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विंशोत्तरी दशा पद्धति,जानें समय और फल…

विंशोत्तरी दशा पद्धति,जानें समय और फल…

विंशोत्तरी दशा पद्धति के विषय में अनुभव

बृहस्पति और शुक्र दोनों एक-दूसरे से शत्रुवत हैं। एक देव गुरू है और दूसरा दानव गुरू है। शुक्र की प्रत्यंतर दशा, बृहस्पति की महादशा या बृहस्पति की प्रत्यंतर दशा, शुक्र की महादशा पारिवारिक सुख-शान्ति, समृद्धि तथा स्वास्थ्य हेतु अशुभ होती है किन्तु दोनों ग्रहों में से कोई एक अशुभ राशि या भावगत हो। यदि दोनों ग्रह शुभ भावों में या राशिगत हो और केन्द्र या त्रिकोण में एक-दूसरे से स्थित हों, तो इनकी दशा-भुक्ति अति शुभ फल प्रदान करती है। बृहस्पति और शुक्र के अधिपत्य पर भी विचार आवश्यक है।

समय की सत्ता और फलकथन

समस्त ग्रहों में बुध अत्यन्त शीघ्र परिणाम प्रदान करता है। बुध के विषय में अग्रांकित श्लोक में उल्लेख है –
हास्यप्रियः पित्तकफानिलात्मा सद्यःप्रतापी ननु पुंश्चलश्य।
बुध विनोदप्रिय स्वभाव का है। तीनों हास्यप्रिय, शक्ति, वात, कफ व पित्त, नपुंसक और अति शीघ्र परिणाम प्रदान करने वाला ग्रह है। यदि बुध किसी शुभ भाव का स्वामी हो, जैसे पंचम या नवम भाव और अति बली भी हो, यह अपनी दशा के प्रारम्भ होते ही सौभाग्य शीघ्र ही प्रदान करता है। इसी प्रकार से, यदि बुध पापाक्रांत होकर अष्टम भावगत हो, या अष्टमेश हो, तो शीघ्र मृत्यु प्राप्त होती है। शीघ्रातिशीघ्र परिणामों की प्राप्ति के लिए ग्रह के बल पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि पापी ग्रहों का प्रभाव बुध पर अधिक है तो प्रतिकूल परिणाम शीघ्रता से प्राप्त होते है। इसी प्रकार से यदि शुभ ग्रहो का प्रभाव बुध पर अधिक है, तो अनुकूल परिणाम शीघ्रता से प्राप्त होते हैं।
उदाहरणार्थ- सप्तम भाव, सप्तमेश और इसका कारक यदि बुध हो, तो विवाह अतिशीघ्र अर्थात् कम आयु में हो जाता है।

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दशा

1. जातक जिस ग्रह द्वारा शासित हो, उस ग्रह की सूक्ष्म प्रत्यंतर दशा, महादशा के स्वामी को अवश्य प्रभावित करती है। अर्थात् बुध की महादशा में मंगल की प्रत्यंतर दशा में, मंगल बुध के प्रभाव को अवश्य क्षीण करता है।
2. दशा-मुक्ति स्वामी यदि उसी भाव में स्थित हो, तो अवश्य प्रतिकूल परिणाम प्राप्त होते हैं।
3. शनि और शुक्र की युति सदैव अशुभ फल प्रदान करती है।
4. शनि और राहु की युति भी सदैव अशुभ फल प्रदान करती है।
5. राहु यदि केन्द्र अथवा त्रिकोण के स्वामी के साथ स्थित हो, तो अतिउत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं, जिस भाव का वह अधिपति हो।
6. महादशा के स्वामी को लग्न मानकर, जन्मांग का निर्माण करके दशामुक्ति का सटीक भविष्य कथन करना चाहिए। इसी प्रकार से गहन अध्ययन हेतु अति सूक्ष्म प्रत्यंतर दशा को सूक्ष्म प्रत्यंतर दशा स्वामी को लग्न मानकर, अन्य तालिका में इंगित करना चाहिए, ताकि सटीक एवं सत्य दशा-भुक्ति का फल प्राप्त हो सके।
7. मंगल-राहु, मंगल-शनि तथा राहु-शनि की सप्तम भाव में स्थिति वैवाहिक जीवन में विनाश की स्थिति उत्पन्न करती है। इसमें मृत्यु, पार्थक्य, वैधव्य तथा दुर्घटना होती है। इसके लिए हमारी कृति ’’वैवाहिक सुख:ज्योतिषीय सन्दर्भ’’ तथा ’’ए कम्पेंडीयम आॅफ मैरिज’’ का सन्दर्भ लिया जा सकता है।
8. यदि सन्तान की मृत्यु पाॅच वर्ष के भीतर हो, तो माता के दुर्भाग्य के कारण, यदि पाॅच से बारह वर्ष के भीतर सन्तान की मृत्यु हो, तो पिता के दुर्भाग्य के कारण तथा बारह वर्ष से अधिक आयु में मृत्यु हो, तो जातक के स्वयं के दुर्भाग्य के कारण मृत्यु होती है।
9. सूर्य और बृहस्पति की युति अतिउत्तम योग निर्मित करती है तथा उस भाव को बल प्रदान करती है।

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