
यह बात ध्यान रखने योग्य है कि जब धनदायक ग्रह अर्थात् दृष्टि, युति और परिवर्तन द्वारा परस्पर संबंधित हो तो शास्त्रीय भाषा में ये योग महाधन योग के नाम से जाने जाते हैं। लग्नेष, धनेष, एकादशेष, धन कारक ग्रह गुरु तथा सू0 व च0 अधिष्ठित राशियों के अधिपति सभी ग्रह धन को दर्शाने वाले ग्रह हैं। इनका पारस्परिक संबंध जातक को बहुत धनी बनाता है। नवम भाव, नवमेश भाग्येश, राहु केतु तथा बुध ये सब ग्रह भी शीघ्र अचानक तथा दैवयोग द्वारा फल देते हैं। धन प्राप्ति में लग्न का भी अपना विशेष महत्व होता है। लग्नाधिपति तथा लग्न कारक की दृष्टि के कारण अथवा इनके योग से धन की बढ़ोत्तरी होती है। योग कारक ग्रह (जो कि केन्द्र के साथ-साथ त्रिकोण का भी स्वामी हो) सर्वदा धनदायक ग्रह होता है। यह ग्रह यदि धनाधिपति का शत्रु भी क्यों न हो तो भी जब धनाधिपति से संबंध स्थापित करता है तो धन को बढ़ाता है। जैसे कुंभ लग्न के लिए, यदि लाभ भाव में योग कारक ग्रह ‘शुक्र’ हो और धन भाव में (वृ0) स्वग्रही हो तो अन्य बुरे योग होते हुए भी जातक धनी होता है, क्योंकि योग कारक ‘शुक्र’ व धनकारक ‘वृ0′ व लाभाधिपति ‘वृह’ का केन्द्रीय प्रभाव है। यद्यपि ये दोनों ग्रह एक दूसरे के शुभ हैं।
दशाओं का प्रभाव—-
शुक्र की महिमा——
लग्न के अनुसार पैसे वाले—–
लग्न के अनुसार कमाने वाले—–
विभिन्न प्रमुख ज्योतिषीय ग्रन्थों वृहत पराशर होरा-शास्त्र, वृहतजातक, जातक तत्व, होरा सार, सारावली, मानसागरी, जातक परिजात आदि विभिन्न-विभिन्न धन योगों का विवरण प्राप्त होता है। परन्तु उनमें मुख्य जो अक्सर जन्मकुंडलियों में पाये जाते हैं तथा फलदायी भी हैं,
- —–भाग्येश बुध से लाभेश मंगल कार्येश शुक्र सुखेश मंगल पंचमेश शुक्र लगनेश शनि धनेश शनि का गोचर से जन्म के बुध के साथ गोचर हो.
- —–कार्येश शुक्र का लाभेश मंगल सुखेश मंगल लगनेश शनि पंचमेश शुक्र धनेश शनि से गोचर से जन्म के कार्येश शुक्र के साथ गोचर हो.
- —–लाभेश मंगल का धनेश शनि लगनेश शनि से गोचर से जन्म के मंगल के साथ युति बने.
- —–लगनेश शनि का सुखेश मंगल धनेश शनि पंचमेश शुक्र से गोचर से जन्म के शनि के साथ योग बने.
- —-धनेश शनि का सुखेश मंगल पंचमेश शुक्र से योगात्मक रूप जन्म के शनि के साथ बने.
- —-सुखेश मंगल के साथ पंचमेश शुक्र से गोचर से जन्म के मंगल के साथ योगात्मक रूप बने.
- —–अगर भाग्येश और षष्ठेस एक ही ग्रह हो
- —-मकर लगन की कुंडली मे भाग्येश और षष्ठेश बुध एक ही ग्रह है,यह धन आने का कारण तो बनायेंगे लेकिन अधिकतर मामले मे धनेश,लगनेश,सुखेश,कार्येश के प्रति धन को या तो नौकरी से प्राप्त करवायेंगे या कर्जा से धन देने के लिये अपनी युति को देंगे.
