॥ श्री लाङ्गूलास्त्र-शत्रुंजय-हनुमत्स्तोत्रम् पुरश्चरण विधि ॥
(भय-शत्रु-विनाश, अचूक रक्षात्मक और तेजस्वी हनुमत् स्तोत्र)
🔱 १. पुरश्चरण क्यों करें?
“श्री लाङ्गूलास्त्र शत्रुंजय हनुमान स्तोत्र” एक अत्यंत प्रभावकारी, तांत्रिक-आधारित हनुमान स्तोत्र है जो विशेषतः निम्न उद्देश्यों से जपा जाता है:
| उद्देश्य | प्राप्त फल |
|---|---|
| शत्रु-नाश | गुप्त, प्रकट, मानसिक, दैविक शत्रु नाश |
| अदृश्य रक्षात्मक कवच | बुरी दृष्टि, जादू-टोना, ग्रहबाधा से सुरक्षा |
| यात्रा व युद्ध सुरक्षा | सैनिक, पुलिस, वकील, राजनेता, साधक हेतु |
| तेज, साहस और अपराजेयता | कार्य सिद्धि और निर्भयता |
| भय, भूत, बाधा निवारण | मृत्यु तुल्य कष्टों से बचाव |
यह स्तोत्र हनुमानजी के “लाङ्गूलास्त्र” (पूंछ के दिव्य अस्त्र) के स्मरण से शक्ति उत्पन्न करता है — जैसा कि लंका दहन के समय हुआ था।
📘 २. स्तोत्र परिचय
शब्द रूप:
“ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय, लाङ्गूलास्त्राय शत्रुंजयाय…”
यह स्तोत्र सामान्यतः १५–२१ पदों का होता है, जिसमें हनुमान के पूंछरूपी अग्नियुक्त अस्त्र की शक्ति, शत्रु पर प्रहार, और तांत्रिक संरक्षण की स्तुति है।
🔢 ३. पुरश्चरण संख्या
| साधना स्तर | पाठ संख्या | साधना अवधि |
|---|---|---|
| लघु | १०८ पाठ | ७–११ दिन |
| मध्यम | १००८ पाठ | २१–४० दिन |
| पूर्ण | ११,००० पाठ | ४०–८४ दिन |
| गुप्त तांत्रिक प्रयोग | ११,००० + हवन | रात्रि साधना, विशेष अमावस्या / मंगलवार |
✔ एक पाठ = सम्पूर्ण स्तोत्र का एक बार पाठ
✔ प्रत्येक दिन समान संख्या का पाठ आवश्यक है
📍 ४. स्थान, समय, पात्रता
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थान | एकांत कक्ष, गुफा, उपवन, साधनास्थली, या हनुमान मंदिर |
| दिशा | पूर्व या उत्तर मुख से बैठना |
| समय | ब्रह्ममुहूर्त (4–6 AM) या मध्यरात्रि (10 PM–12 AM) |
| प्रारंभ दिन | मंगलवार, शनिवार, अमावस्या या हनुमान जयंती |
| व्रत नियम | ब्रह्मचर्य, सात्त्विक आहार, नित्य स्नान, मौन |
🌸 ५. साधन सामग्री
| वस्तु | विवरण |
|---|---|
| मूर्ति | हनुमानजी की वीर मुद्रा वाली चित्र/मूर्ति (लङ्गूल ज्वलन रूप) |
| दीपक | सरसों के तेल का |
| चंदन / सिंदूर | विशेषतः लाल सिंदूर |
| पुष्प | चंपा, गुड़हल, केवड़ा आदि |
| नैवेद्य | गुड़, केले, बूंदी लड्डू |
| आसन | कुश, ऊन या लाल वस्त्र |
| माला | रुद्राक्ष या तुलसी की माला (१०८ दाने) |
🪔 ६. दैनिक पुरश्चरण विधि
🧘♂️ १. संकल्प:
मम शत्रु-निवारणार्थं, भय-शान्त्यर्थं, आत्मतेजवृद्ध्यर्थं,
श्रीलाङ्गूलास्त्र-शत्रुंजय-हनुमत्स्तोत्रस्य (संख्या) पाठानां
पुरश्चरणं करिष्ये ॥
जल से संकल्प करें।
🔥 २. ध्यान:
मन्त्रेण प्रज्वालितलाङ्गूलम्, राक्षसविनाशकं,
भीषणं कालरूपं वीरं, वज्रदेहं नमाम्यहम्॥
हनुमान का ध्यान करें — पूंछ से लंका दहन करते हुए तेजस्वी रूप में।
📖 ३. मुख्य पाठ
- प्रतिदिन नियत संख्या में जप करें
- बीजमंत्र पूरक जप (पाठ से पूर्व/पश्चात):
ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय लाङ्गूलाय फट् ॥
