गोवर्धन पूजा 2026: अन्नकूट की कथा, पूजा विधि, मुहूर्त और महत्व
मेटा विवरण: गोवर्धन पूजा 2026 की तिथि, अनुमानित मुहूर्त, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा, अन्नकूट और छप्पन भोग का महत्व, पूजा सामग्री और पूजा विधि – सब कुछ एक ही लेख में।
गोवर्धन पूजा दीपोत्सव का चौथा दिन है, जो दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौ माता की पूजा की जाती है, और भगवान को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है, जिसे “अन्नकूट” कहते हैं। यह पर्व प्रकृति, अन्न और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
गोवर्धन पूजा कब है
गोवर्धन पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। पंचांग के अनुसार 2026 में गोवर्धन पूजा 9 नवंबर, सोमवार के आसपास पड़ने की संभावना है। कभी-कभी तिथि के कारण दिवाली और गोवर्धन पूजा के बीच एक दिन का अंतर भी आ जाता है, इसलिए सही तारीख अपने स्थानीय पंचांग से अवश्य जांच लें।
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गोवर्धन पूजा 2026 का अनुमानित मुहूर्त
नीचे दिया गया समय केवल एक अनुमान है। यह पक्का समय नहीं है, और आपके शहर में यह आगे-पीछे हो सकता है।
| विवरण | अनुमानित समय |
|---|---|
| प्रातःकाल पूजा का संभावित मुहूर्त | सुबह लगभग 6:30 से 8:45 बजे के बीच |
| सायंकाल पूजा का संभावित मुहूर्त | दोपहर बाद लगभग 3:30 से 5:45 बजे के बीच |
सही और सटीक मुहूर्त जानने के लिए अपने शहर का पंचांग या अपने पंडित जी से अवश्य पुष्टि करें।
गोवर्धन पूजा की कथा
द्वापर युग में ब्रज के लोग हर साल देवराज इंद्र की पूजा करते थे, क्योंकि उनका मानना था कि इंद्र देव ही वर्षा करते हैं, जिससे उनकी फसलें और गायों का चारा उगता है। एक बार नन्हे श्रीकृष्ण ने देखा कि पूरा गांव बड़ी धूमधाम से इंद्र पूजा की तैयारी कर रहा है। उन्होंने अपनी माता यशोदा और नंद बाबा से पूछा कि यह पूजा किसके लिए और क्यों हो रही है।
नंद बाबा ने बताया कि यह पूजा इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए है। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्र का कर्तव्य है। हमें तो गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जो हमारी गायों को चारा देता है, बादलों को रोककर वर्षा कराता है और हमें फल-फूल देता है। श्रीकृष्ण की बात से सहमत होकर ब्रजवासियों ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की।
यह देखकर इंद्र देव क्रोधित हो गए। उन्होंने ब्रज पर मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। चारों ओर पानी भर गया और लोग, गायें और बछड़े डर से कांपने लगे। सब भागकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।
तब श्रीकृष्ण ने अपनी सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया, और सभी ब्रजवासी अपनी गायों के साथ उसके नीचे आकर सुरक्षित हो गए। सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही, लेकिन श्रीकृष्ण पर्वत थामे खड़े रहे और ब्रज की एक बूंद भी हानि नहीं हुई।
आखिरकार इंद्र देव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने वर्षा रोक दी और श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। कहा जाता है कि इसी के बाद श्रीकृष्ण को “गिरिधारी” और “गोवर्धनधारी” कहा जाने लगा। तभी से हर साल इस दिन गोवर्धन पूजा की परंपरा चली आ रही है।
अन्नकूट क्या है
“अन्नकूट” का अर्थ है “अन्न का पहाड़”। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को कई तरह के अनाज, सब्ज़ियों और पकवानों का भोग लगाया जाता है, और उन्हें पहाड़ के आकार में सजाया जाता है। यह गोवर्धन पर्वत का प्रतीक माना जाता है। पूजा के बाद यह भोग प्रसाद के रूप में सभी में बांटा जाता है।
अन्नकूट में आमतौर पर ये व्यंजन बनाए जाते हैं:
- अन्नकूट की सब्ज़ी: कई मौसमी सब्ज़ियों को मिलाकर बनी खास मिक्स सब्ज़ी
- कढ़ी-चावल और बाजरे की खिचड़ी
- पूरी, कचौड़ी और रोटी
- खीर, हलवा और मिठाइयां
- दही, मक्खन और मिश्री, जो श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय माने जाते हैं
- मौसमी फल और मेवे
छप्पन भोग की मान्यता
गोवर्धन पूजा पर कई मंदिरों और घरों में भगवान को छप्पन (56) प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, माता यशोदा नन्हे कृष्ण को दिन में आठ बार (आठों पहर) भोजन कराती थीं। जब श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखा, तब उन्होंने कुछ भी नहीं खाया। आठवें दिन ब्रजवासियों ने सात दिनों के आठ-आठ पहर, यानी 7 × 8 = 56 व्यंजन बनाकर अपने कान्हा को प्रेम से खिलाए। तभी से छप्पन भोग की परंपरा मानी जाती है।
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