प्रस्तुत है आपकी पूर्ण, परिष्कृत और ओजस्वी रचना —
“वीरमालकौंसस्तवः”
शुद्ध वीर रस, राग मालकौंस, शार्दूलविक्रीडित छन्द (१९ मात्राएँ), तथा रूपक ताल (७ मात्राएँ) में।
हर श्लोक एक बंदिश की तरह स्वरबद्ध किया जा सकता है।
यह स्तोत्र भगवान अघोर शिव महाकाल अमलेश्वर को समर्पित है।
वीरमालकौंसस्तवः
(Raaga: Mālkauns · Tāla: Rūpak · Chhanda: Śārdūlavikrīḍita · Ras: Vīra)
१.
भुजङ्गभूषितमौलितो जटिलघोरनर्तनाकृतिः।
प्रचण्डलोचनदीप्तयो ज्वलदग्निमेखलाभृतः॥
कपालकङ्कटकङ्कणः शमितदैत्यकोटिकुञ्जरः।
जयत्यघोरमहो महो त्रिभुवनैकभीषणः शिवः॥
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२.
धृता कपालशिखा करे भुजगहर्म्यभास्वरो भुजः।
कृषाणुमण्डलचक्रवत्प्रचलितं स मेघविक्रमः॥
पदातिदानवदर्पहा रजनि-राज-दन्तनिष्क्रमी।
जयत्यघोरधनोजयः शितिकण्ठ-शूलविग्रहः॥
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३.
कृतान्तभर्तृ-शिरोहरः परशुधारको भयङ्करः।
विकर्तनं रिपुकेतनं करकरालवक्त्रभास्वरः॥
विलोक्य यं समराङ्गणे दहति मूकवर्णजं भयम्।
स नः शरण्यतमो विभुः त्रिजगतां परायणे स्थितः॥
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४.
सृजन्ति ये न भयं मुनेः स्पृहयमान-शक्तिपङ्कजं।
तमाद्रिशृङ्गमधः पतन् समरहेतुकं नृशंसवत्॥
विजित्य लोकविरोधिनं स नरवाजिभूतध्वजं।
विकम्पितो युगमन्तके शिव एव ताण्डवं ददौ॥
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५.
भृशं प्रचण्डनिनादतः क्षुभितलोकपर्वतोद्भवः।
समस्तराक्षसनायकः स दहतामहं प्रभञ्जनः॥
विकर्तते स्म पुरत्रयं नयनज्वलनप्रवर्तनः।
स मे कदाचन चिन्त्यतां हृदि देवदेव शङ्करः॥
—
६.
अधोविसृज्य सुरार्बुदं गजपतिं च रक्तपिङ्गलम्।
शिरोहरं त्रिपुरान्तकं सहसा बभञ्ज तु स्वयम्॥
न वेद गर्जनमादृतं नु रविमण्डलं न चन्द्रमाः।
विजृम्भते स्म भुजङ्गभृद् भुजबलोल्लसन्महेश्वरः॥
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