-अगर चन्द्र निर्बल या अनिष्ट हो तो मानसिक तनाव, दुर्बल मनःस्थिति, शारीरिक-आर्थिक परेशानी, फेफड़ा संबंधी रोग,माता को बीमारी-कष्ट, सिर दर्द आदि की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में कुलदेवी या देवता की उपासना करें।निःसन्देह लाभ मिलेगा और कष्टों से मुक्ति प्राप्त होगी।
मंगल अनिष्ट हो तो क्या करे-मंगल को भार द्वाज कुलोत्पन्न ग्रह कहा जाता है।इसे क्षत्रिय जाति, रक्तपूर्ण एवं पूर्व दिशा का अधिष्ठाता कहा गया है।सूर्य, चंद्र एवं बृहस्पति इस की मित्र राशियां हैं।
मंगल प्रधान जातकों का भाग्योदय प्रायः 28वें वर्ष में होता है।मनुष्य में विज्ञान एवं पराक्रम की अभिव्यक्ति मंगल ग्रह के फलस्वरूप ही होती है।राजनेताओं की हत्या के पीछे अशुभ मंगल की अहम भूमिका होती है।क्योंकि यह भाई से विरोध, अचल सम्पत्ति में विवाद, सैनिक-पुलिस कार्रवाई, आग, हिंसा, चोरी, अपराध और ग ुस्सेकाकारकहै।इस सेजिगर के रोग, होंठ फटना आदि स्थितियां भी उत्पन्न होती हैं। ऐसे में हनु मान जी की उपासना-जैसे सुन्दरकांड, हनु मान बाहुक, हनुमद्स्तोत्र, हनुमान चालीसा आदि का पाठ करें और प्रसाद चढ़ा कर लोगों में बांटें। ध्यान रहे, वह प्रसाद खुद न खाएं।
बुध अनिष्ट हो तो क्या करे-बुध को प्राचीन शास्त्रों में भारद्धाजकुलोत्पन्न ग्रह माना गयाहै। यह शूद्रजाति, हरित वर्ण तथा पश्चिम दिशा का स्वामी है। जीवन के 32वें वर्ष मे भाग्योदय कराता है।बुध के मित्र सूर्य, शुक्र एवं बृहस्पतिहैं। यह चतुरता, शीघ्रता एवं बल का कारक है।इसका प्रमाण श्रीकृष्ण की कुंड़ली में मिलता है।भगवान कृष्ण की कुंड़ली में पांचवें न के उच्च बुध ने उनको इतना बड़ा बुद्धि जीवी, कूटनीतिज्ञ तथा ज्ञानी बना याजो ’गीता’ के ज्ञान से परिलक्षित होता है।अगरबुध बद स्थिति में हो तो पथरी, बवासीर, ज्वर, गुर्दा, स्नायु रोग अथवा दन्तविकारादि होते हैं। ऐसे मे दुर्गासप्त शती काकवच, कीलक एवं अर्गलास्तोत्र का पाठ करें।
बृहस्पति अनिष्ट हो तो क्या करे-उत्तर दिशा का स्वामी बृहस्पति देवताओं का गुरू है।इसकी कृपा मात्र से ही संसार को ज्ञानऔर गरिमा की प्राप्ति होती है। यह अपनी चमक से संसार को चमत्कृत कर देता है। यह 16वें वर्ष से भाग्योदय कराने लगता है।अतः मीन एवं धनु राशि के जातकों की मेष तथा सिंह राशि के जातकों से मित्रता शुभ रहेगी। यदि बृहस्पति बद (अशुभ) हो तो पुत्र-हानि, संतान में बाधा, विवाह में परेशानी, स्वजनों से वियोग, पत्नी से तनाव एवं घर में विपन्नता होती है।तभी पीलिया, एकान्तिकज्वर, हड्डीकादर्द, दन्तविकार थापुरानी खांसी उभर कर आती है। ऐसे में जातक को हरिपूजन, हरिवंशपुराण या श्रीमद्भागवत का पाठ करना चाहिए।
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