
क्या यह दृश्य अब भी आपको दिखाई देता कि, रेलवे स्टेशन पर एक आदमी अब भी डस्टबिन से लोगों की फेंकी हुई सामग्री बीनकर अपना पेट भरता नजर आता है। क्या आपने दिल्ली से चलकर देश की अलग-अलग दिशा में जाने वाली ट्रेनों का हाल देखा है। नहीं, तो एक बार जाकर देखिए, बचे हुए समोसों-कचौरियों पर बच्चे कैसे टूटते हैं। क्या आपको पता है, देश में गरीबी का क्या हाल है और 27 रुपये या 32 रुपये में एक आदमी अपना दिन कैसे निकाल सकता है? क्या आप देश में बच्चों के भविष्य की कल्पना कर सकते हैं, जिसके 48फीसदी बच्चे किसी न किसी तरह के कुपोषण के शिकार हैं, जिनका जिक्र हमारे पूर्व प्रधानमंत्री ने ‘‘राष्ट्रीय शर्म’’ के रूप में किया? क्या आपको नौकरी के लिए चप्पल घिसते नौजवान नजर आते हैं? क्या आपको देश में हजारों किसानों की आत्महत्याएं सहिष्णु या असहिष्णु के सवाल की तरह चिंतनीय नहीं लगतीं? देश में सहिष्णुता है, नहीं है, खत्म हो रही है? अनुपम खेर से लेकर आमिर खान तक की बहस जाने किस नतीजे पर पहुंचेगी? पहुंचेगी भी या नहीं! लेकिन इस देश में कुछ और भी शब्द हैं जो समाज के असहिष्णु हो जाने सरीखे ही भयंकर और खतरनाक हैं। बावजूद इसके बीते सालों में ये शब्द कभी-कभी ही वैचारिक पटल पर गंभीरता से उठाए गए। भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, भ्रष्टाचार- यूपीए से लेकर एनडीए तक इन शब्दों के प्रभाव से भली-भांति वाकिफ होते हुए भी, सुधारने के लिए क्या गंभीर कोशिश कर पाए हैं, देश की मौजूदा हालत देखकर समझ आता है, क्योंकि समस्याएं तो जस की तस हैं।
परंपरा के किसी घिसे-पिटे संस्करण के विरुद्ध, अंधविश्वास के किसी सतही स्वरूप के खिलाफ अगर आपने कुछ कहा तो किसी की भी भावना आहत हो सकती है और मौत की धमकी देने से लेकर उस पर अमल तक किया जा सकता है। असहिष्णुता और सार्थक संवाद की कम होती जा रही संभावना के खिलाफ विरोध अब केवल कुछ मु_ी भर लेखकों, फिल्मकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रह गया है। देश में व्याप्त स्थिति पर चिंता जताने वालों में पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास, पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में जीनियस माने जाने वाले कंडक्टर जुबिन मेहता, शीर्ष फिल्म अभिनेता शाहरुख खान, चोटी के सरोदवादक अमजद अली खान, उद्योग जगत के एनआर नारायणमूर्ति, किरण शॉ मजूमदार, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन, प्रसिद्ध वैज्ञानिक पीएम भार्गव और भारतीय मूल के ब्रिटिश अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई के नाम भी जुड़ गए हैं। सदाचार की बातें करते हुए किसी व्यक्ति की भावना आहत न हो और हिंसा न भडक़े, इसके लिए व्यक्ति की अभिव्यक्ति में सतर्क संतुलन स्थापित होना नितांत आवश्यक है किन्तु अपने विचार व्यक्त करने से ही असहिष्णुता की चिंगारी फैल जाये और सब मिलकर गलत साबित करने लगे ये तो घर के अंदर वार्तालाप से लेकर सामूहिक बयानबाजी, पान के ठेले पर चर्चा से लेकर मिडिया तक दिखाई देती है। 1947 में भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था क्योंकि मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र चाहती थी। विभाजन के बाद बहुत बड़ी तादाद में हिन्दू सीमा पार से भारत आए और मुसलमान पाकिस्तान गए। लेकिन इसके बावजूद मुसलमानों की अधिकांश आबादी ने भारत में रहना ही तय किया। क्योंकि कांग्रेस के नेतृत्व में चला राष्ट्रीय आंदोलन सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर स्वाधीन भारत के निर्माण में यकीन रखता था और उसने कभी भी सिद्धांत रूप में मुस्लिम लीग के इस दावे को नहीं माना था कि सिर्फ वही भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि और प्रवक्ता है।
