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श्रीअमलेश्वर वीर-स्तवः

 


 श्रीअमलेश्वर वीर-स्तवः

कालातिगं कलुषप्रशमन्यनाथं,
निर्मायिकं वपुर्निखिलं स्वदीपम्।
अम्लानशुद्धमनसं परमेशमीडे,
खारूनतीरनिलयं शरणं प्रपद्ये॥

भीमार्जुनाद्ययुधवीरवरानुकूलं,
द्रौपद्यनन्दनसुतार्तिहरं दयालुम्।
युद्धेऽपि शान्तिधृतमूर्तिममुं नितान्तं,
अमलेश्वरं प्रणामि वीरमुखं पुराणम्॥

मौर्यवंशविभवः क्षत्रराजशेखरः सन्,
अशोकनाम जगति शान्तिपथं विधाय।
शमशूलहरमार्गमधिगत्य भूयः,
अमलेशपूजनरतः बभूव धीमान्॥

विक्रमादित्यसम्राज्यशिरोमणिस्तु,
उज्जयिन्यां निवसन् शिवतत्त्वबोधी।
स्वप्नसंकेतवशात् खारुने गतः सन्,
मौनव्रतेन समुपास्य हरं ददर्श॥

शङ्कराचार्यमहायशसे कदाचित्,
दक्षिणदेशविहारवशात् समागात्।
खारूतटे स शिवमेकमवेक्ष्य भूयो,
“निर्मलशक्तिप्रभवोऽयममल” इत्यवोचत्॥

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