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शिवलिंग पर जल अर्पण की सही प्रक्रिया?

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सनातन धर्म में भगवान शिव को अत्यंत सरल, करुणामय और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माना गया है। उन्हें भोलेनाथ, आशुतोष और महादेव जैसे नामों से जाना जाता है। भगवान शिव की पूजा का सबसे प्रमुख और प्राचीन स्वरूप शिवलिंग है। शिवलिंग पर जल अर्पण करना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक अर्थ छिपा हुआ है। जल अर्पण की यह विधि शिवभक्तों के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है।

शिवलिंग का धार्मिक महत्व

शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। यह सृष्टि की उत्पत्ति, संरक्षण और संहार—तीनों का प्रतिनिधित्व करता है। स्कंद पुराण, लिंग पुराण और शिव पुराण में शिवलिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। शिवलिंग को ऊर्जा का केंद्र माना गया है, जहाँ ब्रह्मांडीय शक्ति निरंतर प्रवाहित होती रहती है।

शिवलिंग के तीन भाग माने जाते हैं—

  • ब्रह्मा (सृजन)
  • विष्णु (पालन)
  • महेश (संहार)

जल अर्पण के माध्यम से भक्त अपनी भावनाएँ, इच्छाएँ और कष्ट भगवान शिव को समर्पित करता है।

शिवलिंग पर जल अर्पण का शास्त्रीय आधार

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था, जिससे उनका शरीर अत्यधिक तप्त हो गया। देवताओं और ऋषियों ने उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए शिवलिंग पर जल अर्पण किया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

शिव पुराण में कहा गया है—

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“जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।”

जल अर्पण का आध्यात्मिक अर्थ

जल जीवन का प्रतीक है। जब भक्त शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अहंकार, क्रोध, मोह और नकारात्मक भावनाओं को त्यागने का संकल्प करता है। यह एक प्रकार का आत्मशुद्धि का माध्यम है।

जल की निरंतर धारा यह दर्शाती है कि—

  • जीवन में निरंतरता बनी रहे
  • मन शांत और स्थिर हो
  • विचार पवित्र हों

शिवलिंग पर जल चढ़ाने का सही तरीका

कभी भी मंदिर में जल चढ़ाने जाए तो सबसे पहले शिवजी के दाहिनी तरफ विराजमान गणेश जी पर जल अर्पित करें. इसके बाद बाईं ओर कार्तिकेय जी पर जल अर्पण करना चाहिए. इसके बाद शिवलिंग के बीच में विराजमान अशोक सुंदरी पर जल चढ़ाना चाहिए, फिर माता पार्वती, इसके बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए. शिवजी के बाद नाग देवता वासुकी पर जल अर्पित करना चाहिए. आखिर में नंदी महाराज पर जल अर्पित करना चाहिए, जल को बहुत तेज़ धार में नहीं डालना चाहिए, बल्कि धीरे-धीरे और निरंतर प्रवाह के साथ शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए। ध्यान रहे कि जल की धारा बीच में टूटे नहीं, क्योंकि निरंतर बहता जल जीवन की निरंतरता और साधना की स्थिरता का प्रतीक माना गया है, इस प्रक्रिया के दौरान मन में केवल भगवान शिव का स्मरण होना चाहिए और “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जप करते रहना चाहिए।

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जलाभिषेक करने के बाद तीन तालियों का महत्व

शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के बाद तीन तालियां भी बजाई जाती है. बहुत से लोगों को इसका मतलब भी नहीं पता होता है कि आखिर तीन तालियां क्यों बजाई जाती है. दरअसल पहली ताली का अर्थ होता है कि हम शिवजी को बता रहे हैं कि हम आपके शिवालय में उपस्थित हैं.

दूसरी ताली का अर्थ होता है कि, शिवजी आप हमारे ऊपर आशीर्वाद बनाए रखना. तीसरी ताली का अर्थ होता है कि महादेव आप हमारी सभी दुख-पीड़ा को खत्म कर दें. इसके बाद आपको दोनों हाथ उठकर हर-हर महादेव का जयकारा लगाना है|

शिवलिंग पर जल चढ़ाते वक्त इन बातों का भी रखें खास ध्यान

  • शिवलिंग पर जलाभिषेक करते समय साफ कपड़े धारण किए हो.
  • ऊँ नम शिवाय मंत्र के जाप के साथ शिवलिंग का जलाभिषेक करें.
  • जलाभिषेक रुक-रुककर या झटके में न करें, बल्कि आराम से शिवलिंग का जलाभिषेक करें.
  • शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय दाएं हाथ का इस्तेमाल करना चाहिए.
  • शिवलिंग पर भूलकर भी तुलसी का पत्ता अर्पण नहीं करना चाहिए.
  • जल अर्पण करते समय बात-चीत न करें।
  • स्टील के पात्र का उपयोग न करें (तांबा, चांदी, कांसे का पात्र उत्तम)
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शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लाभ

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिवलिंग पर जल चढ़ाने से कुंडली में चंद्र ग्रह मजबूत होता है, जिससे मानसिक स्थिरता, भावनात्मक संतुलन और निर्णय क्षमता में सुधार आता है। राहु और केतु से संबंधित दोषों में भी जलाभिषेक को अत्यंत प्रभावशाली उपाय माना गया है। जिन जातकों को बार-बार मानसिक भ्रम, डर या अनचाहे विचार परेशान करते हैं, उनके लिए नियमित शिव जलाभिषेक विशेष लाभकारी सिद्ध होता है।शिवलिंग पर जल चढ़ाने का एक बड़ा लाभ शारीरिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। शिव को आयुर्वेद और योग का अधिपति माना गया है, इसलिए उनकी पूजा से शरीर में संतुलन बना रहता है। जल की शीतलता और मंत्र जाप की कंपन मिलकर तनाव को कम करती है, जिससे उच्च रक्तचाप, अनिद्रा और मानसिक थकान जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। यह साधना व्यक्ति को आंतरिक रूप से सुदृढ़ बनाती है।

निष्कर्ष
शिवलिंग पर जल अर्पण केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक साधना है। यह मन, शरीर और आत्मा—तीनों को शुद्ध करता है। सही विधि, श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया जल अर्पण जीवन में शांति, संतुलन और शिव कृपा प्रदान करता है।
जो भक्त निस्वार्थ भाव से “ॐ नमः शिवाय” का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, उसके जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता।