I”श्री महाकाल की पावन निश्रा और पलाश विधि”
पाटन में महाकाल धाम के बाद अब एक नया युग प्रारंभ हुआ। जहाँ पहले लोग शापित जीवन जी रहे थे, वहाँ अब एक परिवर्तन आया। कई लोग जिन्होंने पितृ श्राप, अंगारक दोष, विवाह में विघ्न, संतान की मृत्यु या संतान प्राप्ति में विघ्न के कारण दुख भोगे थे, वे सब श्री महाकाल अमलेश्वर के दर्शन करने आए।
इनमें जैन संत विष्णुप्रभ ने विशेष निर्देश दिए, जो केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कर्मकांडों और शास्त्रों के गहरे ज्ञान में आधारित थे।
संत ने कहा:“यहां श्री महाकाल के आश्रय में पलाश विधि से अज्ञात पितरों का श्राद्ध करें। इस विधि में न केवल पितरों का तर्पण होगा, बल्कि उन सभी दोषों से भी मुक्ति मिलेगी जो जीवन में बुरे परिणाम उत्पन्न करते हैं।”
पलाश विधि — यह एक प्राचीन विधि थी, जिसे विशेष रूप से श्री महाकाल की पूजा में किया जाता था। इसके अंतर्गत पलाश के पत्तों पर घी, तिल, तांबे के पात्र में पवित्र जल और बेलपत्र का संयोजन करके पितरों का श्राद्ध किया जाता और अकल मृत्यु से मृत जीव की एकाेडिस्ट श्राद्ध किया जाता है। यह विधि विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी मानी जाती थी, जिनकी संतान का जीवन संकुचित हो या जो किसी कारणवश संतान प्राप्ति में विघ्न का सामना कर रहे हों।
श्राद्ध की विधि और उसका प्रभाव
जब भक्तों ने पलाश विधि द्वारा अपने अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया, तो उन्होंने महाकाल की कृपा से कई अद्भुत अनुभव प्राप्त किए। जैसे ही विधि समाप्त हुई, उन घरों में आकाश से एक दिव्य ध्वनि गूंजी:
“जन्म-जन्म के दोष समाप्त हुए। जीवन में संतुलन और शांति आई। पितर तृप्त हुए, अब वंश को वृद्धि मिलेगी।”
इसके पश्चात, वह समुदाय जिनके जीवन में संतान न हो पाने की समस्या थी, वे सब एक-एक करके संतान प्राप्ति में सफल हुए। साथ ही जो लोग अपनी संतान की असमय मृत्यु से परेशान थे, वे अब स्वस्थ संतानों के माता-पिता बने। विवाह में आ रही रुकावटें भी समाप्त हो गईं, और सुख-शांति का वास होने लगा। घरों में समृद्धि और खुशहाली का वातावरण छा गया।
वृद्धि और यश:
जिन्होंने पलाश विधि द्वारा श्राद्ध किया था, उनके वंश में अब निरंतर सुख और समृद्धि का प्रवेश हुआ। उनके घरों में हर वर्ष नवीन संतान का आगमन हुआ, और उनके वंश में वृद्ध, नायक, और संत पुरुष पैदा होने लगे। यद्यपि वे जैन धर्म का पालन करते थे, लेकिन इस विधि के कारण उनके घर में वृक्षों की शाखाओं की तरह उन्नति और वृद्धि होती गई। संतों ने कहा:
“श्री महाकाल की कृपा से, अब इस वंश की ओर कोई भी दुर्भाग्य नहीं बढ़ सकता। इस वंश का नाम अब न केवल पाटनपुरी में, अपितु समस्त भारतवर्ष में प्रसिद्ध होगा
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