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आपके घर का वास्तु तो नहीं….आपके आपसी रिश्तों में तनाव का कारण

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अकसर परिवारों में सास-बहू, भाई-बहन, भाभी, माता-पिता के टकरावों के बारें में हम सुनते है. किसी परिचित परिवार में यदि ऐसा अलगाव दिखता है तो मन में बहुत दुःख होता है.किसी का वश नहीं चलता हम अपने ही सामने अपने मित्र या सम्बन्धी व रिश्तेदार का परिवार जो कुछ समय पहले शांत तथा मिलजुल के रहने वाला था किन्तु आज पल भर में ही बिखर गया.इसमें किस की गलती है या किस की नहीं यह तो सोचने से बाहर की बात हो गयी चाहे कुछ हो एक घर जो बड़ी मुश्किलों से बनता है आज उसे हम बिखरता हुआ देख रहे है.—
——-क्या कारण है कि पल भर में ही ऐसा हो रहा है. इसका उत्तर केवल वास्तु शास्त्र में ही वर्णित है यदि हम इस वास्तु के नियम अनुसार चलते है तो यह स्थिति पुनः नहीं दिखाई देगी. और सास-बहू के रिश्तों को मधुर बनाया जा सकता है. जन्मकुंडली के मिलान के समय हम केवल युवक एवं युवती की राशि,नक्षत्र व गण भकूट और नाडी का ही मिलान करते है किन्तु परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलान की व्यवस्था हमारे पास उपलब्ध नही है. इसी कारण से हम विपरीत परिणाम देखते है.
नये मकान के निर्माण की जानकारी देने के लिए, प्लॉट की दिशाओं का सही निर्धारण करने के साथ, प्लॉट के आस-पास की भौगोलिक वास्तु स्थिति, निर्माण करवाते समय आप जिस मकान में रह रहे हैं, उस मकान की वास्तु स्थिति तथा आपकी आर्थिक सामर्थ्य एवं आवश्यक्ताओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।
मकान का निर्माण अगर वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत हो गया तो, उस नव-निर्मित मकान में पैदा होने वाले वास्तु-दोषों के दुष्परिणाम, उस मकान में निवास करने वालों के जीवन को समस्याग्रस्त स्थिति में परिवर्तित कर देंगे, क्योंकि आपका वर्तमान और भविष्य, आपके मकान की वास्तु के आधार पर ही प्रभावित होगा।
मकान जीवन में बार-बार नहीं बनाए जाते हैं, अत: इतना चिंतन अवश्य करें कि मकान के निर्माण में एक कुशल व अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ का मार्गदर्शन आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सक्षम होगा।
आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। किंतु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए हमें वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा।
—-वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार घर / भवन में पारिवारिक सदस्यों को कहां कहां रहना व सोना चाहिए जिससे उनके आपस में सम्बन्ध मधुर हो. वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार परिवार का मुखिया दक्षिण-पश्चिम कोण में सोना चाहिए.इस कोण में होने से आत्म विशवास बड़ता है. तथा वह निर्णय लेने में समर्थ होता है दक्षिण में सिर करके होने से व्यक्ति में नेतृत्व कि क्षमता बडती है.यदि दक्षिण में सिर करने की सुविधा न हो तो पूर्व दिशा में सिर करके तथा पश्चिम में पैर करके भी शयन किया जा सकता है.
—-परिवार का जो भी सदस्य यदि दक्षिण-पश्चिम में निवास करता है तो वह घर में प्रभावशाली हो जाता है अत: स्पष्ट है कि घर के मुखिया उसकी स्त्री को घर के दक्षिण-पश्चिम में निवास करना चाहिये. तथा कनिष्ठ स्त्री-पुरुष, देवरानिया या बहू को शयन नहीं करना चाहिये.
—–जो स्त्रियां घर के वायव्य उत्तर-पश्चिम कोण में शयन / निवास करती है उनके मन में उच्चाटन का भाव आने लगता है वह अपने अलग से घर बसाने के सपने देखने लगती है. इस लिए इस कोण में अविवाहित कन्याओं को निवास करना शुभ होता है जिससे उनका विवाह शीघ्र हो.
—वायव्य कोण में नई दुल्हन को तो बिलकुल मत रखे इससे उसका परिवार के साथ अलगाव रहेगा.
—-वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार दक्षिण-पश्चिम कोण दिशा घर की सबसे शक्तिशाली होती है इसमें सास को सोना चाहिए अगर सास ना हो तो घर की बड़ी बहू को सोना चाहिए उससे छोटी को पश्चिम दिशा में रहना चाहिए उससे भी छोटी तीसरे नम्बर की बहु को पूर्व दिशा में शयन करना चाहिए यदि और भी चोटों बहू हो तो उसे ईशान कोण में निवास रखना चाहिए.
—–अगर आपका पूजा घर सीढियों के निचे बना हुआ है तो बहुत गलत है,इसके क्या दुषप्रभाव है जानिये —-
—-बहु और सास में झगडे होते हैं
—आपके पड़ोसियों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहेंगे
—आपके घर में शादी विवाह में रुकावट आएगी
—आपके घर में अशांति रहेगी,इस लिए सीढियों के निचे अपने घर में पूजा घर ना बनाइये
—दक्षिण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के बायीं और शयन करना चाहिए अग्नि कोण में सोने वाली स्त्री को अपने पति के दायी और शयन करना चाहिए
—-ग्रहस्थ सांसारिक मामलों में पत्नी को हमेशा पति के बायीं और ही शयन करना चाहिए .
—परिवार की मुखिया सास या बड़ी बहू को कभी भी ईशान कोण में नहीं सोना चाहिए इससे परिवार में प्रभाव कम हो कर हास्यास्पद स्थिति रहती है वृद्धावस्था में अग्नि कोण में रह सकती है
—हमेशा इस बात का ध्यान रखे कि उत्तराभिमुख घर में उत्तर दिशा से ईशान कोण तक, पूर्वाभिमुख घर में पूर्व दिशा मध्य से अग्नि कोण पर्यन्त, दक्षिणाभिमुख मकान में दक्षिण दिशा मध्य से दक्षिण-पश्चिम कोण तक तथा —-पश्चिम मुख मकानों में पश्चिम दिशा से वायव्य कोण तक यदि बाह्य द्वार न रखा जाय तो घर की सभी स्त्रियां आपस में समन्वय व प्रेम की और अग्रसर हो कर सुख की अनुभूति करती है तथा परिवार में सुख समृधी बडती है.
—यही कारण हें कि आज के युग में यदि हम प्रक्टिकल वास्तु अपनाते है तो जीवन में किसी भी प्रकार के कष्ट से बिना यंत्र-मन्त्र-तंत्र से छुटकारा पा कर उन्नति के मार्ग में चल सकते है.

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