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विदेश यात्रा तथा ज्योतिषीय योग

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प्राचीन काल में विदेष यात्रा अषुभ माना जाता था, संभवतः जिसके कारण प्राचीन पुस्तकों में विदेष यात्रा के लिए किसी विषेष कारक का उल्लेख नहीं किया गया है। परंतु प्राचीन काल में जहाज यात्रा का जिक्र अवष्य है, जोकि प्रायः लंबी दूरी की यात्रा या विदेष की यात्रा मानी जाती थी। आधुनिक काल में विदेष यात्रा तथा वहाॅ निवास करने की महत्ता इतनी ज्यादा है कि प्रायः हर व्यक्ति जानना चाहता है कि वह जीवन में विदेष यात्रा कर पायेगा या नहीं अथवा उसकी कुंडली में विदेष यात्रा के योग हैं कि नहीं। किसी व्यक्ति की विदेष यात्रा से संबंधित जानकारी हेतु उस व्यक्ति का लग्नाधिपति, द्वादषेष, नवमभाव तथा नवमाधिपति तथा सप्तमेष या सप्तमाधिपति पर विचार किया जाता है। छोटी यात्रा को तीसरे स्थान तथा दूरस्थ स्थान पर निवासरत होने के लिए चतुर्थेष को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
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यदि किसी जातक के लग्नाधिपति की अपे्रक्षा द्वादषेष उत्तम स्थिति में हो, या उच्च तथा मित्र राषि में हो तो जातक जन्मभूमि में सफलता प्राप्त करता है। चतुर्थेष, पंचमेष और नवमेष परस्पर संबंधित हो तो जातक उच्च षिक्षण हेतु विदेष जाता है। यदि इनका संबंध बुध ग्रह से हो तो जातक षिक्षा, अनुसंधान, अध्ययन या लेखन कार्य हेतु यदि इनका संबंध बृहस्पति ग्रह से हो तो प्रोफेसर या व्याख्यान हेतु जाता है। नवमाधिपति और दसमाधिपति संबंधित हो तो जातक जीवनवृत्ति अथवा व्यवसाय या नौकरी हेतु विदेष जाता है।इनके साथ यदि षष्ठेष की भी युति हो तो जातक सरकारी कार्य से विदेष जाता है तथा उसे नियोक्ता द्वारा भेजा जाता है। यदि द्वादषेष तथा दषमेष एवं एकादषेष का संबंध हो तो जातक राजनैतिक उद्देष्य से विदेष यात्रा करता है। यदि सप्तमाधिपति तथा सूर्य का संबंध भी बन रहा हो तो राजनयिक या षिष्टमंडल के रूप में विदेष प्रवास करता है। यदि द्वादषेष, लग्नाधिपति का संबंध किसी प्रकार से शुक्र या सप्तमेष से स्थापित हो रहा हो तो विवाह के उपरांत विदेष प्रवास के योग बनते हैं। यदि एकादषेष तथा द्वादषेष का संबंध किसी प्रकार से शुक्र और शनि का संबंध बन रहा हो तो कला या हुनर के प्रदर्षन हेतु विदेष प्रवास कर यष प्राप्त करता है। यदि कमजोर लग्नाधिपति तथा षष्ठेष से संबंध स्थापित हो रहा हो तो चिकित्सा कारणों से विदेष प्रवास होता है।
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यदि नवमेष या द्वादषेष का पापग्रहों से प्रभाव हो तो धृणित कार्यो अथवा अपराध हेतु विदेष जाना बनता है। यदि द्वादषेष तथा नवमेष का संबंध शनि एवं बृहस्पति से संबंध स्थापित हो रहा हो तो धार्मिक कर्म या आध्यात्मिक उद्देष्य हेतु विदेष प्रवास करता है। इस प्रकार किसी जातक की जन्म कुंडली तथा निरयणभाव का सूक्ष्म अध्ययन कर विदेष प्रवास के योग तथा कारणों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है साथ ही ग्रहों के गोचर के अनुसार ग्रह दषाओं में विदेष यात्रा का समय ज्ञात किया जा सकता है।