१०८ बार पाठ से पूर्व या पश्चात करें — कवच स्वरूप प्रदान करता है।
🪔 ४. आरती व समर्पण:
आरती — “आरती कीजै हनुमान लला की…”
पुष्पांजलि, क्षमा प्रार्थना, शांति मंत्र:
ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणं अस्तु
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
🔥 ७. पूर्णाहुति / समापन
| क्रिया | विधि |
|---|---|
| हवन | हनुमान बीजमंत्र से १०८ आहुतियाँ |
| तर्पण | जल + तिल से ऋषि तर्पण |
| मार्जन | स्वयं पर जल छिड़कना |
| दान | उड़द, गुड़, लाल वस्त्र, दक्षिणा आदि का दान |
| गाय/बालक/कुत्ते को भोजन | श्रेष्ठ पुण्य |
🧾 ८. साधना ट्रैकर (उदाहरण)
| दिन | पाठ/दिन | कुल पाठ |
|---|---|---|
| ११ दिन | १० पाठ | १०८ |
| २१ दिन | ५० पाठ | १००८ |
| ४० दिन | २५ पाठ | १००० |
| ८४ दिन | १३ पाठ | ११,००० |
⚠️ ९. विशेष निर्देश
- मंगलवार को विशेष अर्पण करें:
- लाल चोला, सिंदूर, नारियल, केले, गुड़
- साधना के बीच किसी से चर्चा न करें
- यदि मध्यरात्रि साधना करें तो रुद्राक्ष की माला और त्राटक ध्यान साथ में रखें
- स्तोत्र के पूर्व “हनुमान चालीसा” या “बजरंग बाण” जोड़ना शुभ है
- किसी प्रकार का व्यसन या वाणी विकार पूर्णतः वर्जित
🔚 निष्कर्ष:
शत्रुशक्तिभिः पीड्यमानः साधकः यदि श्रद्धा से इस स्तोत्र का जप करे,
तो उसे स्वयं हनुमानजी की पूंछरूपी वज्र-लाङ्गूल कवच प्रदान करता है।
“यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिं”
हनुमानजी वहाँ अवश्य उपस्थित होते हैं।
श्री लांगुलास्त्र शत्रुन्जय हनुमान स्तोत्र
1-श्री लांगुलास्त्र शत्रुन्जय हनुमान स्तोत्र
– 2-श्री कपिन्द्रास्त्र हनुमान स्तोत्र
-3-श्री हनुमान वड़वानल स्तोत्र-
4-श्री सर्वकार्य सिद्विप्रद हनुमान स्तोत्र
-5-श्री संकष्टमोचन हनुमान स्तोत्र-
6-श्री हनुमद घोरास्त्र स्तोत्र-
आवाहन– ॐ हनुमन्तं महावीरं वायुतुल्य-पराक्रमम् । मम कार्यार्थमागच्छ प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥
विनियोग-ॐ अस्य श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमाला मंत्रस्य श्रीरामचन्द्रऋषिः, नानाच्छन्दांसि, श्रीमन्महावीरो हनुमान् देवता, मारुतात्मज इति हसौं बीजम् अञ्जनीसूनुरिति हृफ्रें शक्तिः, ॐ हाहाहा इति कीलकम्, श्रीरामभक्त इति हां प्राणः, श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर इति ह्रां ह्रीं हूंजीवः, ममाऽराति शत्रुञ्जय-स्तोत्र मालामंत्रजपे विनियोगः ।
दाहिने हाथ में जल लेकर ॐ अस्य श्री हनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्र-मालामन्त्रस्य से आरम्भ कर, मालामंत्रपजे विनियोगः, तक मंत्र पढ़कर जल छोड़ना चाहिए।
करन्यास– ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं स्फें फ्रें इस्त्रौं हस् हसौं नमो हनुमते अगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें कें इस्त्रौं हसौं रामदूताय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ह्स्त्रौं खफ्रें हस्ख्फ्रें हृसौं लक्ष्मणप्राणदात्रे मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं अञ्जनीसूनवे अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं सीताशोकविनाशनाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ ऐं श्रीं ह्मां ह्मीं हू्ं स्फ्रैं ख्फ्रैं हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं लंकाप्रासाद भंजनाय करतलकरपृषठाभ्यां नमः
