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असत्य पर सत्य की जीत विजयादशमी

हर तरफ फैले भ्रष्टाचार और अन्याय रूपी अंधकार को देखकर मन में हमेशा उस उजाले की चाह रहती है जो इस अंधकार को मिटाए। कहीं से भी कोई आस ना मिलने के बाद हमें हमारी संस्कृति के ही कुछ पन्नों से आगे बढऩे की उम्मीद मिलती है। हम सबने रामायण को किसी ना किसी रूप में सुना, देखा और पढ़ा ही होगा। रामायण हमें यह सीख देता है कि चाहे असत्य और बुरी ताकतें कितनी भी ज्यादा हो जाएं, पर अच्छाई के सामने उनका वजूद एक ना एक दिन मिट ही जाता है। अंधकार के इस मार से मानव ही नहींं भगवान भी पीडि़त होते हैं। सच और अच्छाई ने हमेशा सही व्यक्ति का साथ दिया है।
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरे का आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है, इसीलिए इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पाप यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
राम और रावण की कथा तो हम सब जानते ही हैं जिसमें राम को भगवान विष्णु का एक अवतार बताया गया है। राम महान राजा दशरथ के पुत्र थे और पिता के वचन के कारण उन्होंने 14 साल का वनवास सहर्ष स्वीकार किया था। लेकिन वनवास के दौरान ही रावण नामक एक राक्षस ने भगवान राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया था। अपनी पत्नी को असुर रावण से छुड़ाने और इस संसार को रावण के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए राम ने रावण के साथ दस दिनों तक युद्ध किया था और दसवें दिन रावण के अंत के साथ इस युद्ध को समाप्त कर दिया था। वह चाहते तो अपनी शक्तियों से सीता को छुड़ा सकते थे लेकिन मानव जाति को यह पाठ पढ़ाने के लिए कि ‘‘हमेशा बुराई अच्छाई से नीचे रहती है और चाहे अंधेरा कितना भी घना क्यूं न हो एक दिन मिट ही जाता है।’’ उन्होंने मानव योनि में जन्म लिया और एक आदर्श प्रस्तुत किया।
दशहरा भारत के उन त्यौहारों में से है जिसकी धूम देखते ही बनती है। बड़े-बड़े पुतले और झांकियां इस त्यौहार को रंगा-रंग बना देती हैं। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों के रूप में लोग बुरी ताकतों को जलाने का प्रण लेते हैं। आज दशहरे का मेला छोटा होता जा रहा है लेकिन दशहरा आज भी लोगों के दिलों में भक्तिभाव को ज्वलंत कर रहा है।
दुर्गा पूजा:
विजयदशमी को देश के हर हिस्से में मनाया जाता है। बंगाल में इसे नारी शक्ति की उपासना और माता दुर्गा की पूजा अर्चना के लिए श्रेष्ठ समयों में से एक माना जाता है। अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए मशहूर बंगाल में दशहरा का मतलब है दुर्गा पूजा। बंगाली लोग पांच दिनों तक माता की पूजा-अर्चना करते हैं जिसमें चार दिनों का अलग महत्व होता है। ये चार दिन पूजा के सातवें, आठवें, नौवें और दसवें दिन होते हैं जिन्हें क्रमश: सप्तमी, अष्टमी, नौवीं और दसमी के नामों से जाना जाता है। दसवें दिन प्रतिमाओं की भव्य झांकियां निकाली जाती हैं और उनका विसर्जन पवित्र गंगा में किया जाता है। गली-गली में मां दुर्गा की बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं को राक्षस महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता है।
देश के अन्य शहरों में भी हमें दशहरे की धूम देखने को मिलती है। गुजरात में जहां गरबा की धूम रहती है तो कुल्लू का दशहरा पर्व भी देखने योग्य रहता है। बस्तर का दशहरा भी देश में खासा प्रसिद्ध है।
दशहरे के दिन हम तीन पुतलों को जलाकर बरसों से चली आ रही परपंरा को तो निभा देते हैं लेकिन हम अपने मन से झूठ, कपट और छल को नहीं निकाल पाते। हमें दशहरे के असली संदेश को अपने जीवन में भी अमल में लाना होगा तभी यह त्यौहार सार्थक बन पाएगा।
दशेंद्रियों पर विजय:
