भटकाव ज्योतिष कारण व निवारण

Views: 28
आज के आधुनिक युग में जहाँ सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ जुटाने का प्रयास हर जातक करता है, वहीं पर उन सुविधाओं के उपयोग से आज की युवा पीढ़ी भटकाव की दिशा में अग्रसर होती जा रही है। पैंरेंटस् जिन वस्तुओं की सुविधाएँ अपने बच्चों को उपयेाग हेतु मुहैया कराते हैं, वहीं वस्तुएँ बच्चों को गलत दिशा में ले जाती है। कई बार देखने में आता है कि जो बच्चे बहुत अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं वे भी ठीक कैरियर के समय अपनी दिशा से भटक कर अपने अध्ययन तथा लक्ष्य से भटकर अपना पूरा कैरियर खराब कर देते हैं। कई बार माता-पिता इन सभी बातों से पूर्णत: अनजान रहते हैं और कई बार जानते हुए भी कोई हल निकालने में असमर्थ होते हैं। सभी इन समस्याओं का दोषारोपण आधुनिक सुविधाओं को देते हुए मूक दर्शक बने रहना चाहते हैं किंतु सच्चाई यह है कि यदि आप थोड़े से ज्योतिष और समय रहते उनके प्रतिकूल असर पर काबू पाने का प्रयास कर उपयुक्त समाधान तलाश लें तो भटकाव से पूर्व ही अपने संतान को सही मार्गदिशा देकर उन्हें उचित निर्णय तथा कैरियर हेतु लक्ष्य मेंं बनाये रखने में सक्षम हो सकते हैं। यदि बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दें, जैसे बच्चा अचानक गुस्सैल हो जाए, उसमें अहं की भावना जागृत होने लगे। दोस्तों में ज्यादा समय बिताने या इलेक्टानिक्स गजट पर पूरा ध्यान केंद्रित करें, बड़ों की बाते बुरी लगे तो तत्काल सावधानी आवश्यक है। किसी विद्वान ज्योतिषीय से अपने संतान की कुंडली का ग्रह दशा जानें तथा पता लगायें कि आपके संतान की शुक्र, राहु, सप्तमेश, पंचमेश की दशा तो नहीं चल रही है और इनमें से कोई ग्रह विपरीत स्थिति में या नीच का होकर तो नहीं बैठा है। अगर ऐसी कोई स्थिति दिखाई दे तो उपयुक्त उपाय तथा थोड़े से अनुशासन से अपने संतान के भटकाव पर काबू पाते हुए उसके लक्ष्य के प्रति एकाग्रता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

बढ़ते बच्चों की चिंता का एक कारण उनके गलत संगत में पड़कर कैरियर बर्बाद करने के साथ व्यसन या गलत आदतों की ओर अग्रसर होना भी है। दिखावें या शौक से शुरू हुई यह आदत व्यसन या लत की सीमा तक चला जाता है। इसका ज्योतिष कारण व्यक्ति के कुंडली से जाना जाता है। किसी व्यक्ति का तृतीयेश अगर छठवे, आठवें या द्वादश स्थान पर होने से व्यक्ति कमजोर मानसिकता का होता है, जिसके कारण उसका अकेलापन उसे दोस्ती की ओर अग्रेषित करता है। कई बार यह दोस्ती गलत संगत में पड़कर गलत आदतों का शिकार बनता है उसके अलावा लक्ष्य हेतु प्रयास में कमी या असफलता से डिप्रेशन आने की संभावना बनती है। अगर यह डिप्रेशन ज्यादा हो जाये तथा उसके अष्टम या द्वादश भाव में सौम्य ग्रह राहु से पापाक्रांत हो तो उस ग्रह दशाओं के अंतरदशा या प्रत्यंतरदशा में शुरू हुई व्यसन की आदत लत बन जाती है। लगातार व्यसन मन:स्थिति को और कमजोर करता है। अत: यह व्यसन समाप्त होने की संभावना कम होती है। अत: व्यसन से बाहर आने के लिए मनोबल बढ़ाने के साथ राहु की शांति तथा मंगल का व्रत मंगल स्तोत्र का पाठ करना जीवन में व्यसन मुक्ति के साथ सफलता का कारक होता है।

Comments: 0

Your email address will not be published. Required fields are marked with *