हृदयादिन्यास-ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फैं ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं नमो हनुमते हृदयाय नमः ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं रामदूताय शिरसे स्वाहा।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें खफ्रें ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं लक्ष्मणप्राणदात्रे शिखायै वषट् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौंं अञ्जनीसूनवे कवचाय हुम् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रैं ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं सीताशोकविनाशनाय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय अस्त्राय फट् ।
ध्यानम्-ध्यायेद् बालदिवाकरद्युतिनिभं देवारिदर्पापहं । देवेन्द्रप्रमुखैः प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा ॥ सुग्रीवादिसमस्तवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं । संरक्ताऽरुण-लोचनं पवनजं पीताम्बरालङ्कृतम्॥ मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतांवरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥ वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डलमण्डितम् । नियुद्धमुपसङ्कल्पपारावारपराक्र मम् ॥गदायुक्तं वामहस्तं पाशहस्तं कमण्डलुम् । उद्यदक्षिणदोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ॥इति ध्यात्वा, ‘अरे मल्ल चटख’ त्युच्चारणेऽथवा ‘तोडरमल्ल चटख’इत्युच्चारणे कपिमुद्रां प्रदर्शयेत् ।
हनुमान मालामंत्र-
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं नमो हनुमते त्रैलोक्याक्रमण-पराक्रम श्रीराम-भक्त! मम परस्य च सर्वशत्रून् * चतुर्वर्णसम्भवान् पुरूष -स्त्री-नपुंसकान् भूत भविष्यद्-वर्तमानान् नानादूरस्थ-समीपस्थान् नाना-नामधेयान् नानासङ्करजातिकान् कलत्र पुत्र-मित्र भृत्य – बन्धु-सुहृत् समेतान् प्रभुशक्ति सहितान् धन-धान्यादिसम्पत्तियुतान् राज्ञो राजपुत्रसेवकान् मन्त्रि । सचिव-सखीन् आत्यन्तिकक्षणेन त्वरया एतद्-दिनावधि नानोपायैर्मारय मारय शस्त्रैश्छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय अक्षयकुमारवत्पादतला क्रमणेनाऽनेन शिलातले आत्रोटय आत्रोटय घातय घातय वध वध भूतसङ्घैः सह भक्षय भक्षय क्रुद्धचेतसा नखैर्विदारय विदारय देशादस्मादुच्चाटय उच्चाटय पिशाचवत् भ्रंशय भ्रंशय भ्रामय भ्रामय भयातुरान् विसंज्ञान् सद्यः कुरु कुरु भस्मीभूतान उद्धूलय उद्धृलय भक्तजनवत्सल ! सीताशोकापहारक! सर्वत्र माम् एनं च रक्ष रक्ष हाहाहा हुँहुँहुँ घेघेघे हुँफट् स्वाहाॐ नमो भगवते हनुमते महाबलपराक्रमाय महाविपत्ति-निवारकाय भक्तजनमन: कामना – कल्पद्रुमाय दुष्टजन- मनोरथ स्तम्भनाय प्रभञ्जन-प्राणप्रियाय स्वाहाॐ ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रः मम शत्रून् शूलेन छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय उच्चाटय उच्चाटयहूं फट स्वाहा
