अर्थात् धारण करने वाले को धर्म कहते हैं, धर्म प्रजा को धारण करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म व्यक्ति ही नहीं धारण करता बल्कि स्वयं धर्म भी व्यक्ति को धारण किए हुए है।
आहार निद्रा भय मैथुनंच सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणम्।
धर्मों हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना: पशुभिर्समाना॥
वैशेषिक दर्शन के प्रणेता कणाद धर्म को वैशेषिक सूत्र में इस प्रकार परिभाषित करते हैं-
यतोभ्युदयनिरूश्रेयस सिद्धरू स धर्म:।
अर्थात् जिससे अभ्युदय (सांसारिक सुख) और निरूश्रेयस (आध्यात्मिक कल्याण) प्राप्त हो, वही धर्म है। धर्म का यह लक्षण स्पष्ट रूप से भौतिक और आध्यात्मिक पक्षों में समन्वय स्थापित करता है। निश्चित ही जो धर्म आध्यात्मिकता की ओर ध्यान न देकर केवल भौतिक उन्नति पर ही अपना ध्यान रखता है, वह एकांगी है और धर्म नहीं है।
अथाष्टा वात्मार्गुणारू दया सर्वभूतेषुरू क्षान्तिरनसूया शौच मता मासौ मंगलमय कार्यण्य स्पृहेति।
अर्थात् सब प्राणियों पर दया, क्षमा, अनुसूया, शुचिता, अतिश्रम वर्जन, शुभ में प्रवृत्ति, दानशीलता तथा निलोभता, ये आठ आत्मगुण हैं अर्थात धर्म हैं।
धृति: क्षमा दमोस्तेयं
शौचमिन्द्रिनयनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं
धर्म लक्षणम्॥
अर्थात् धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, आंतरिक व बाह्य शुद्धि, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, शिक्षा, सत्य और क्रोध न करना धर्म के दस लक्षण हैं।
महाभारत में धर्म को अर्थ और काम का स्रोत माना गया है –
उध्र्वबाहुर्विरौम्येष, न च कश्चित शृणोति मे।
धर्मादर्थश्च कामश्च, स किमर्थ न सेव्यते॥
अर्थात् मैं बाहों को उठाकर जोर-शोर से चिल्ला रहा हूँ, किंतु मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं, फिर उस धर्म का किसलिए पालन नहीं किया जाता?
गीता में भी धर्म के महत्व को स्वीकार किया गया है। गीता के अठारहवें अध्याय में कृष्ण अर्जुन को धर्म का महत्व बतलाते हुए कहते हैं-
श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्॥
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:।।
धर्म के इस महत्व को पुराणों में भी स्वीकार किया गया है। पुराणों का कहना है कि अधर्मी (अपने विवेक से च्युत) पुरुष यदि काम और अर्थ संबंधी क्रियाएं करता है तो उसका फल बांझ स्त्री के पुत्र जैसा होता है अर्थात् उनसे किसी प्रकार के कल्याण की सिद्धि नहीं होती।
अर्थ: हिंदू जीवन दर्शन में अर्थ को दूसरा पुरुषार्थ कहा गया है। अर्थ का शाब्दिक अर्थ वस्तु या पदार्थ है। इसमें वे सभी भौतिक वस्तुएं आती हैं जिन्हें जीवन यापन के लिए मनुष्य अपने अधिकार-क्षेत्र में रखना चाहता है। अर्थ से ही मनुष्य अपने उदर की पूर्ति करता है। कत्र्तव्य-निर्वहण में अर्थ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अर्थ में केवल धन या मुद्रा ही नहीं बल्कि वे सभी चीजें शामिल हैं जिनसे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। भारत में कभी भी अर्थ को उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा गया। बल्कि इसे धर्म का साधन कहा गया है।
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