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गुरू पूर्णिमा व्रत –

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गुरू पूर्णिमा व्रत

हिन्दी मास की अंतिम तिथि को पूर्णिमा कहा जाता है इस दिन चंद्रमा का पूर्ण रूप होता है जिसका धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व माना गया है। चूॅकि भारतीय शास्त्र में चंद्रमा का महत्वपूर्ण स्थान माना गया है अतः पूर्णिमा को बहुत शुभ एवं मंगलकारी तिथि माना जाता है। पूर्णिमा के दिन स्नान, दान का विषेष महत्व दिया गया है और इस दिन धर्मकर्म करने से जीवन में पुण्य की प्राप्ति होने से जीवन के कष्ट होते हैं तथा सुखसमृद्धि प्राप्त होती है ऐसी मान्यता भारतीय दर्षन में है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा में कुल गुरू या गुरू की पूजा का विधान है। माना जाता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा में स्नान कर अपने गुरू का पूजन कर दान करने से जीवन से जीवन में अषिक्षा समाप्त होकर कष्ट समाप्त होकर मन वांछित फल की प्राप्ति हेाती है। भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि बिना गुरू के मैं प्राप्त नहीं होता। गंगाजी या किसी नदी तालाब में सबसे पहले नियमपूर्वक पवित्र होकर स्नान करने के उपरांत सफेद कपड़े पहनें और आचमन करें। इस के बाद व्रत प्रारंभ करने हेतु ‘उॅ नमो नारायण’ मंत्र का उच्चारण करें। जिनके मन में अषांति, तनाव तथा भ्रम की स्थिति होती है उन्हें पूर्णिमा का व्रत विषेष शुभ फलदायी होता है ऐसी ज्योतिषीय मान्यता है। इस पूर्णिमा में गुरू का पूजन तथा आरती कर एवं सफेद चीजों के दान के उपरांत पारण करने से मनोकामना की पूर्ति होती है।

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