वैदिक परम्परा में जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण अज्ञान से बाहर निकल कर ज्ञान प्राप्ति अथवा मुक्ति का क्षण माना गया है। दशहरा का अर्थ है, वह पर्व जो दसों प्रकार के पापों को हर ले। इस दिन को विजय दशमी का दिन भी स्वीकार किया गया है। एक मान्यता के अनुसार आश्विन-शुक्ल-दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक काल होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। यह वह क्षण है जब दशेंद्रियों पर सम्पूर्ण विजय प्राप्त कर मानव जीवन की सीमाओं का उल्लंघन कर ज्ञान प्राप्त करता है। इसीलिए दशहरे के पर्व को ‘सीमोल्लंघन’ के नाम से भी पुकारा जाता है। पूर्वी भारत में यह ‘बिजोया’ नव वर्ष की भाँति उल्लास से नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। यहाँ इसे मां भगवती की महिषासुर पर विजय का प्रतीक माना जाता है।
विजयदशमी का त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शरद के आगमन की सूचना देता है। ब्राह्मण इस दिन सरस्वती का पूजन करते हैं जबकि क्षत्रिय शास्त्रों की पूजा करते हैं। अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में यह त्योहार सदियों से भारत के कोने कोने में मनाया जाता है। यह अधर्म पर धर्म की विजय का द्योतक माना गया और दशमी के इस दिन को विजय दशमी के रूप में मनाया जाने लगा।
एक अन्य कथा के अनुसार परशुराम की माता रेणुका ने शापग्रस्त देवताओं के आग्रह पर उनके कुष्ठ रोग दूर करने के लिए अपने पति ‘भृगु’ की आज्ञा के बिना नौ दिन तक देवताओं की सेवा की फलत: दसवें दिन उनका कोढ़ दूर हो गया। शाप मुक्त होने के कारण देवताओं ने यह दिवस दु:ख मुक्ति अथवा विजय दिवस के रूप में मनाया। इस दिन आश्विन-शुक्ल दशमी थी अत: तभी से यह दिन विजय दशमी के रूप में मनाया जाने लगा। इसी प्रकार इस दिन को नरकासुर राक्षस के वध के साथ भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि नरकासुर ने अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए 1600 स्त्रियों की बलि देने का निश्चय किया। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल नारी द्वारा ही होगा। भगवान श्री कृष्ण ने ‘सत्यभामा’ के हाथों उसका वध करवाया। नरकासुर के हाथों बच जाने के कारण नारियों ने इसे विजय पर्व के रूप में मनाया। चाहे राम ने रावण का संहार किया हो अथवा अर्जुन द्वारा कौरवों पर विजय पाई गई हो, यह दिवस सर्वत्र निर्विवाद अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। स्थानीय रीति रिवाजों, वेश भूषाओं और परम्पराओं के कारण इस त्योहार का बाह्य रूप पृथक पृथक हो सकता है परन्तु इसकी भावना एक ही है और वह है ‘‘असत्य पर सत्य की जीत।’’
दशहरा एक प्रतीक पर्व है। राम-रावण के युद्ध में जिस रावण की कल्पना की गई है वह है मन का विकार है और जो विकार रहित हैं वह हैं परम पुरुष राम। सीता आत्मा है जबकि राम स्वयं परमात्मा। आत्मा का अपहरण जब रावण ने किया तो चारों ओर धर्म नष्ट होने लगा, लोग वानरों की भाँति चंचल और उच्छृंखल होने लगे, तब राम ने उनको अर्थात उनके काम-क्रोध-मोह आदि को अनुशासित किया तभी रावण का वध संभव हो पाया। राम और रावण विपरीतार्थ के बोधक हैं। रावण का अर्थ है रुलाने वाला जबकि राम का अभिप्राय है लुभाने वाला। रावण के दस सिर कहे गए हैं। उसका सिर तो एक ही है, शेष- काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ, मन, बुद्धि और अहंकार को उसके सिरों के रूप में स्वीकार किया गया है।