1 –श्री लांगुलास्त्र शत्रुन्जय हनुमान स्तोत्र–
श्रीमन्तं हनुमन्त-मार्तरिपुभिद् भूभृत्तरुभ्राजितं ।चाल्पद् बालधिबन्धवैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम् ॥अष्टौ रक्त-पिशङ्ग-नेत्र नलिनं भूभङ्गमङ्ग-स्फुरत् । प्रोद्यच्चण्ड-मयूख मण्डल-मुखं दुःखापहं दुःखिनाम्॥ कौपीनं कटिसूत्र-मौञ्ज्यजिनयुगदेहं विदेहात्मजा । प्राणाधीश पदारविन्दनिरतं स्वान्तं कृतान्तं द्विषाम् ॥ ध्यात्वैवं समराङ्गणस्थितमथानीय स्व-हृत्पङ्कजे । सम्पूज्या ऽखिल-पूजनोक्त विधिना सम्प्रार्थयेत् प्रार्थितम् ॥ हनुमन्नञ्जनीसूनो! महाबलपराक्रम ! लोलल्लाङ्गूलपातेत ममाऽरातीन् निपातय॥मर्कटाधिप! मार्तण्ड-मण्डल ग्रास कारक! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥अक्षयन्नापि पिङ्गाक्ष ! क्षितिशोकक्षयङ्कर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥रुद्रावतार ! संसार- -दुःख-भारापहारक! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय॥ श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायत मानस ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ बालिकोदरद-क्लान्त सुग्रीवोन्मोचनप्रभो।लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ सीता-विरह-वारीश मग्न-सीतेशतारक ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ रक्षोराज-प्रतापाऽग्नि-दह्यमान- जगद्धन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ ग्रस्ताऽशेष-जगत्-स्वास्थ्य राक्षसाम्भोधिमन्दर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ पुच्छ-गुच्छ-स्फुरद्-भूमि-जगद्-दग्धारिपत्तन । लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥जगन्मनो दुरुल्लंघ्य – पारावार विलङ्घन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ – ॥ स्मृतमात्र समस्तेष्टपूरक ! प्रणतप्रिय ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ ॥ रात्रिञ्चर-चमूराशि कर्तनैक-विकर्तन ! । लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ ॥ जानकी-जानकीज्यानि प्रेमपात्र परन्तप ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥भीमादिक महावीर-वीरा वेशावतारक ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥वैदेही-विरह क्लान्त रामरोषैक-विग्रह ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ वज्राङ्गनख-दंष्ट्रेश! बज्रिवज्रावगुण्ठनलोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥अखर्व गर्व गन्धर्व-पर्वतोद्भेदन-स्वर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ लक्ष्मणप्राण- सन्त्राण-त्रातातीक्ष्णकरान्वय! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ रामाधिविप्रयोगार्त भरताद्यार्तिनाशन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय ॥ द्रोणाचल-समुत्क्षेप-समत्क्षिप्तारि-वैभव!लोलल्लाड्ग्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातयसीताशीर्वाद संपन्न समस्ताऽवयवाक्षतलोलल्लाड्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय | इत्येवमश्वत्थ-तलोपविष्टः शत्रुञ्जयं नाम पठेत् स्तयं यः सशीघ्रमेवास्त समस्त – शत्रुः प्रमोदतेमारुतज-प्रसादात् ।॥ इति लांगूलास्त्र-शत्रुञ्जय-हनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
