दान की महिमा
सामान्यतः लोगों की धारणा यह है कि दूसरों को दुःखी देखकर दुःखी होना और लोगों के सामने दुःख प्रकट करना अच्छा समझा जाता है, लेकिन सन्तों का कहना है कि ज्ञानी वह है जिसके मन में दूसरों के लिए करूणा तो हो, साथ ही वह उनकी तन, मन, धन या ज्ञान से सेवा करें और स्वयं दुखी न रहे। इसे लोक कल्याण समझकर सदैव करता रहे। यही प्रभु इच्छा है कि न किसी को दुःख दो और न किसी से दुःख लो, लेकिन अगर आपके मन में किसी को दुःख देने का विचार भी आए तो उस दिन को अच्छा दिन नहीं समझना चाहिए। क्योकि यह विचार अज्ञानी मनुष्य के होते है, ज्ञानी स्वयं प्रसन्न रहते है।
अज्ञानी सदैव कल्पना में कार्य करते है और ज्ञानी मनुष्यों में देवत्व आ जाता है। ज्ञानी लोगो से अज्ञानी मिलते ही सुख का अनुभव करने लगते है, क्योकि शरण मे आते ही ज्ञानी के ज्ञानरूपी तार अज्ञानी से जुडने लगते है और उसकी अज्ञानता समाप्त होने लगती है। तब दुःख दूर भागता है और उसकी अज्ञानता समाप्त होने लगती है। तब दुःख दूर भागता है और व्यक्ति सुख का अनुभव करने लगता है। कहा गया है कि अपने समान दूसरों के सुख-दुःख का समझना आत्मीयता और भाईचारे में वृद्धि करता है। यही वसुधैव कुटुम्बकम् का आधार है। सुख-दुःख तो आते जाते रहते हैं, किन्तु हमें भाईचारे को विस्तार और स्थायित्व देना है। यही सुखमय जीवन का आधार है। यह दान और परोपकार की भावना से सम्भव है।
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