राम को दशरथ का पुत्र माना गया है। उपनिषदों में शरीर को रथ कहा गया है। शरीर की दशेन्द्रियों को योगी साधना द्वारा वश में कर सकते हैं। ऐसे संयमी योगी साधक ही होते हैं दशरथ। इस प्रकार राम दशरथी हैं। रावण दशमुखी है, वह ब्राह्मण है। शास्त्र कहते हैं, ‘ब्रह्मं जानाति ब्राह्मण’ जो ब्रह्म को जानता है वही ब्राह्मण है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उच्च आचार विचार द्वारा ब्रह्म को प्राप्त न करके दशग्रन्थों को मुखाग्र कर, दशेंन्द्रियों के पराधीन होकर स्वयं को ब्राह्मण घोषित करना केवल पाखंड ही हैं। ऐसे पाखंडियों को ही रावण कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार, ‘‘रवैतीति रावण’ जो अपने कथित ज्ञान का स्वयं ढोल पीटता है, वही रावण है। यही वृत्ति राक्षसी है। जिस पर नियंत्रण करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम की आवश्यकता होती है। इसी वृत्ति पर विजय प्राप्त करने का त्योहार है विजयदशमी। महाभारत की कथा का भी आशय यही है। वेद व्यास जी ने पाण्डवों के बारह वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष के अज्ञातवास की बात की है। इस का अभिप्राय है कि साधक बारह वर्ष तक साधना की सफलता से इतना अहंकारी न हो जाए कि अपनी साधना का ढिंढोरा पीटने लगे इसलिए साधक को एक वर्ष के अज्ञातवास का प्रावधान किया गया। यहाँ भी दुर्योधन अर्थात् बुरी वृत्तियों वाला तथा बृहन्नला जिसने अपनी बृहत वृत्तियों को संयमित कर रखा है, में परस्पर युद्ध होता है और अच्छी वृत्तियों की विजय होती है।
महाराष्ट्र और उससे लगे भू प्रदेशों में दशहरे के दिन आपटा अथवा शमी वृक्ष की पत्तियाँ अपने परिजनों एवं मित्रों में स्वर्ण के रूप में वितरित करने की प्रथा है। आपटा वृक्ष की पत्तियाँ मध्य से दो समान भागों में विभक्त रहती हैं। यह वृक्ष गाँव की सीमा से बाहर ही होते थे। इस पत्ती को गाँव की सीमा से बाहर जा कर तोडऩा ही सीमोल्लंघन है। यह पत्ती द्वैत वृत्ति पार कर अद्वैतवृत्ति में जा कर दशेंन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने का प्रतीक है। इसी प्रकार शमी की पत्तियाँ सुवर्ण मान कर वितरित की जाती हैं। शमी वृक्ष की पत्तियाँ बुद्धि के देवता गणेश जी को अर्पित की जाती हैं। शम् अर्थात् कल्याणकारक। ‘शमीं’ वह कल्याणकारी अवस्था है जो बुद्धि के देवता की शरण में जाने पर प्राप्त होती है। बुद्धि के देवता की शरण में जाने का अर्थ भी दशेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना ही है। कई शताब्दीयों से मनाये जाने वाले इस त्योहार को मध्य युगीन राजाओं, महाराजाओं ने नए आयाम दिए, कुल्लू, कोटा, और कर्नाटक में आज भी 15वीं शताब्दी की कई बातों की झलक मिल जाती है। कुमाउँ का दशहरा भी उत्तर भारत में रामायण के पात्रों के पुतलों के कारण काफी चर्चित है।
कुल्लू का दशहरा:
कुल्लू में दशहरा देवताओं के मिलन का मेला मान कर मनाया जाता है। विश्वास किया जाता है कि देवता जमलू ने देवताओं को एक टोकरी में उठा कर किन्नर कैलाश की ओर से कुल्लू पहुँचाया था। तभी से कुल्लू देवताओं की भूमि मानी जाती है और यहाँ पर देवताओं का मिलन प्रति वर्ष होता है। कुल्लू घाटी के प्रत्येक गाँव का अपना ग्राम देवता होता है। प्रत्येक देवता का अपना मेला लगता है। देश के दूसरे भागों में विजय दशमी के समाप्त होते ही आश्विन शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक कुल्लू के ढाल मैदान में सभी देवता सज धज कर, गाजे बाजे के साथ लाये जाते हैं। परम्परागत वेश भूषा में सजे स्त्री पुरुष देवता की सवारी के साथ आते हैं। कुल्लू की घाटी के कण-कण में लोक नृत्य, संगीत और मस्ती भरी हुई है फलत: यह मिलन स्थली विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों के स्वरों एवं लोक नर्तकों की थापों पर थिरक उठती हंै। इन्हीं लोगों के उल्लास भरे नृत्यों एवं रंग बिरंगे परिधानों की छटा ने कुल्लु के दशहरे की महक को विदेशों तक पहुँचा दिया है। अब आधुनिकता का प्रभाव भी इस मेले में दिखाई देने लगा है जिसके फलस्वरूप इसका परम्परागत रूप बदलने लगा है। पहले इस मेले में भाग लेने के लिए तीन सौ पैंसठ देवता कुल्लू आया करते थे अब इनकी संख्या घट कर साठ सत्तर रह गई हैं।
