जीवन की उपयोगिता है वास्तु शास्त्र

वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। आज भी जितने भवन और बिल्डिंग आदि बन रही है अधिकांश में वास्तु के हिसाब से बनाया जा रहा है ,
आइये जानते है वास्तु के कुछ नियम :-वास्तु तीन प्रकार के होते हैं- त्र आवासीय – मकान एवं फ्लैट त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए।
यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है
वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है। किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी।
किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है जैसे :-
पूजा कक्ष – ईशान कोण, स्नान घर- पूर्व रसोई घर-आग्नेय, मुखिया का शयन कक्ष- दक्षिण, युवा दम्पति का शयन कक्ष वायव्य कोण एवं उत्तर के बीच, बच्चों का कक्ष वायव्य एवं पश्चिम, अतिरिक्त कक्ष- वायव्य, भोजन कक्ष-पश्चिम अध्ययन कक्ष- पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच, कोषागार- उत्तर एवं स्टोर- र्नैत्य कोण जल कूप या बोरिंग-उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर – र्नैत्य कोण, जल कूप या बोरिंग – उत्तर दिशा या ईशान कोण, सीढ़ी घर- नै र्त्य कोण, शौचालय- पश्चिम या उत्तर पश्चिम (वायव्य) अविवाहित कन्याओं के लिये शयन कक्ष-वायव्य। भवन में सबसे आवश्यक कक्ष पूजा घर है।
ईशान कोण पूर्व एवं उत्तर से प्राप्त होने वाली उर्जा का क्षेत्र है। इस कोण के अधिपति शिव हैं, जो व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान करते हैं। प्रातः कालीन सूर्य की किरणें सर्वप्रथम ईशान कोण पर पड़ती है। इन किरणों में निहित अल्ट्रॉवायलेट किरणों में इतनी शक्ति होती है कि वे स्थान को कीटाणुमुक्त कर पवित्र बनाते हैं। पवित्र स्थान पर पूजा करने से व्यक्ति का ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित होता है जिससे शरीर में स्फूर्ति, शक्ति का संचार होता है साथ ही भाग्य बली होता है।
आग्नेय कोण में अग्नि के देवता के स्थित होने से भोजन को तैयार करने में सहायता मिलती है एवं भोजन स्वादिष्ट होता है। भोजन बनाते समय गृहणी का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिये इसका कारण यह है कि पूर्व दिशा से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा गृहणी को शक्ति प्रदान करती है।
ईशान कोण में रसोई नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह जल के क्षेत्र हैं। जल तथा अग्नि में परस्पर शत्रुता है। र्नैत्य कोण में रसोई बनाने से परस्पर शत्रुता पारिवारिक कष्ट एवं अग्नि से दुर्घटनाओं का भय तथा जन-धन की हानि होती है। दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं तथा ग्रह मंगल हैं। यम का स्वभाव आलस्य एवं निद्रा को उत्तन्न करता है। सोने से पहले मनुष्य के शरीर से आलस्य एवं निद्रा की उत्पत्ति होने से मनुष्य को अच्छी नींद आती है। भरपूर नींद के बाद शरीर फिर से तरोताजा हो जाता है। इसीलिए परिवार के मुखिया का शयन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए।
अतिथि गृह का वायव्य कोण में होना लाभप्रद है। इस दिशा के स्वामी वायु होते हैं तथा ग्रह चंद्रमा। वायु एक जगह नहीं रह सकते तथा चंद्रमा का प्रभाव मन पर पड़ता है। अतः वायव्य कोण में अतिथि गृह होने पर अतिथि कुछ ही समय तक रहता है तथा पूर्व आदर-सत्कार पाकर लौट जाता है, जिससे परिवारिक मतभेद पैदा नहीं होते।
वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं। इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए। वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला। दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है। उसमें आलस्य नहीं होती है। अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है।
पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है।चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है। अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है। टोडरमल ने अपने ‘वास्तु सौखयम्’ नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है। राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया-‘पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप’। पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं।
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