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शत्रु, रोग, भय, अकाल मृत्यु और दुर्भाग्य का नाश करने वाला आदित्य हृदय स्तोत्र को कैसे सिद्ध करें

“आदित्यहृदय स्तोत्र” — यह स्वयं श्रीराम को महर्षि अगस्त्य द्वारा दिए गए एक रहस्यमय स्तोत्र का रूप है, जो सूर्य के साक्षात् ब्रह्मरूप का स्तवन है। इसका पुरश्चरण करने से न केवल मानसिक बल, आत्मिक तेज और आयु बढ़ती है, बल्कि शत्रु, रोग, भय, अकाल मृत्यु और दुर्भाग्य का नाश होता है।


🔆 आदित्यहृदय स्तोत्र पुरश्चरण — सम्पूर्ण साधना विधि


🪔 1. मंत्र / स्तोत्र पाठ

आदित्यहृदय स्तोत्रम् – कुल श्लोक: 31
आरंभ — “ततो युद्धपरिश्रान्तं…”
अंत — “जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः॥”

👉 यह पूरे रूप में ही एक मंत्रात्मक स्तोत्र है। इसकी एक आवृत्ति = 1 पाठ मानी जाती है।


🧿 2. पुरश्चरण उद्देश्य / लाभ:

उद्देश्य फल
रोग से मुक्ति आरोग्य और बल की वृद्धि
शत्रु बाधा निवारण भय और शत्रु का नाश
आत्मबल व तेजस प्राप्ति तेजस्विता, आत्मविश्वास, निर्णयशक्ति
सूर्य/पितृ दोष निवारण सूर्य कृपा, कर्म-फल शुद्धि
आयु वृद्धि / मानसिक दृढ़ता दीर्घायु, निर्भयता, बौद्धिक स्पष्टता

🕉️ 3. पुरश्चरण मंत्र संख्या निर्धारण:

  • आदित्यहृदय के 31 श्लोक हैं →
    परंपरा अनुसार: 1000 पाठ = एक लघु पुरश्चरण,
    10,000 पाठ = पूर्ण पुरश्चरण / मंत्र सिद्धि।


🔱 4. कब करें? (काल निर्धारण)

समय विशेषता
सूर्योदय के समय सर्वोत्तम (6:00 से 7:30 AM)
संध्या के समय वैकल्पिक
ग्रहण/सूर्य विशेष तिथि विशेष फलप्रद (सप्तमी, रवि पुष्य योग आदि)

👉 व्रत रहकर रविवार को आरंभ करें।


📍 5. कहाँ करें? (स्थान चयन)

  • शांत, शुद्ध एकांत स्थान

  • सूर्य की किरणें जहाँ सीधे आती हों (पूर्वाभिमुख खिड़की)

  • यदि संभव हो तो छत पर या नदी/तालाब किनारे बैठें


🧘‍♂️ 6. साधक की तैयारी

विषय निर्देश
आसन कुशा, मृगचर्म या ऊन का आसन (पूर्वाभिमुख बैठें)
माला रुद्राक्ष, लाल चंदन या स्वर्ण माला (108 मनकों की)
व्रत साधना काल में ब्रह्मचर्य, सात्त्विक आहार, मौन
अवधि 21, 40, 84 या 108 दिन तक (या लक्ष्य अनुसार)

🪔 7. साधना विधि (प्रतिदिन)

● पूर्व विधि:

  1. प्रातः स्नान करें, श्वेत वस्त्र पहनें

  2. सूर्य को अर्घ्य दें —

    “ॐ सूर्याय नमः” कहते हुए ताम्रपात्र से जल अर्पण

  3. आसन पर बैठें, दीपक व अगरबत्ती जलाएं

  4. संकल्प लें:

    “मैं अमुक व्यक्ति, अमुक उद्देश्य से, आदित्यहृदय स्तोत्र का इतने दिनों में इतने पाठों का पुरश्चरण कर रहा हूँ।”

● मुख्य साधना:

  • आँखें बंद करके 2 मिनट ध्यान करें

  • फिर 31 श्लोकों का पाठ 1 आवृत्ति गिनें

  • प्रतिदिन नियत संख्या के पाठ करें

● उत्तरकर्म:

  • “ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः” 12 बार कहें

  • भोग अर्पण करें (गुड़, गेहूँ, लाल फल)

  • प्रार्थना करें —

    “सर्वरोग निवारणं मे देहि सूर्यदेव नमोऽस्तुते।”


📿 8. पाठ संख्या तालिका:

अवधि (दिन) प्रतिदिन पाठ कुल पाठ साधना समय (औसतन)
21 दिन 100 2100 ~1.5 घंटे
40 दिन 250 10,000 ~2 घंटे
84 दिन 120 10,080 ~1.5 घंटे

यदि 108 बार आदित्यहृदय का पाठ प्रतिदिन करें, तो लगभग 1.5–2 घंटे लगते हैं।


🔥 9. होम, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मभोज (यदि पूर्ण पुरश्चरण किया जाए)

  • होम: 10% पाठों के बराबर “आदित्याय नमः स्वाहा” से तिल/घी होम करें

  • तर्पण: सूर्य के सामने जल+तिल+अक्षत से

  • मार्जन: वही जल स्वयं पर छिड़कें

  • ब्राह्मभोज: 5 ब्राह्मण/साधु को भोजन या वस्त्रदान


🚫 10. सावधानियाँ:

  • स्तोत्र का पाठ स्पष्ट उच्चारण से करें

  • एक दिन भी न चूकें — नित्य करें

  • शुद्धता, मौन, आस्था रखें

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आदित्यहृदय स्तोत्र

विनियोग

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्यहृदयभूतो

भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास

ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।

ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो:। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।

करन्यास

ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवस्‍वते अनामिकाभ्यां नमः।

ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि अंगन्यास

ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।

ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।

इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

आदित्यहृदय स्तोत्र

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।

उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।

येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

‘सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।’

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।

चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

‘इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।’

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।

पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

‘भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।’

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।

एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

‘सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।’

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।’

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