Know Today • Plan Tomorrow • Live Better
Home Articles Astrology
Astrology

ज्योतिष व वास्तु उपायों का संबंध

ज्योतिष व वास्तु उपायों का संबंध

प्रत्येक व्यक्ति में यह स्वभाविक इच्छा होती है कि मैं सदा सुखी, धनी व स्वस्थ रहूं। जब उसकी किसी भी इच्छा की पूर्ति नहीं होती तो वह विचलित हो जाता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह ज्योतिषीय वास्तु उपायों का सहारा लेता है। हम सभी अपने पूर्व कर्मों का फल भोगने के लिए बाध्य है। भगवान ने हमारे कर्मों का फल देने के लिए ग्रहों को नियुक्त कर रखा है। जन्म के समय हमारी कुंडली में जैसे ग्रह होंगे, वैसा ही फल हमें भोगना होगा। अपने ग्रहों के हिसाब से ही हमें रहने का निवास, पुत्र, स्त्री व धन की प्राप्ति होती है। नवग्रह किस प्रकार हमें प्रभावित करते हैं। इसे जानने के लिए जन्म मृत्यु चक्र पर विचार करिए। हमारा जन्म पूर्व जन्म में की गई किसी अतृप्त कामना की पूर्ति के लिए होता है। वह कामना धन के लिए भी हो सकती है या किसी स्त्री-पुरुष के लिए भी हो सकती है। काल पुरुष की कुंडली में धन भाव का स्वामी शुक्र है और स्त्री/पुरुष भाव का स्वामी भी शुक्र है , अर्थात कुंडली का दूसरा व सातवां भाव दोंनों को मारक भाव कहा जाता है और दोनों का स्वामी शुक्र ही मैथुनी प्रकृति का आधार है। शुक्र ही सौंदर्य, काम व ऐश्वर्य का प्रतीक है। जब हमारा मन किसी वस्तु, व्यक्ति, सौंदर्य या धन को देखकर आकर्षित हुआ, तो शुक्र ने अपना कार्य कर दिया। हृदय में विचार तरंगे उठनी शुरु हो गई, तो सूर्य का कार्य पूर्वा हुआ। मन उसकी कल्पना में खो गया, तो चंद्र को कार्य मिल गया। बुद्धि द्वारा वस्तु को पाने की इच्छा हुई, तो बुध ने कार्य किया। इच्छा की पूर्ति के लिए हम वेग से आगे बढ़े, पराक्रम किया तो मंगल ने कार्य किया। उसका दिन-रात चिंतन किया, गुरु का कार्य हुआ। उसे पाने के लिए कठिन परिश्रम किया- शनि ने साथया। वस्तु के मिलने पर अहंकार हो गया तो राहू खुश हुआ।

अब अगर किसी भी वस्तु को पाने की तमन्ना शेष नहीं रही तो मोक्ष का कारक ग्रह केतू मोक्ष दिलवा देगा। यह नौ ग्रह आपको कुछ देना चाहते हैं। हमें उसको पाने की योग्यता अपने अंदर विकसित करनी है। आप सभी ग्रहों को अपने लिए शुभकर बना सकते हैं, अपने कर्मों द्वारा, उनकी पूजा अर्चना द्वारा व विभिन्न उपायों द्वारा। आमतौर पर छठे, आठवें व बारहवें भाव को शुभ नहीं कहा जाता है। छठे भाव को शुभ किए बिना आप आज्ञाकारी नौकर प्राप्त नहीं कर सकते। आठवें भाव को शुभ किए बिना लंबी आयु कैसे मिलेगी। बारहवां भाव तो व्यय करवाएगा ही, यदि उस व्यय को शुभ कर्मों की ओर मोड़ दोगे, तो मानसिक शांति मिलेगी वह हम अपने भविष्य को उज्जवल बनाएगें।

अगर उस व्यय को शराब, वेश्या व जूए आदि में लगाएंगे तो शुभ फल कैसे पाएंगे। अब वास्तु शास्त्र के विषय में विचार करते हैं। अथर्ववेद का एक उपवेद है स्थापत्य वेद। यह उपवेद ही हमारे वास्तु शास्त्र का आधार है। परमयिता परमात्मा ने हमारे कल्याण के लिए हमें बहुत सी विद्याएं दी हैं। यदि आप वेदों पर और भगवान पर विश्वास करते हैं तो कोई कारण नहीं कि वास्तु पर विश्वास करें। जिस प्रकार हमारा शरीर पंचमहाभूतों से मिलकर बना है, उसी प्रकार किसी भी भवन के निमाण में पंच महाभूतों का पर्याप्त ध्यान रखा जाए तो भवन में रहने वाले सुख से रहेंगे। ये पंचमहाभूत हैं- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश। जब पंचमहाभूतों से शरीर बन जाता है तो मन, बुद्धि और अहंकार के सहित आत्मा का उसमें प्रवेश होता है। पंचम महाभूतों के लिए पांच ग्रहों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। पृथ्वी के लिए मंगल, जल के लिए शुक्र, अग्नि के लिए सूर्य, वायु के लिए शनि और आकाश के लिए बृहस्पति को माना गया है।

