Home Articles अन्य लेख
अन्य लेख

अङ्गारकस्तोत्रम्

॥ अङ्गारकस्तोत्रम् ॥

अस्य श्री अङ्गारकस्तोत्रस्य ।

विरूपाङ्गिरस ऋषिः ।

अग्निर्देवता ।

गायत्री छन्दः ।

भौमप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

अङ्गारकः शक्तिधरो लोहिताङ्गो धरासुतः ।

कुमारो मङ्गलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥ १॥

ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः ।

विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥ २॥

सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः ।

लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥ ३॥

रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः ।

नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः ॥ ४॥

आप इस लेख का आधा भाग पढ़ चुके हैं

आगे पढ़ने के लिए लॉगिन करें। खाता बनाना पूरी तरह निःशुल्क है – Google या मोबाइल OTP से, एक मिनट में।

लॉगिन करें और आगे पढ़ें नया यूज़र? निःशुल्क खाता बनाएँ

क्या आपके जीवन में कोई प्रश्न है?

अनुभवी ज्योतिषियों से कुंडली, विवाह, करियर और वास्तु पर व्यक्तिगत परामर्श लें।

अभी परामर्श लें