2 -श्री कपिन्द्रास्त्र हनुमान स्तोत्र-
ॐ अस्य श्रीकपिन्द्रामन्त्रस्य श्रीरामचंद्र ऋषिः । अनुष्टुपछन्दः । कपिमुखवीर हनुमान्देवता । हनुमानिति बीजम् । वायुपुत्र इतिशक्तिः। अञ्जनीसुत इति
कीलकम् । श्रीरामदूत हनुमत्प्रसादसिद्धयर्थे जपे- विनियोगः ।करन्यास- ॐ ह्रां अञ्जनीसुताय अंगुष्ठाभ्यां नमः ॐ ह्रीं रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नम: ॐ हूं रामदूताय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ हैं वायुपुत्राय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रौं अग्निगर्भाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रः ब्रह्मास्त्रनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।इतिकरन्यासः । हृदयादिन्यास-ॐ अञ्जनीसुताय हृदयाय नमःॐ रुद्रमूर्तये शिरसे नमः ॐ रामदूताय शिखायै नमःॐ वायुपुत्राय कवचाय हुम ॐ अग्निगर्भाय नेत्रत्रयाय वौषट् ॐ ब्रह्मास्त्र निवारण अस्त्राय फट,
ध्यान- वन्दे वानरनारसिंहखगराट्क्रीडाश्ववक्त्रान्वितं दिव्यालङ्करणं त्रिपञ्चनयनं देदीप्यमानं रुचा। हस्ताब्जैरसिखेट पुस्तकसुधाकुम्भांकुशाद्रीन् हलं खट्वाङ्गं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम्उद्यन्मार्तण्डकोटिप्रकटरुचियुतं चारुवीरासनस्थं मौञ्जोयज्ञोपवीतारुणरुचिरशिखाशोभितं कुण्डलम्॥ भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं ध्यायेद्देवं विधेयं पल्वगकुलपतिं गोष्पदीभूतवार्धिम् ॥ ॐ हनुमते नमः ।अञ्जनागर्भसम्भूत कपीन्द्रसचिवोत्तम। रामप्रिय नमस्तुभ्यं हनुमन् रक्ष सर्वदा॥ मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशन। शत्रून संहर मां रक्ष श्रियं दापय में प्रभो ॥ ॐ ह्मौं हस्फ्रेंं ख्फ्रौं हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं हनुमते नमः ।ॐ श्रीं महाञ्जनाय पवनपुत्रावेशयावेशय ॐ श्रीहनुमते फट्। सुग्रीवाय नमः अङ्गदाय नमः, सुषेणाय नमः, नलाय नमः, नीलाय नमः, जाम्बवते नमः, प्रहस्ताय नमः, सुवेषाय नमः । अञ्जनापुत्राय नमः, रुद्रमूर्तये नमः, वायुसुताय नमः जानकीजीवनाय नमः, रामदूताय नमः, श्रीरामभक्ताय नमः, महातेजसे नमः, कपिराजाय नमःमहाबलाय नमः, द्रोणाद्रिहारकाय नमः, मेरूपीठार्चनकारकाय नमः दक्षिणाशाभास्कराय नमः,सर्व विघ्नविनाशकाय नमः, हं हनुमते रूद्रात्मकाय हुं फटमहाशैलं समुत्पाट्य धावन्तं रावणं प्रतिलाक्षारसारुणं रौद्रं कालान्तकयमोपमम् ।ज्वलदग्निसमं जैत्रं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ अङ्गदाद्यैर्महावीरैर्वेष्टितं रुद्ररूपिणम् ।तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट सृजन्तं घोरनि:स्वनम् ॥ शैवरूपिणमभ्यर्च्य ध्यात्वा लक्षंजपेन्मनुम् ।ध्यायेद्रणे हनुमन्तं सूर्यकोटिसमप्रभम्।धावन्तं रावणं जेतुं दृष्टा सत्वरमुत्थितम् ॥लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले।गुरुं च क्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरुपर्वतम् ॥हाहाकारैः सदर्पैश्च कम्पयन्तं जगत्त्रयम् ।आब्रह्माण्डं समाव्यप्य कृत्वा भीमं कलेवरम् ॥ॐ यो यो हनूमन्त फलफलित धगधगिति आयुराष: षरूडाह। ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय मम् समस्त गुप्त शत्रुन् श्रृंखलां त्रोटय त्रोटय बन्धमोक्षं कुरु कुरु स्वाहा।ॐ हरि मर्कट मर्कट वामकरे परिमुञ्चति मुञ्चति श्रृङ्खलिकाम् । ॐ नमो हनुमते मम कपिराजाय नमः, महाबलाय नमः, मदन क्षोभं संहर संहर आत्मतत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हूं फट् स्वाहाॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखहनुमते करालवदनाय नारसिंहाय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रीं हः सकलभूत-प्रेतदमनाय स्वाहा।ॐ पश्चिममुखाय गरूडाननाय पञ्चमुखहनुमते मं मं मं मं मं सकलविषहराय स्वाहा।ॐ पूर्वकपिमुखाय पञ्चमुखहनुमते टं टं टं टं टं सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा।ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रीं ह्रः ॐ नमो भगवते महाबलपराक्रमाय भूतप्रेतपिशाच ब्रहह्मराक्षसशाकिनी-डाकिनीयक्षिणी पूतनामारी महामारी-राक्षसभैरव-वेताल ग्रहराक्षसा-दिकान् क्षणेन हन हन भञ्जन भञ्जन मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामाहेश्वररुद्रावतार ॐ हुं फट् स्वाहा। ॐ नमो भगवते हनुमदाख्याय रुद्राय सर्वदुष्टजनमुखस्तम्भनं कुरु कुरु स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ठं ठं ठं फट् स्वाहा।किलि किलि सर्वकुयत्राणि दुष्टवाचं ॐॐ नमो हनुमते सर्वग्रहान भूतभविष्यद्वर्तमानान् दूरस्थ समीपस्थान् छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि सर्व कालदुष्ट बुद्धीनुच्चाट-योच्चाटय परबलान क्षोभय क्षोभय मम सर्वकार्याणि साधय साधय ॐ नमो हनुमते ॐ ह्रां ह्रीं हूं फट् देहि ॐ शिव सिद्धिं ॐ ह्रां ॐ ह्रीं ॐ हूं ॐ हैं ॐ ह्रीं ॐ ह्रः स्वाहा ।ॐ नमो हनुमते परकृतयन्त्रमन्त्र- भूतप्रेत पिशाच पर दृष्टि सर्व विघ्न- टार्जनचे कु-विद्या सर्वोग्रभयान् निवारय निवारय वध वध लुण्ठ लुण्ठ पच पच विलुञ्च विलुञ्च किलि किलि किलि सर्वकुयन्त्राणि दुष्टवाचं ॐ ह्मां ह्मीं हूंफट स्वाहा, ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि एहि सर्वग्रहभूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां सर्वेषामाकर्षयाकर्षय मर्दय मदय छेदय छेदय मृत्युं मारय मारय भयं शोषय शोषय भूतमण्ड लपिशाचमण्डलनिर सनाय भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर विष्णुवर माहेश्वर-ज्वरान् छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि अक्षिशूलपक्षशूलशिरोऽभ्यन्तर शूलगुल्मशूल पित्तवातशूल- ब्रह्मराक्षस कुलपिशाच कुलप्रबलनाग कुलच्छेदनं विषं निर्विषं कुरु कुरु झटिति झटिति ॐ सर्वदुष्ट-ग्रहान्निवारणाय स्वाहा।