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जानिए,राहु व केतु का द्वादश भाव में फल

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राहु व केतु का द्वादश भाव में फल

आजकल जन सामान्य राहु व केतु का नाम सुनकर ही घबरा जाता है, चाहे राहु व केतु लाभदायी ही क्यों न हों। तथाकथित ज्योतिषियों द्वारा प्रसारित ढ़़ोंग कालसर्प योग का व्यक्ति विशेष के मानसपटल पर गहरा प्रभाव पड़ चुका है। इस ढोंग के समापन के लिए मैं यहाॅ राहु व केतु के द्वादश भाव में उपस्थिति का फल लिख रहा हूॅ इससे आपको स्पष्ट हो जाएगा कि राहु अन्य ग्रहों की तरह ही लाभदायी व नुकसानदायी होता है।

राहु फलम्

प्रथम भाव: महर्षि गर्ग के अनुसार यदि राहु लग्न में हो तो निम्न फल प्रदान करता है।
सर्वागरोगी विकलः कुमूर्तिः कुवेशधारी कुतर्की कुकर्मी।
अधार्मिकः साहसकर्मदक्षो रक्तेक्षणश्च द्ररिद्रौ तनुस्थे।
अर्थात् यह जातक को रोगी काया, आलसी, गंदा रहने वाला, अधार्मिक, दुष्चरित्रवान और साहसी कार्यो में दक्ष बनाता है। राहु लग्नगत हो, आंखों में लालिमा प्रदान करता है व शरीर की बनावट मे कुछ न कुछ असामान्य भी देता है और यदि शुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण शारीरिक असमान्यता नहीं होती तो वाणीदोष देता है। अनुभव में यह पाया गया है कि यदि राहु लग्न में मेष, वृष, कर्क और सिंह राशि का हो तो उत्तम फल प्रदान करता है। लग्नगत राहु समस्त भौतिक सुख प्रदान करता है। ऐसा जातक सामान्य घर में पैदा हो तो भी उच्चतर स्थिति प्राप्त करता है। राहु प्रधान जातक सदैव अपने साहस, पराक्रम व खतरा मोले लेने की प्रकृति के कारण पहचाने जाते हैं।

द्वितीय भाव:द्वितीय भाव का राहु जातक को महत्वाकांक्षी तथा जोखिम लेने की प्रवृत्ति वाला बनाता है। ऐसा जातक बहुत धन कमाता है व धन कमाने के लिए कोई भी नाजायज मार्ग भी चुन सकता है। ये जातक अपने स्वयं के उद्देश्य के प्रति बहुत जागरूक होते हैं व आसानी से कभी भी हारते नहीं। अपने व्यापार/नौकरी में सदैव कुछ न कुछ समस्या से गुजरते हैं और कई बार इन्हें अदालती मार्ग भी चुनना पड़ता है। द्वितीयस्थ राहु घर से दूर अधिक समृ़द्धता प्रदान करता है। ऐसे जातकों का पारिवारिक सदस्यों से सम्बन्ध खराब होता है तथा परिवार में सदैव किसी न किसी का स्वास्थ्य खराब रहता है। द्वितीयस्थ राहु, दो विवाह का योग भी देता है। यदि द्वितीयस्थ राहु को मंगल व शनि दृष्टि कर रहे हो तो यह योग निश्चित ही फलीभूत होता है। द्वितीय भाव में कन्या व कुम्भ राशि को छोडकर शेष सभी राशियों में राहु का फल उत्तम होता है।

