इसमें प्रत्येक ग्रह के प्रभाव को अलग-अलग 12 वर्षाें के लिए निर्धारित किया गया है। साथ ही ग्रहों की शक्ति निर्धारण के लिए स्थान बल, दिक् बल, काल बल, नैसर्गिक बल, दृक बल, अष्टक वर्ग बल से भिन्न ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को स्थान दिया गया हैं। भचक्र के 30 प्रतिशत तक के विभाजन को यथेष्ट समझा गया है तथा उससे अधिक विभाजन की आवश्यकता नहीं समझी गयी है। लग्न को सबसे महत्वपूर्ण राशि समझते हुए इसे सभी प्रकार की भविष्यवाणियों का आधार माना गया है। चंद्रमा मन का प्रतीक ग्रह है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक बालक अपने मन के अनुसार ही कार्य करना पसंद करते हैं। इसलिए इस अवधि को चंद्रमा का दशा काल माना गया है, चाहे उनका जन्म किसी भी नक्षत्र में क्यों न हुआ हो। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी पर ध्यान देना आवश्यक होगा। यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 00 की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 900, या 2700 दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 1800 की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण जातक के बाल मन के मनोवैज्ञानिक विकास में बाधाएं उपस्थित होती हंै। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यधिक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अति सहज, सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता है। 5वें-6ठे वर्ष में चंद्रमा का प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है। बुध विद्या, बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह है। 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र विद्याध्ययन की होती है, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो। इसलिए इस अवधि को बुध का दशा काल माना गया है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी के साथ इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि बुध सूर्य से 00 की दूरी पर स्थित हो और इसकी गति वक्र हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 260-270 के आसपास स्थित हो तथा बुध की गति 10 प्रतिदिन की हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 00 की दूरी पर स्थित हो और बुध की गति 20 प्रतिदिन के आसपास हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक विद्यार्थी जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बुध की शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन संदर्भोंे की कमजोरियों, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के मानसिक विकास में बाधाएं आती हैं। यदि बुध की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास उच्च कोटि का होता है। यदि बुध की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास सहज ढंग से होता है। 17वें-18वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है। मंगल शक्ति एवं साहस का प्रतीक ग्रह है। युवावस्था, यानी 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक जातक अपनी शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से इस अवधि को मंगल का दशा काल माना गया है। मंगल की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि मंगल सूर्य से 1800 की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 900 की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत, यदि 00 की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। मंगल की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी युवावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि मंगल की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के उत्साह में कमी आती है। यदि मंगल की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यधिक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका उत्साह उच्च कोटि का होता है। यदि मंगल की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां सहज होती हैं। 29वें-30वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है। शुक्र चतुराई का प्रतीक ग्रह है। 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र के प्रौढ़ अपने कार्यक्रमों को युक्तिपूर्ण ढंग से अंजाम देते हैं। इसलिए इस अवधि को शुक्र का दशा काल माना गया है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के आकलन के लिए, सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के साथ-साथ, इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि शुक्र सूर्य से 00 की दूरी पर हो और इसकी गति वक्र हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र सूर्य से 450 की दूरी के आसपास स्थित हो और इसकी गति प्रतिदिन 10 की हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र की सूर्य से दूरी 00 हो और इसकी गति प्रतिदिन 10 से अधिक हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी प्रौढ़ावस्था पूर्व का समय व्यतीत करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 00 हो, तो उन संदर्भों की कमजोरियों, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में कठिनाई प्राप्त करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन संदर्भोें की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन काफी सहज ढंग से कर पाते हैं। 