“पुत्र-वियोग की पीड़ा के बाद भी अटूट ऊर्जा—पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी बने समाज के संबल और प्रतीक”
दुख के अंधकार से पुरुषार्थ के प्रकाश तक—पंडित जी की अदम्य वापसी ने समाज को दी नई प्रेरणा
रायपुर।
9 अगस्त 2025 का दिन पंडित प्रिय शरण त्रिपाठी और उनके पूरे परिवार के लिए मानो काल-प्रहार बनकर आया। उनके ज्येष्ठ पुत्र का हैदराबाद में एक भीषण कार दुर्घटना में असमय निधन हो गया। यह घटना इतनी आकस्मिक और दर्दनाक थी कि पूरा परिवार गहरे शोक-सागर में डूब गया।इस दुखद घड़ी में छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश भर से असंख्य श्रद्धालुओं और शुभचिंतकों ने पंडित जी के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त कीं। शोकसभा से लेकर अंत्येष्टि तक, हजारों की आँखें आँसुओं से भीगती रहीं। समाज ने पंडित जी को यह अनुभव कराया कि वे इस कठिन घड़ी में अकेले नहीं हैं।ईश्वर की असीम कृपा और जनता की आत्मीय संवेदनाओं के सहारे पंडित जी ने अपने मनोबल को सँभाला। पुत्र-वियोग की पीड़ा हृदय में सदा विद्यमान रहेगी, किंतु अपने अदम्य पुरुषार्थ और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वे एक बार फिर अपने कर्मपथ पर लौट आए हैं।
आज पंडित प्रिय शरण त्रिपाठी न केवल अपने नियमित कार्यों में पूरी निष्ठा से जुटे हैं, बल्कि पहले की ही तरह ऊर्जावान होकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। मीडिया कार्यक्रमों, धार्मिक अनुष्ठानों और निजी आयोजनों तक—जहाँ भी वे जाते हैं, वहाँ लोगों की भीड़ उन्हें सुनने और देखने के लिए उमड़ पड़ती है।यद्यपि कई लोग अब भी इस बात को लेकर झिझकते हैं कि इतने गहन शोक से गुजर चुके पंडित जी से किस प्रकार मिलें, परंतु जब उनसे साक्षात्कार या भेंट होती है, तो हर व्यक्ति की आँखें अनायास ही नम हो जाती हैं। उनकी दृढ़ता, सहनशीलता और ईश्वर में अटूट विश्वास हर मिलने वाले को भाव-विभोर कर देता है।
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