इस संसार से पलायन करने के दो मार्ग हैं- एक प्रकाश का और दूसरा अंधकार का। जब मनुष्य प्रकाश मार्ग से जाता है तो वह वापस नहीं आता और अंधकार मार्ग से जाने वाले को पुन: लौट कर आना होता है। (गीता – 8/26)
हम इंसानों के पास गीता के अनुसार जीवन जीने के दो मार्ग हैं। एक प्रकाश का मार्ग और दूसरा अंधकार का मार्ग। ज्ञान, सतकर्म, भक्ति और धर्म पूर्वक जीवन यापन करना प्रकाश मार्ग है और अज्ञानता, दुष्कर्म, अनैतिकता और अधार्मिक रूप से जीवन जीने को अंधकार मार्ग कहते हैं। मनुष्य जीवन ही अपनी आत्मा को प्रकाशित करने के लिए मिला है। जो मनुष्य प्रकाश मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा को प्रकाशित कर लेता है वह अंतत: परमात्मा में मिल जाता है और जो इस अमूल्य जीवन को अंधकार के रास्ते से जीते हैं उन्हें पुन: किसी न किसी योनि में भटकने के लिए इस मृत्यु लोक में आना होता है। मतलब इस भौतिक जीवन में सफलता-असफलता, दु:ख-सुख के चक्कर में पड़े रहना होता है, स्थायी समृद्धि नहीं मिल पाती। अब जब हम यहाँ प्रकाश की बात कर रहे हैं तो अग्नि की बात स्वत: होगी, क्योंकि अग्नि ही प्रकाश का मूल स्रोत है। अग्नि संभवत: इस सृष्टि का पहला शब्द है क्योंकि हमारा पहला वेद ऋगवेद का पहला अक्षर अग्नि ही है और इसलिए यह सभी ज्ञान का भी मूल स्रोत है। गीता में भगवान कृष्ण ने इसे ज्ञानाग्नि कहा है। सृष्टि के निर्माण काल से ही अग्नि की महत्ता अक्षुण्ण रही है और अनंत काल से ही अग्नि की महिमा को अनेको ऋषियों, मुनियों, संतो ने गाये हैं, गा रहे हैं और गाते रहेंगे, फिर भी अग्नि की महिमा का अंत नहीं।
इस पवित्र अग्नि से ही यह धरती हमेशा पावन होती रही है। इंसानों के सभी कर्मों की द्रष्टा और पापों का नाश करने वाली अग्नि ही है। वास्तव में अधिकतर मनुष्यों को इस रहस्य की जानकारी नहीं है कि हमारे वेदों में यह साफ-साफ निर्देश है कि चाहे मनुष्य किसी भी देवी देवता का पूजा-अर्चन कर ले, किसी की भी प्रार्थना कर ले, यज्ञ कर ले, कितना भी दान कर ले, सतकर्म कर ले परन्तु उसे तब तक उन सत्कर्मों का भी शुभ फल प्राप्त नहीं होगा जब तक कि अग्नि की कृपा उसके जीवन में नहीं मिलने लगती। मनुष्य जब तक अग्निरूपी प्रकाश के शरण में नहीं चला जाता तब तक उसके जीवन का दीया जगमगा नहीं सकता। अग्नि ही मनुष्य और परमात्मा के बीच का संदेश वाहक है। हमारे द्वारा किया जानेवाला पूजा-पाठ, यज्ञ,दान आदि को ईश्वर सीधे स्वीकार नहीं करते। पहले परमात्मा अग्नि के माध्यम से उस पूजा के पीछे की हमारी नियत और पवित्रता की परख कराते हैं और तब उसे स्वीकार अथवा अस्वीकार करते हैं। अग्नि की गवाही पर ही हमें हमारे भौतिक कर्मों का शुभ-अशुभ फल की प्राप्ति होती है। यदि अग्नि की कृपा आप पर नहीं है तो कितनी ही पूजा पाठ क्यों न कर लें, खूब दान क्यों न दे दें, अनेको तीर्थों का दर्शन कर आयें पर वे महज शुष्क कर्मकांड हीं बने रहते हैं और उनका यथोचित लाभ हमारे जीवन में नहीं मिल पाता।
अग्नि-ज्ञान सर्वव्यापी है और वह जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी के संबंध में पूर्ण जानकारी रखता है। आपके संबंध में भी पूर्ण जानकारी अग्नि के पास ही है। आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं? कहाँ जायेंगे? इस दुनिया में परमात्मा ने आपको क्यों भेजा है? आदि आत्म ज्ञान केवल अग्नि के समक्ष ही प्रकट हो सकता है। इसीलिए इन्हें जातवेदा कहा गया है।
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