- —–यदि चन्द्रमा से 6, 7, 8वें भाव में समस्त शुभ ग्रह विद्यमान हों और वे शुभ ग्रह क्रूर राशि में न हों और न ही सूर्य के समीप हों तो ऐसे योग (चन्द्राधियोग) में उत्पन्न होने वाला जातक धन, ऐश्वर्य से युक्त होता है तथा महान बनता है।
- —–अनफा व सुनफा योग जो चन्द्र से द्वितीय, द्वादश भाव में सूर्य को छोड़कर अन्य ग्रहों की स्थिति द्वारा बनते हैं, जातक अपने पुरुषार्थ से धन को प्राप्त करता है। या करने वाला होता है।
- —–एक भी शुभ ग्रह केन्द्रादि शुभ, स्थान में स्थित होकर, उच्च का हो व शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो तो धनाढ्य तथा राजपुरुष बना देता है।
- —-पुष्फल योग एक धन और यश देने वाला योग है, जिसमें चन्द्राधिष्ठित, राशि के स्वामी का लग्नेश के साथ होकर केन्द्र में बलवान होना अपेक्षित होता है।
- —-लग्नेश द्वितीय भाव में तथा द्वितीयेश लाभ भाव में हो।
- —-चंद्रमा से तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें स्थानों में शुभ ग्रह हों।
- —–पंचम भाव में चंद्र एवं मंगल दोनों हों तथा पंचम भाव पर शुक्र की दृष्टि हो।
- —-चंद्र व मंगल एकसाथ हों, धनेश व लाभेश एकसाथ चतुर्थ भाव में हों तथा चतुर्थेश शुभ स्थान में शुभ दृष्ट हो।
- —-द्वितीय भाव में मंगल तथा गुरु की युति हो।
- —-गज केसरी योग जिसमें बृहस्पति और चन्द्र का केन्द्रीय समन्वय होता है, धन एवं यश देने वाला होता है।
- —-यदि कुंडली में कर्क राशि में बुध और शनि 11वें भाव में हो तो जातक महाधनी होता है। (जा0त0)
- —-जिस जातक की कुंडली में लाभ भाव में ‘वृ0′ हों और पंचम भाव में सूर्य स्वगृही हों तो जातक की कुंडली में महाधनी योग बनता है।
- —-कर्क राशि का चन्द्र लग्न भाव में वृ0 और म0 के साथ हो तो महाधनी योग बनता है।
- —–धनेश अष्टम भाव में तथा अष्टमेश धन भाव में हो।
- —-पंचम भाव में बुध हो तथा लाभ भाव में चंद्र-मंगल की युति हो।
- —गुरु नवमेश होकर अष्टम भाव में हो।
- —-वृश्चिक लग्न कुंडली में नवम भाव में चंद्र व बृहस्पति की युति हो।
- —-मीन लग्न कुंडली में पंचम भाव में गुरु-चंद्र की युति हो।
- —-कुंभ लग्न कुंडली में गुरु व राहु की युति लाभ भाव में हो।
- —-चंद्र, मंगल, शुक्र तीनों मिथुन राशि में दूसरे भाव में हों।
- —-कन्या लग्न कुंडली में दूसरे भाव में शुक्र व केतु हो।
- —-तुला लग्न कुंडली में लग्न में सूर्य-चंद्र तथा नवम में राहु हो।
- —-मीन लग्न कुंडली में ग्यारहवें भाव में मंगल हो।
- —-यदि जन्मकुंडली में स्वराशि का ‘वृ0′ लग्न भाव में ‘चन्द्रमा’ और ‘मं0′ के साथ हो तो महाधनी योग होता है।
- —यदि स्वराशि का ‘षु’ लग्न भाव में चं0 और सूर्य से युक्त अथवा दृष्ट हो तो महाधनी योग होता है।
- —-यदि कुंडली में लाभेश-धनभाव में और धनेश-लाभ भाव में हो तो जातक को धन लाभ बहुत अधिक कम प्रयास से प्राप्त होता है।
- —धनेश और लाभेश केन्द्रों में हो तो भी जातक को धन-लाभ होता है।
- —यदि धनेश लाभ भाव में हो तो जातक धनी होता है।
- —-जन्म लग्न या पंचम भाव में मकर या कुंभ राशि का ‘श0′ हो और बु0 लाभ स्थान में हो तो जातक को सब प्रकार से धन लाभ होता है।
- —यदि जन्म लग्न में कर्क लग्न हो और लग्न में चं0, वृ0 तथा मं0 हो तो जातक को अचानक धन लाभ होता है।
- —-धन स्थान का स्वामी धन स्थान में, लाभ स्थान का अधिपति लाभ स्थान, धनेश, लाभेश लाभ स्थान में स्वराशि या मित्र राशि का अथवा उच्च का हो तो जातक धनवान होता है।
- —-यदि जन्मकुंडली में लाभेश और धनेश लग्न में हो तो दोनों मित्र हों तो धन-योग बनता है और यदि लग्न का स्वामी धनेश और लाभेश से युक्त हो तो महाधनी योग बनता है।
- —यदि धनेश लग्न में और लग्न का स्वामी धन भाव में हो तो बिना प्रयत्न किये जातक धनवान होता है।
- —धन भाव में ‘गु0′ शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है।
