वैभव लक्ष्मी (Vaibhav Laxmi): मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं.’
वैभव लक्ष्मी (Vaibhav Laxmi): हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी (Laxmi) को धन की देवी माना जाता है. मां लक्ष्मी का ही एक रूप है मां वैभव लक्ष्मी (Vaibhav Laxmi) . मान्यता है कि अगर शुक्रवार के दिन पूरे विधि विधान के साथ मां वैभव लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है तो वो प्रसन्न होती हैं. जो भक्त शुक्रवार के दिन मां वैभव लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते हैं, उनके घर में धन धान्य की कभी कमी नहीं होती है. आइए जानते हैं शुक्रवार के दिन किस दिन मां वैभव लक्ष्मी की पूजा अर्चना करनी चाहिए ताकि वो प्रसन्न रहें…
मां वैभव लक्ष्मी की पूजा की महिमा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन मां वैभव लक्ष्मी की पूजा अर्चना और व्रत करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर मां वैभव लक्ष्मी की पूजा अर्चना करनी चाहिए और शाम के समय मां की पूजा करने के बाद मां वैभव लक्ष्मी की कथा का पाठ करना चाहिए. इसके बाद कुछ मीठा खाकर व्रत खोल सकते हैं. इस बात का ख्याल रखें कि इस व्रत में नमक से बना कोई भी खाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं करना है.
वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा:
किसी शहर में अनेक लोग रहते थे. सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे. किसी को किसी की परवाह नहीं थी. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए. शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं. शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे. इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे.
ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी. शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी. उनका पति भी विवेकी और सुशील था. शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे. शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे.
देखते ही देखते समय बदल गया. शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा. अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा. इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया. यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी. शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया. दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया.
शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी. वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक मांजी खड़ी थी. उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था. उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था. उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था. उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया. शीला उस मांजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था. अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया.
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