मन के लिए चंद्रमा, बुद्धि के लिए बुध और अंहकार के लिए राहू को माना गया है। केतु मोक्ष का कारक है। इसी प्रकार इन नौ ग्रहों का हमारे वास्तु से भी अटूट संबंध हैं। पूर्व दिशा का स्वामी ग्रह सूर्य, आग्नेय का शुक्र, दक्षिण का मंगल, नैत्त्य का राहू-केतू, पश्चिम का शनि, वायव्य का चंद्रमा,  का बुध और ईशान का बृहस्पति स्वामी है। किसी दिशा विशेष दोष होने पर उस दिशा से संबंधित ग्रह पीड़ित होता है और अपने अशुभ फल देता है। किसी दिशा के पीड़ित होने या किसी ग्रह के पीड़ित होने पर व्यक्ति को एक समान ही कष्ट मिलते हैं। मानलीजिए किसी व्यक्ति कुंडली में सूर्य पीड़ित है तो उस व्यक्ति को सरकार से परेशानी, सरकारी नौकरी में परेशानी, नाम व प्रतिष्ठा पर आंच, पिता से संबंध ठीक न होना, सिरदर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, चर्म रोग, अस्थि रोग व मस्तिष्क की दुर्बलता आदि हो सकती है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के घर में पूर्व दिशा में दोष होने पर, वहां शौचालय होने पर, कूड़ा करकट व कबाड़ इकट्ठा होने पर सूर्य देवता पीड़ित होते हैं और उस व्यक्ति को वे सभ्ीा कष्ट हो सकते हैं जो कुंडली में सूर्य पीड़ित होने पर होते हैं। सूर्य से संबंधित उपायन करने पर पूर्व दिशा के वास्तु दोष से होने वाले कष्टों में कमी आती है। दूसरी तरफ अगर पूर्व दिशा के वास्तु दोषों के वास्तु उपायों से ठीक कर दिया जाए, तब भी सूर्य से संबंधित कष्टों में कमी आती है। इसी प्रकार आप सभी दिशाओं से संबंधित ग्रहों की पूजा पाठा मंत्र, जप, यंत्र स्थापन आप वास्तु उपायों द्वारा सभी इन ग्रहों को पीड़ित होने से बचा सकते हैं और उनसे होने वाले कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं। नवग्रहों के उपाय: 1. सुखी समाज का आधार: यदि कोई व्यक्ति अपने नवग्रहों द्वारा पीड़ित है तो उसे सबसे पहले अपने सामाजिक परिवेश को सुधारना चाहिए। आज हर व्यक्ति सुखी की चाह में वह कहां-कहां नहीं भटकता। धन, विचाग्रा, शराब, योगा इत्यादि। इन सबके पीछे भागते-भागते वह अपने समजा से दूर होता जा रहा है। सुखी समाज सुखी परिवारों से बनता है और सुखी परिवार, सुखी व्यक्ति से।

ALSO READ  AstroShrine ऐप अब Google Play Store पर उपलब्ध – अब अपने फ़ोन से जुड़िए प्रमाणित वैदिक ज्योतिषियों से

आज व्यक्ति के पास अपने परिवार के लिए ही समय नहीं है। भाई-बहन, माता-पिता, गुरु, स्त्री, नाना, दादा आदि के साथ संबंधों की गरिमा समाप्त होती जा रही है। सूर्य से पीड़ित व्यक्ति को अपने पिता की सेवा करनी चाहिए, उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। चंद्र से पीड़ित व्यक्ति माता की सेवा करे व उनका आशीर्वाद लें। भाई की सेवा करने से मंगल शुभफल देता है। बन, बैटी, बुआ व मौसी की सेवा करने से बुधदेव प्रसन्न होते हैं। स्त्री का सम्मान करने से शुक्र शुभ फलदायी होगा। नौकरों को खुश रखने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। दादा की सेवा करने से राहू व नाना की सेवा करने से केतु शुभ फलदायी होगा। समाज के इन व्यक्तियों से संबंध सुधारकर आप स्वयं तो सुखी होंगे ही, आपका परिवार और समाज भी सुखी हो जाएगा। सुखी समाज ही हमारे सुख का आधार है।

दान द्वारा उपाय: दान का मतलब है- अपनी इच्छा से किसी वस्तु को किसी दूसरे को अर्पित करना। दान यदि सुपात्र दिया जाए तो अति उत्तम है। दान को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- सात्विक दान- बिना किसी फल की इच्छा से किसी कोई वस्तु दान या उपहार देना। राजसिक दान- नवग्रहों की शांति के लिए किसी को कोई वस्तु दानन या उपहार देना। तामसिक दान- किसी का अहित करने के लिए उसे तामसी वस्तुओं का दान देना। यथा- शराब, सिगरेट, मीट, चरस व गांजा इत्यादि। दान देने के लिए कुछ उत्तम वस्तुएं इस प्रकार हैं- गाय दान: गाय के शरीर में सभी देवी देवता व चैदह भुवन निवास करते हैं इसलिए गो दान करने से इस लोक और परलोक में भी कल्याण होता है। शुक्र संबंधी दोषों को दूर करने के लिए गो दान उत्तम उपाय हैं।

भूमि दान: भूमि के दानको सर्वोत्तम दान माना गया है। मंगल संबंधी दोषों की शांति के लिए भ्ूामिदान का उपाय बताया जाता है। दशांश का दान: अपनी कमाई का दसवां हिस्सा किसी सुपात्र को दान देना या शुभ कर्मों में लगाना आत्म शुद्धि व धन शुद्धि के लिए बहुत ही अच्छा उपाय है। नवग्रहों की शांति के लिए दान: किसी पीड़ित गह की शांति के लिए उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान शुभ फलदायी होता है। इसके अतिरिक्त अन्न व भोजनदान, जल का दान, तुला दान, शय्या दान, स्वर्ण दान, पादुका दान, धार्मिक पुस्ताकं का दान भी शुभ फलदायी कहा गया है।

You have read half of this article

Log in to keep reading. Creating an account is completely free – with Google or mobile OTP, in a minute.

Log in & read more New here? Create a free account

Have a question about your life?

Get personal guidance on kundli, marriage, career and Vastu from experienced astrologers.

Consult Now