- —जब जन्मकुंडली में धन स्थान में ‘शुक्र’ हो, शुभ ग्रह युक्त तथा दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है। “जन्मकुंडली में यदि ग्रह नीच राशि में भी स्थित हो तो भी यदि उसकी नीच राशि का स्वामी लग्न में या केन्द्र में स्थित हो अथवा उसकी उच्च राशि का स्वामी यदि लग्न से केन्द्र में स्थित हो तो नीच भंग योग होता है व जातक धनी होता है।”
- —-जब लग्न भाव का स्वामी त्रिकोण में स्थित हो, धन भाव का स्वामी लाभ भाव में हो, तथा धन भाव पर धनेश की दृष्टि हो तो कुंडली में महालक्ष्मी योग बनता है।
- —-यदि भाग्य स्थान का स्वामी अपनी उच्च राशि में या मूल त्रिकोण अथवा स्वराशि में केन्द्र में स्थित हो, तो भी जातक धनी होगा।
- —–ग्यारहवें और बारहवें भाव का अच्छा संबंध होने पर जातक लगातार निवेश के जरिए चल-अचल संपत्तियां खड़ी कर लेता है। पांचवां भाव मजबूत होने पर जातक सट्टा या लॉटरी के जरिए विपुल धन प्राप्त करता है।
- ——किसी भी जातक के पास किसी समय विशेष में कितना धन हो सकता है, इसके लिए हमें उसका दूसरा भाव, पांचवां भाव, ग्यारहवां और बारहवें भाव के साथ इनके अधिपतियों का अध्ययन करना होगा। इससे जातक की वित्तीय स्थिति का काफी हद तक सही आकलन हो सकता है। इन सभी भावों और भावों के अधिपतियों की स्थिति सुदृढ़ होने पर जातक कई तरीकों से धन कमाता हुआ अमीर बन जाता है।
- —-किसी भी लग्न में पांचवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक सट्टा या अचानक पैसा कमाने वाले साधनों से कमाई का प्रयास करता है। चंद्रमा फलदाई हो तो ऐसे जातक अच्छी कमाई कर भी लेते हैं।
- —-कारक ग्रह की दशा में जातक सभी सुख भोगता है और उसे धन संबंधी परेशानियां भी कम आती हैं।
- —-सातवें भाव में चंद्रमा होने पर जातक साझेदार के साथ व्यवसाय करता है लेकिन धोखा खाता है।
- —-छठे भाव का ग्यारहवें भाव से संबंध हो तो, जातक ऋण लेता है और उसी से कमाकर समृद्धि पाता है।
- —भगवान के प्रकाश यौगिक क्रिया द्वारा और पदजनजपवाद द्वारा जातक के मुख, हथेली, कुंडली आदि का ध्यान रखकर सम्पत्ति, धन, लाभ, निधि आदि का ज्ञान कराना ही ज्योतिष और धन योग है। सम्पत्ति का संबंध भूमि से और धन का संबंध नगदी, सिक्के नोट आदि से है और लाभ का संबंध व्यापार, व्यवसाय, कपड़ा, मकान, वाहन आदि से संबंध है निधि का अर्थ है अनायास धन प्राप्त होना या आकस्मिक धन प्राप्त होना या अचानक पैतृक सम्पत्ति प्राप्त होना।
- —-सर्वप्रथम जन्मकुंडली में धन योग या राजयोग का ज्ञान ग्रहों, राशि, नक्षत्र स्वामी, की क्रूरता सौम्यता स्थान की शुभता/अशुभता और ग्रहों के अधिकार संबंध दशा/अन्तरदशा, होरा, अष्टक वर्ग व गोचर का पारस्परिक संबंध होने से धन योग की शुभता और अशुभता का ज्ञान हो सकता है।
- —-यदि आपके दाहिने पैर की पिंडली फड़क रही है तो आपको अचानक कहीं से पैसे मिलने की संभावना बनी रहती है।
- —निचले होंठ का फड़कना जीवन साथी या प्रेमी या प्रेमिका से सुख और पैसों का सुख मिलने का इशारा होता है। होंठ का दाहिना कोना फड़कना आपको मित्रों से अचानक धन लाभ होने का संकेत देता है।
- —-दाहिनी आंख का कोना फड़कना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसे में आपको पैसों के साथ-साथ कोई बहुत शुभ समाचार प्राप्त होने की संभावना होती है। बाएं ओर की आंख का फड़कना अशुभ माना जाता है।
- —–यदि आपको दोनों होंठ एक साथ फड़कते हैं तो आपको पैसा और किस्मत दोनों का योग बनता है। यदि किसी व्यक्ति की दाहिनी हथेली फड़ती है तो उसे धन का लाभ प्राप्त होता है। यदि दाहिना हाथ फड़कता है तो भी पैसे साथ व्यक्ति को मान सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
- —-यदि किसी व्यक्ति के दोनों भौहों के बीच फड़कन होती है तो ऐसे इंसान को सुख-सुविधाएं प्राप्त होने की संभावनाएं होती है। ऐसा व्यक्ति निकट भविष्य में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के कंठ या गला फड़फड़ाता है तो यह भी शुभ सगुन है। माथे का फड़कना भी शुभ संकेत देता है। माथा फड़कने से व्यक्ति को भूमि भवन संबंधित लाभ होने की संभावना रहती है।