ॐ नमो हनुमते पवनपुत्राय वैश्वानरमुखाय पापदृष्टि चोरदृष्टिपाषण्डदृष्टि हनुमदाज्ञा स्फुर ॐ स्वाहा ॥ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय वायुसुताय अञ्जनी गर्भसम्भूताय अखण्डब्रह्मचर्य व्रतपालनतत्पराय धवलीकृत जगत्त्रियाय ज्वलदग्निसूर्यकोटिसमप्रभाय प्रकट पराक्रमाय आक्रांतदिङ्मण्डलाय यशोवितानाययशोऽलं कृताय शोभिताननाय महासामर्थ्यायमहातेजःपुञ्जविराजमानाय श्रीरामभक्ति तत्परायश्रीरामलक्ष्मणानन्दकारणाय कपिसैन्यप्राकाराय सुग्रीवसख्यकारणाय-सुग्रीवसाहाय्यकारणाय ब्रह्मास्त्रब्रह्मशक्तिग्रसनाय लक्ष्मणशक्तिभेद निवारणायशल्यविशाल्यौषधिसभानाय नायवालो दितभानुमण्डलग्रसनाय अक्षकुमारच्छेदनाय वनरक्षाकरसमूह विभन्जनाय द्रोणपर्वतोत्पाटनायस्वामिवचनसम्पादितार्जुनसंयुग संग्रामायगम्भीरशब्दोदयाय दक्षिणाशामार्तण्डाय मेरुपर्वतपीठि कार्चनायदावानल-कालाग्निरुद्राय सीताऽऽश्वासनाय सीता रक्षकाय राक्षसीसंघविदारणाय अशोकवन-विदारणाय लङ्कापुरीदहनाय दशग्रीवशिरः कृन्तकाय कुम्भकणा ‘दिवधकारणाय वालिनिबर्हण-कारणाय मेघनादहोमविध्वंसनाय इन्द्रजिद्वध कारणाय सर्वशास्त्रपारंगताय सर्वग्रह विनाशकाय सर्वज्वरहराय सर्वभय निवारणाय सर्वकष्ट निवारणाय सर्वापत्ति निवारणाय सर्वदुष्टादिनिबर्हणाय सर्वशत्रुच्छेदनाय भूतप्रेत-पिशाच डाकिनी शाकिनीध्वंसकाय सर्वकार्य साधकाय प्राणिमात्ररक्षकाय रामदूताय स्वाहा ।ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारायविश्वरूपायप्रकटपराक्रमायअमितविक्रमाय महाबलायसूर्यकोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा ।ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय,रामसेवकाय रामभक्तितत्परायरामहृदयाय लक्ष्मणशक्तिभेदनिवारणायलक्ष्मण-रक्षकाय दुष्टनिबर्हणायरामदूताय स्वाहा ।ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारायसर्वशत्रुसंहरणाय सर्वरोगहरायसर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा।।ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय आध्यात्मिकाधि-दैविकाधि भौतिकतापत्रय-निवारणाय रामदूताय स्वाहा।ॐ नमो हनुमते रुद्रावतारायदेवदानवर्षिमुनिवरदाय रामदूतायस्वाहा ।ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय भक्तजनमनःकल्पनाकल्पद्रुमाय दुष्टमनोरथस्तम्भनायप्रभञ्जन प्राणप्रियाय महाबलपराक्रमायमहाविपत्तिनिवारणाय पुत्रपौत्रधन धान्यादिविविध सम्पत्प्रदाय रामदूताय स्वाहाॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय। वज्रदेहाय वज्रनखाय वज्रमुखाय वज्ररोम्णे वज्रनेत्राय वज्रदन्ताय वज्रकराय वज्रभक्ताय रामदूताय स्वाहाॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परयंत्र मंत्रतंत्रत्राटकनाशकाय सर्वज्वरच्छेदकाय सर्वव्याधिनिकृन्तकाय सर्वभयप्रशमनाय सर्वदुष्टमुखस्तम्भनाय सर्वकार्यसिद्धिप्रदाय रामदूताय स्वाहाॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय देवदानवयक्षराक्षसभूतप्रेतपिशाचडाकिनी शाकिनीदुष्टग्रहबन्धनाय रामदूताय स्वाहा ।
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