कुल्लू के राजाओं ने इस मेले को वर्षों गरिमा प्रदान की है। देवताओं की मिलन स्थली ढालपुर का नामकरण भी 16वीं शताब्दी में राजा बहादुर सिंह ने अपने छोटे भाई ढाल सिंह के नाम पर किया था। 17वीं शताब्दी में राजा मानसिंह ने इसे व्यावसायिक रूप दिया और कुल्लू दशहरा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का संगम बन गया। हिमालय पर्वत के दुर्गम दर्रे लांघ कर रूस, चीन, लद्दाख, तिब्बत, समरकन्द, यारकन्द और लौहल स्पिति के व्यापारी यहाँ पर ऊन और घोड़ों का व्यापार करने आते थे। आज भी यहाँ दूर दूर से व्यापारी आ कर अच्छा व्यापार करते हैं। इस अवसर पर यहाँ पशु मेलों का भी आयोजन होता है। मेले का मुख्य आकर्षण रघुनाथ जी की यात्रा होती है जिसमें राजपरिवार के सदस्य राजसी वेश भूषा में सम्मिलित होते हैं। इस अवसर पर द्वापर युग की राक्षसी, भीम की पत्नी हिडिंबा की उपस्थिति को अनिवार्य माना जाता है। पांडु पुत्र भीम के संसर्ग से हिडिंबा को मानवी स्वीकार कर लिया गया था। अब मनाली स्थित हिडिंबा मन्दिर में उनकी पूजा एक देवी के रूप में की जाती है।
कुल्लू दशहरे में रघुनाथ जी की यात्रा हिडिंबा की उपस्थिति के बिना नहींं निकल सकती। इसके लिए हिडिंबा देवी को निमंत्रण भेजने का एक विशेष विधान है। मनाली से चल कर देवी कुल्लू के पास रामशिला नामक स्थान पर ठहरती है। यहीं उन्हें राजा की ओर से छड़ी भेज कर बुलावा भेजा जाता है। देवी का धूप जलाने का पात्र स्वयं राजा उठाता है। इस मेले में जहाँ हिडिंबा की उपस्थिति अनिवार्य है वही विश्व के सबसे प्राचीन लोकतंत्र ‘मलाना’ के संस्थापक देवता जमलू तथा कमाद की पराश्र भेखली देवी इसमें शामिल नहींं होते। झाड़-फूस की लंका दहन के साथ दशहरा पूर्ण होता है और रघुनाथ जी की यात्रा वापिस लौटती है। लौटते समय रघुनाथ जी के साथ सीता जी की मूर्ति भी विराजमान कर दी जाती है। यह राम द्वारा लंका से सीता को छुड़ा कर लाने का प्रतीक माना जाता है।
मैसूर का दशहरा:
दक्षिण भारत में कर्नाटक प्रान्त के मैसूर नगर का दशहरा भी अपनी भव्यता और तडक़-भडक़ के लिए विश्व प्रसिद्ध है। कन्नड़ में दशहरे को नांदहप्पा अर्थात राज्य का त्योहार कहा जाता है। 15वीं शताब्दी में मैसूर के लोकप्रिय एवं कलाप्रेमी राजा कृष्णदेव राय ने इस उत्सव को राजकीय प्राश्रय दिया, नवरात्रि उत्सव के अन्तिम दिन राजा हाथी पर सवार हो कर नागरिकों के मध्य जाते और उनके द्वारा सम्मानपूर्वक दिए गये उपहार प्रेम से स्वीकार करते। राजमहल से चल कर राजा की यात्रा नगर सीमा बाहरबली मंडप तक जाती। यहाँ पर दशहरे के साथ महाभारत काल से ही जुड़े शमी वृक्ष की पूजा की जाती और इस वृक्ष की पत्तियों को सुर्वण मान कर परिजनों में वितरित किया जाता है।
शमी वृक्ष के संबंध में विद्वानों का मत है कि पांडवों ने अपने एक वर्ष के अज्ञातवास में इसी वृक्ष पर अपने अस्त्र शस्त्र छिपा कर रखे थे। इस वृक्ष को न्याय, अच्छाई और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। कर्नाटक के निवासियों का मत है कि जिस प्रकार पांडवों ने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार से यह वृक्ष उनकी तथा उनके परिजनों की रक्षा करेगा।
इस त्योहार को प्राश्रय देने वाला विजय नगरम राज्य अपने अपार वैभव के लिए विश्व प्रसिद्ध था फलत: राजा की सवारी बहुत ही भव्यता के साथ निकाली जाती थी। आजकल जुलूस में राजा का स्थान महिषासुरमर्दिनी चांमुडेश्वरी देवी की प्रतिमा ने ले लिया है। चामुंडेश्वरी देवी का मन्दिर मैसूर महल से थोड़ी ही दूर एक सुन्दर पहाड़ी पर बना हुआ है।
मैसूर में दशहरे के अवसर पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर से व्यापारी पहुँचते हैं। राज्य के महत्वपूर्ण कला-शिल्प यहाँ पूरी सज-धज के साथ रखे जाते हैं। चन्दन की लकड़ी से बनी कलाकृतियाँ, अगरबत्तियों और रेशमी साडिय़ों के लिए लोग इस उत्सव की वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों की चहल पहल से भरे वातावरण में मैसूर का राजमहल जब विद्युत के प्रकाश से जगमगाता है तो उसकी छटा देखते ही बनती है।

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