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किन ग्रहों के कारण शरीर में रोग होते है और उसके उपाय

किन ग्रहों के कारण शरीर में रोग होते है और उसके उपाय

रोग कारक ग्रह जब गोचर में जन्मकालीन स्थिति में आते हैं और अंतर-प्रत्यंतर दशा में इनका समय चलता है तो उसी समय रोग उत्पन्न होता है। यदि षष्ठेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश तथा रोग कारक ग्रह अशुभ तारा नक्षत्रों में स्थित होते हैं तो रोग की चिकित्सा निष्फल रहती है। यदि षष्ठेश चर राशि में तथा चर नवांश में स्थित होते हैं तो रोग की अवधि छोटी होती है। द्विस्वभाव में स्थित होने पर सामान्य अवधि होती है। स्थिर राशि में होने पर रोग दीर्घकालीन होते हैं। आइए रोगों के ग्रहों के ज्योतिषीय उपचारों पर एक दृष्टि डालें। सूर्य नेत्र भाव में सूर्य, चंद्र या शुक्र अकेले या युत हो तो नेत्र विकार उत्पन्न करता है।

शुक्र की युति चंद्र या सूर्य के साथ हो तो वह स्थायी नेत्र विकार उत्पन्न करता है जैसे- वर्णांधता, निशांधता। सूर्य और शनि की युति समलबाई, सूर्य और राहु की युति आंखों में अल्सर उत्पन्न करती है। शुक्र और चंद्रमा की युति से मोतियाबिंद होता है। सूर्य या चंद्र के साथ नीच या वक्री मंगल नेत्र भाव में स्थित होने पर नेत्र की हानि करता है। दाहिने और बायें नेत्र में रोगकारक शुक्र की स्थिति यदि चंद्रमा से दृष्ट है तो मायोपिया नामक रोग होता है। उपचार: हृदय रोग से रक्षा हेतु सूर्य और चंद्र को अघ्र्य दें एवं आदित्य स्तोत्र का पाठ 40 दिन तक करें। नेत्र रोग से बचाव हेतु सूर्य और चंद्र को अघ्र्य दें एवं चाक्षुषी विद्या का पाठ 40 दिन तक करें। नोट: सूर्याघ्र्य सामग्री – तांबे का लोटा, रोली, लाल फूल एवं दूर्वा। चंद्राघ्र्य सामग्री – चांदी का बर्तन, सफेद फूल एवं चावल।

सूर्य से संबंधित सभी रोगों के निवारण हेतु तुलादान – शरीर के भार के बराबर गेहूं तौलकर रविवार को दिन के 12 बजे ब्राह्मण को दान करें। चंद्रमा चंद्रमा से शीत प्रकोप, स्नोफीलिया आदि हो सकते हैं। चंद्र और बुध की युति षष्ठ या द्वितीय भाव में होने पर नजला या नासूर तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में विकार उत्पन्न हो जाता है। यदि चंद्र छठे, सातवें और आठवें भाव में षष्ठेश से दृष्ट हो तो प्रमेह, मधुमेह, अतिमूत्र आदि रोग उत्पन्न होते हैं। उपाय: चंद्राघ्र्य, रजतदान स्नोफीलिया, खांसी में एवं शर्करा कुंभ दान शुगर में करें। बहुमूत्र में एक लीटर (मौसम के अनुसार ठंडा या गर्म) जल पांच मिनट तक अनवरत धारा में प्यूबिक ग्लैंड और जननांग के मध्य स्थान में गिराएं। इससे शुक्र पर नियंत्रण तथा अनेक प्रकार के जननांगीय रोग जैसे ल्यूकोरिया, यूरीनरी ट्रैक इनफेक्शन (यू. टी. आइ.) दूर होंगे। (यह प्रयोग स्नान के पूर्व करें।) मंगल उच्च का मंगल छठे, आठवें और बारहवें भावों में उच्च रक्तचाप उत्पन्न करता है। नीच, अस्त एवं शत्रुक्षेत्री मंगल निम्न रक्तचाप उत्पन्न करता है। मंगल राहु की युति छठे भाव में होने पर लाल कुष्ठ रोग तथा चंद्र राहु की युति छठे भाव में होने पर श्वेत कुष्ठ रोग उत्पन्न होता है। केतु की षष्ठेश से युत होकर छठे भाव में स्थिति या छठे भाव पर उसकी दृष्टि हो तो अपरस और एक्जिमा रोग उत्पन्न होते हैं। यदि चतुर्थ भाव के प्रथम दे्रष्काण पर दृष्टि हो तो दहेड़ी रोग होता है। उपाय: 1. भोजन का प्रथम ग्रास श्वान बलि के लिए निकालें। 2. चंद्र, राहु की युति मंगल से होने पर श्वान को दूध पिलाएं। 3. कुष्ठ रोग होने पर खैर की लकड़ी से 40 दिन तक समिधा हवन करें। लटजीरा एवं तुलसी की पत्तियां बराबर मात्रा में गंगाजल में पीस कर पलाश के पत्ते पर रखें और पीड़ित स्थान पर लेप करें। 4. हीमोग्लोबिन में उतार चढ़ाव, एनीमिया से रक्षा के लिए मंगलवार को प्रातः लाल कपड़ा ओढ़कर बहते जल (नदी) में मसूर की दाल प्रवाहित करें। बुध बुध मुख्य रूप से माइग्रेन रोग देता है। बुध यदि द्वादश भाव या लग्न में सूर्य से युति करे या सूर्य से दृष्टि संबंध बनाए तो मुख्य रूप से तीव्र माइग्रेन होता है। उपाय: कांसे के पात्र में घी भर कर उसके ऊपर साबुत मूंग की दाल ढक कर बुधवार को सिर के चारों ओर छः बार घुमाकर ब्राह्मण को दान दें।

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