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पितृ-दोष के कारण और उसके निवारण के ज्योतिषीय उपाय –

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पितृ-दोष के कारण और उसके निवारण के ज्योतिषीय उपाय –
भारतीय सामाजिक परंपरा में जीव को अमर माना गया है तथा मान्यता है कि जीवन में किए गए कर्मो के शुभ-अषुभ, नैतिक-अनैतिक तथा पाप-पुण्य के आधार पर संचित प्रारब्ध के अनुसार जीवन में सुख-दुख का सामना करना पड़ता है। हिंदु रिवाज है कि पूर्वजो के किसी प्रकार के अषुभ या नीति विरूद्ध आचरण का दुष्परिणाम उनके वंषजो को भोगना पड़ता हैं। माना जाता है कि व्यक्ति का अपना प्रारब्ध ही उसके जन्म का आधार बनता है, जिसके तहत उसका पालन-पोषण तथा संस्कार निर्धारित होते हैं। जातक द्वारा पूर्व जन्म में किए गए या इसी जन्म में पूर्वजों द्वारा किए गए गलत, अषुभ, पाप या अधर्म का फल जातक को कष्ट, हानि, बाधा तथा पारिवारिक दुख, शारीरिक कष्ट, आर्थिक परेषानी के तौर पर भोगना होता हैं यह प्रभाव पितृदोष के हैं यह पता लगाने के लिए जातक या परिवारजनों के जीवनकाल में विपरीत स्थिति या घटना जिसमें अकल्पित असामयिक घटना-दुर्घटना, जन-धन हानि, वाद-विवाद, अषांति, वंष परंपरा में बाधक, स्वास्थ्य, धन अपव्यय, असफलता आदि की स्थिति बनने पर पितृदोष का कारक माना जा सकता है। पितृदोष का प्रत्यक्ष कुंडली में जानकारी प्राप्त करने हेतु जातक के जन्म कुंडली के द्वितीय, तृतीय, अष्टम या भाग्य स्थान में प्रमुख ग्रहों का राहु से पापाक्रांत होना पितृदोष का कारण माना जाता हैं माना जाता है कि प्रमुख ग्रह जिसमें विषेषकर शनि यदि राहु से आक्रांत होकर इन स्थानों पर हो तो जीवन में कष्ट का सामना जरूर करना पड़ सकता हैं। इसके निवारण के लिए किसी नदी के किनारे स्थित देवता के मंदिर में किसी भी माह के शुक्लपक्ष की पंचमी अथवा एकादषी अथवा श्रवण नक्षत्र में विद्वान आचार्य के निर्देष में अज्ञात पितृदोषों की निवृत्ति के लिए पलाष विधि के द्वारा नारायणबलि, नागबलि तथा रूद्राभिषेक कराना चाहिए। किंवदति है कि यह पूजा किसी विषेष स्थान पर ही हो सकती है पर ऐसा नहीं है। यह पूजा किसी भी नदी के किनारे संभव है परंतु इस विषय में ग्रंथ का अभाव है इस स्थिति में यह सुनिष्चित करना जरूरी है कि जिन आचार्यो से आप पूजा करा रहे हैं, उनके पास यह ग्रंथ अवष्य हों। ऐसा करने से संतति अवरोध, वंष परंपरा में बाधा, अज्ञात रोगों की व्याप्ति, व्यवसायिक असफलता तथा पारिवारिक अषांति व असमृद्धि जैसे पीड़ा से मुक्ति पाई जा सकती है। ऐसा धर्म सिंधु ग्रंथ में तथा कौस्तुभ ग्रंथों में लिखा है।
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