इसलिए धर्म के आधार पर देश का बंटवारा होने के बावजूद भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने का फैसला लिया गया। राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व ने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव के आधार पर निष्कर्ष निकाला था कि एक ऐसा देश जिसमें अनेक धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोग रहते हों, केवल लोकतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष रूप में ही अपनी एकता और अखंडता को सुरक्षित रख सकता है। भारत के संविधान में भी अपने धर्म के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता दी गई है और यह प्रत्येक भारतीय का बुनियादी अधिकार है। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इस स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता।
क्योंकि लोकतंत्र में वोटों का महत्व है, इसलिए हर धर्म के बीच ऐसे संगठन बन जाते हैं जो यह प्रचारित करते हैं कि उस धर्म के सभी मानने वालों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित एक जैसे हैं और उन्हें वही संगठन पूरा कर सकता है। ये संगठन अंतत: सांप्रदायिक प्रचार पर उतर आते हैं जिसकी बुनियाद एक धार्मिक समुदाय को दूसरे के खिलाफ ख?ा करने की राजनीति पर टिकी होती है। लेकिन ऐसे सांप्रदायिक संगठन भी भारत में अपने विरोधी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की बात नहीं करते। यहां सुब्रहमण्यन स्वामी जैसे राजनीतिक नेता मुसलमानों से वोट का अधिकार छीनने जैसी सांप्रदायिक मांग तो उठा सकते हैं, लेकिन उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की मांग उठाने की उनकी भी हिम्मत नहीं पड़ती, क्योंकि आम हिन्दू के लिए इससे बुरी बात कोई नहीं हो सकती कि किसी से उसका धर्म पालन करने का अधिकार छीन लिया जाए। भारत में रहने वाले ईसाई और मुसलमान भी यहां सदियों से रहते आए हैं और उनमें भी दूसरे धर्म को मानने वालों को अपने धर्म में लाने का वैसा जोश नहीं है जैसा दूसरे देशों में पाया जाता है। अधिकांश भारतीय धर्म को निजी चीज समझते हैं और इस बात में यकीन रखते हैं कि हम अपने धर्म का पालन करें और दूसरों को उनके धर्म का पालन करने दें।
भारतीय राजनीति के लिए भी इसके फलितार्थ हैं। ‘घर वापसी’ अभियान गैर-हिंदुओं को हिन्दू बनाना भी टांय-टांय-फिस्स हो गया क्योंकि यह भारतीय समाज की मानसिकता के विरुद्ध है। यह इस बात का संकेत है कि सांप्रदायिक राजनीति चाहे वह किसी भी समुदाय की क्यों न हो, भारतीय समाज में अधिक देर तक प्रभावशाली नहीं रह सकती क्योंकि इसमें रहने वाले अधिकांश लोग धार्मिक स्वतंत्रता के मुरीद हैं। हर भारतीय हिंसा और आतंकवाद वाले धार्मिक कट्टरपंथ से दूर रहना चाहता है वह उदारवादी धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक बनने से पहले भारतीय कहलाना पसंद करता है नफरत और हिंसा से दूर रहकर गांधीवादी बन करूणा, प्यार और अहिंसा की विचारधारा को अपनाता है
किन्तु इस वर्ष की ज्योतिष्य गणनाओं बताती है की देश में कुछके छोटे-बड़े सांप्रदायिक घटनाएं हो सकती है |क्योंकि फ़रवरी की शुरुआत में ही गुरु,राहु से पापाक्रांत होकर कन्या राशि में भ्रमण करेगा | अर्थात कालपुरुष की कुंडली में कन्या राशि मतलब शत्रुता,जहाँ गुरु भाग्येश होकर छठे स्थान में राहु से आक्रांत रहेंगे इसका सीधा सा मतलब है प्रभावशाली लोग समस्या को नज़रअंदाज करेंगे और आमजन के मन में असंतोष पनप सकता है |जिसका सीधा सा मतलब है की 2016 के प्रथम छ:माही में असहिष्णुता स्पष्ट दिखाई देगी |इसे रोकने समय रहते प्रयास जरुरी है |
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