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तृतीय भाव: तृतीयस्थ राहु जातक को साहसी, पराक्रमी, बलवान तथा परिश्रमी बनाता है। ऐसे जातक अपने हाथ में जो भी कार्य लेते हैं उसे पूरा करते हैं। छोटे-छोटे कार्यो में इनका मन नहीं लगता, ये सदैव बड़े कार्य करने में विश्वास रखते हैं। अपने अल्प परिश्रम से ही ये अधिक समृद्धिता प्राप्त करते है। सफलता इन्हे सहज ही प्राप्त होती है जिसके फलस्वरूप कभी-कभी इनका व्यवहार थोड़ा रूखा भी हो जाता है। भाग्य इनका खूब साथ देता हैं। परन्तु भाइयोे के मामले के ये सदैव अभाग्यशाली होते है। इनकी आपस में बनती नहीं, जिससे परिवार में विखण्डन होता है। तृतीयस्थ राहु जातक को कर्णपीड़ा भी प्रदान करता है। परन्तु यदि शुभ ग्रह बृहस्पति इसे देखता है तो कर्णपीड़़ा दोष समाप्त हो जाता है। अनुभव में यह देखा गया है कि यदि राहु तृतीय भाव में धनात्मक राशि में है तो निश्चय ही जातक भाग्यशाली व समृद्धशाली होता है, परन्तु ये जातक दूसरे की चिन्ता कम करने वाले होते है। तृतीयस्थ राहु स्वयं की सफलता के िलए गलत मार्ग भी चुनने में समय नहीं लेता। इनके भाइयों का प्रारब्ध साथ नहीं देता। यदि राहु तृतीय भाव में नकारात्मक राशि में हो तो बहनों के िलए अत्यधिक खराब परिणाम देता है या तो उनकी प्रारम्भ में ही मृत्यु हो जाती है या उनका जीवन अत्यधिक दुःखी होता है।

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चतुर्थ भाव: चतुर्थ भाव में राहु की उपस्थिति निश्चित ही निराशाजनक होती है। यद्यपि बृहस्पति व शुक्र की यदि राहु पर दृष्टि पड़ रही हो तो जातक को निराशाजनक परिणाम कम प्राप्त होते हैं। परन्तु यदि शुभ ग्रह को दृष्टिगत सम्बन्ध न हो तो माता-पिता में एक का सुख प्राप्त नही होता है। अन्य योगों के कारण यदि जातक अच्छा धन भी प्राप्त कर ले तो भी भूमि, गृह का सुख प्राप्त नहीं हांेता है। स्वयं के गृह निर्माण का स्वप्न पूरा होने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जातक की पत्नी की मृत्यु उससे पहले होती है और विधुर का जीवन व्यतीत करता है। परन्तु यदि शुभ ग्रहो की दृष्टि राहु पर हो, तो जातक को कैरियर में कम आयु में अच्छी उचाई प्रदान करता है व गृह तथा वाहन का पूर्ण सुख भी प्राप्त होता है। चतुर्थ भाव के राहु पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा मंगल, राहु को देखें तो परिवार में विशिष्ट सदस्य की हत्या का योग बनता है। यदि राहु को शनि देखें, तो जातक की माता को गम्भीर बीमारी होती है। सारांश रूप में चतुर्थस्थ राहु, सदैव खराब फल प्रदान करता है।यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो।

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पंचम भाव: पंचम भाव में राहु की उपस्थिति मिश्रित फल प्रदान करती है। यदि राहु मेष, वृष, कर्क व सिंह राशि का हो तो जातक साहसी, प्रतिभावान, कर्मठ तथा धैर्यवान होता है। ऐसा जातक स्वयं के निखार तब आता है जब ये अपने विषम परिस्थितियों से गुजरते हैं। ईश्वरने इन्हे कष्ट सहन करने की अद्भुत क्षमता दी है। परन्तु स्वयं के प्रयास से ये प्रत्येक विषम परिस्थिति से बाहर आ जाते है और अंततः अपनी मंजिल प्राप्त कर लेते है। उपरोक्त वर्णित राशियों के अतिरिक्त पंचमस्थ राहु, जहाॅ अध्ययन पूरा नहीं होने देता वहीं सन्तान की चिन्ता देता है। साथ ही साथ अचानक धननाश का योग भी देता है। जीवन में सदैव उतार-चढ़ाव लगा रहता है। समराशि में गया हुआ राहु अधिकतर मात्र कन्या सन्तान देता है। विषम राशिगत राहु कम सन्तान देता है, उनकी मृत्यु जल्दी कराता है। यदि अन्य प्रबल योगो के कारण सन्ताने जीती भी है। जातक स्वयं पाचन क्रिया व आंत से सम्बन्धी रोग से ग्रस्त हो सकता है।