सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने जब से इस संसार की रचना की है तभी से जीवन में प्रत्येक नश्वर आगमों को चाहे वे सजीव हों अथवा निर्जीव, उन्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। जीवन की इस यात्रा में सबों को अच्छे एवं बुरे समय का स्वाद चखना पड़ता है तथा दोनों परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है। यदि हमारा अध्यात्म एवं पराविद्याओं में विश्वास है तो इनके अनुसार जन्म से मृत्युपर्यन्त मनुष्य के जीवन की हर घटना ग्रहों, नक्षत्रों एवं दशाओं आदि द्वारा पूर्णरूपेण निर्देशित होती है। इनके सम्मिलित प्रभाव जीवन में घटित होने वाली हर घटना को प्रभावित करते हैं। आधुनिक भौतिकवादी विश्व में प्रत्येक मनुष्य धनी, सुखी एवं हर प्रकार से संपन्न जीवन जीने की कल्पना करता है तथा उसकी यह आकांक्षा होती है कि उसे वे सभी विलासितापूर्ण सुख-सुविधाएं प्राप्त हों जिनकी उसे आकांक्षा है। किंतु यह हमारे हाथ में नहीं है। हम सिर्फ कर्म कर सकते हैं, फल का निर्धारण हमारी जन्म कुंडली में स्थित ग्रह करते हैं जो हमारे जन्म लेने के साथ हमारी कुंडली में अवतरित होते हैं। जन्म लेने के उपरांत यह अवश्यंभावी हो जाता है कि हमें निरंतर सुख एवं दुख के चक्र से गुजरना है। अब किसके भाग्य में विधाता ने क्या सुख अथवा दुख लिखे हैं इसका विवेचन ज्योतिषी अपने दैवीय ज्ञान, ज्योतिष के गहन एवं गूढ़ सिद्धांतों के ज्ञान के आधार पर करते हैं तथा लोगों को परामर्श देकर उनका मार्गदर्शन करते हैं कि उसके जीवन का अमुक समय सुख का है अथवा आने वाला समय दुख का होगा, अतः भावी परेशानियों अथवा आसन्न संकट के प्रति सावधान हो जायें। यदि बुरे समय का ज्ञान पूर्व में ही हो जाय तथा समुचित मार्गदर्शन मिल जाय तो व्यक्ति आने वाले बुरे समय के प्रति सचेत हो सकता है, मानसिक रूप से तैयार हो सकता है अथवा दैवीय उपायों द्वारा तथा अपने कृत्यों द्वारा ईश्वर प्रदत्त इस पीड़ा को कमतर करने में, इसकी तीव्रता एवं विभीषिका को न्यून करने में अवश्य सफल हो सकता है। यद्यपि कि ज्योतिष में अनिष्ट के निर्धारण एवं उनकी भविष्यवाणी के अनेक ज्ञात एवं अज्ञात सूत्र मौजूद हैं, किंतु एक अति महत्वपूर्ण, व्यवहृत एवं सिद्ध तकनीक द्वादशांश चक्र के द्वारा अनिष्ट के निर्धारण का है जिसमें राहु का गोचर देखकर काफी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। यह तकनीक वर्षों के शोध एवं पर्यवेक्षण के परिणामस्वरूप प्रकाश में आयी है तथा शत-प्रतिशत सही फल देने में सक्षम है। नियम 1: चरण 1: लग्न कुंडली का अष्टमेश देखें। चरण 2: लग्न कुंडली के अष्टमेश की द्वादशांश में स्थिति देखें। चरण 3: राहु का गोचर देखें। जब भी द्वादशांश में लग्न कुंडली के अष्टमेश को राहु गोचर द्वारा प्रभावित करेगा, वह समय काफी घातक अथवा समस्या देने वाला होगा। नियम 2: यदि लग्न कुंडली का अष्टमेश शनि हो तो वैसी स्थिति में नियम में थोड़ा सा परिवर्तन है। ऐसी स्थिति में देखें कि द्वादशांश में शनि कहां अवस्थित है। जब कभी भी राहु की स्थिति गोचर में शनि से तृतीय अथवा दशम भाव में होगी, वह समय जातक के लिए बुरा, कष्टदायक अथवा घातक होगा। निम्नांकित उदाहरण इस सिद्धांत की सत्यता के परिचायक एवं इसकी विश्वसनीयता को सिद्ध करने में सहायक होंगे। लेकिन ज्योतिर्विदों को यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि इस सिद्धांत के अनुसार राहु हर साढ़े सात वर्ष के उपरांत संवेदनशील बिंदु पर गोचर करेगा। अतः फलकथन करते वक्त हमेशा इसे दृष्टिगत रखकर सावधानी बरतनी आवश्यक है। हमेशा ही यह मृत्यु देने वाला तथा अतिघातक नहीं होगा। किंतु इतना तो है कि जातक को बुरी परिस्थितियों का सामना अवश्य करना ही पड़ेगा चाहे इसकी मात्रा कम या अधिक हो
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