41वें-42वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है। ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में मंगल को राजकुमार तथा सूर्य को राजा माना गया है। मंगल के दशा काल 24 से 36 वर्ष में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष को जोड़ दिया जाए, तो यह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। इसलिए इस अवधि को सूर्य का दशा काल माना गया है। एक राजा की तरह ही जनसामान्य को सूर्य के इस दशा काल में अधिकाधिक कार्य संपन्न करने होते हैं। सभी ग्रहों को ऊर्जा प्रदान करने वाले अधिकतम ऊर्जा के स्रोत सूर्य को हमेशा ही 50 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए इस समय उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका सूर्य स्वामी है तथा जिसमें उसी स्थिति है, के कारण उनकी बची जिम्मेदारियोें का पालन उच्च कोटि का होता है। बृहस्पति धर्म का प्रतीक ग्रह है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र के वृद्ध, हर प्रकार की जिम्मेदारियों निर्वाह कर, धार्मिक जीवन जीना पसंद करते हैं। इसलिए इस अवधि को बृहस्पति का दशा काल माना गया है। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि बृहस्पति सूर्य से 1800 की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, 900 की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत तथा यदि 00 की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपने वृद्ध जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बृहस्पति की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका जीवन निराशाजनक बना रहता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अवकाश प्राप्ति के बाद का जीवन उच्च कोटि का होता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है और जिसमें इसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां वृद्धावस्था में काफी सुखद होती हैं। प्राचीन ज्योतिष के कथनानुसार ही शनि को, अतिवृद्ध ग्रह मानते हुए, जातक के 72 वर्ष से 84 वर्ष की उम्र तक का दशा काल इसके आधिपत्य में दिया गया है। शनि की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर ही किया जाता है। यदि शनि सूर्य से 1800 की दूरी पर हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 900 की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 00 की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शनि की शक्ति के अनुसार ही जातक अति वृद्धावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि शनि की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अति वृद्धावस्था का उनका समय काफी निराशाजनक होता है। यदि शनि की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यधिक मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका यह समय उच्च कोटि का होता है। यदि शनि की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अति सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका शनि स्वामी हो, या जिसमें उसकी स्थिति हो, के कारण, वृद्धावस्था के बावजूद, उनका समय काफी सुखद होता है। इसी प्रकार जातक का उत्तर वृद्धावस्था का 84 वर्ष से 96 वर्ष तक का समय यूरेनस, 96 से 108 वर्ष तक का समय नेप्च्यून तथा 108 से 120 वर्ष तक का समय प्लूटो के द्वारा संचालित होता है। यूरेनस, नेप्च्यून एवं प्लूटो की गत्यात्मक शक्ति का निर्धारण भी, मंगल, बृहस्पति और शनि की तरह ही, सूर्य से इसकी कोणात्मक दूरी के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार इस दशा पद्धति में सभी ग्रहों की एक खास अवधि में एक निश्चित भूमिका होती है। विंशोत्तरी दशा पद्धति की तरह एक मात्र चंद्रमा का नक्षत्र ही सभी ग्रहों को संचालित नहीं करता है। इस पद्धति के जन्मदाता श्री विद्या सागर महथाजी पेटखार, बोकारो निवासी हैं, जिन्होंने इस पद्धति की नींव जुलाई 1975 में रखी। ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति के रहस्य की खोज 1981 में हुई। इस दशा पद्धति का संपूर्ण गत्यात्मक विकास 1987 जुलाई तक होता रहा। 1987 जुलाई के पश्चात अब तक हजारों कुंडलियों में इस दशा पद्धति की प्रायोगिक जांच हुई और सभी जगहों पर सफलता ही मिली। आज गत्यात्मक दशा पद्धति किसी भी कुंडली को ग्रहों की शक्ति के अनुसार लेखाचित्र में अनायास रूपांतरित कर सकती है। ‘गत्यात्मक दशा पद्धति’ की जानकारी के पश्चात् किसी भी व्यक्ति के जीवन की सफलता-असफलता, सुख-दुख, महत्वाकांक्षा, कार्यक्षमता एवं स्तर को लेखाचित्र में ईस्वी के साथ अंकित किया जा सकता है। जीवन में अकस्मात् उत्थान एवं गंभीर पतन को भी ग्राफ से निकाला जा सकता है। सभी ग्रह, अपनी अवस्था विशेष में कुंडली में प्राप्त बल और स्थिति के अनुसार, अपने कार्य का संपादन करते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी समय-समय पर उतार-चढ़ाव आना तथा छोटे-छोटे अंतरालों के बारे में जानकारी इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होने वाले उलट-फेर का निर्णय ‘लग्न सापेक्ष गत्यात्मक गोचर प्रणाली’ से करें, तो दशा काल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्त हो जाएंगी। इन दोनों सिद्धांतों का उपयोग होने से ज्योतिष विज्ञान दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति के पथ पर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
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