॥ अङ्गारकस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री अङ्गारकस्तोत्रस्य ।
विरूपाङ्गिरस ऋषिः ।
अग्निर्देवता ।
गायत्री छन्दः ।
भौमप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
अङ्गारकः शक्तिधरो लोहिताङ्गो धरासुतः ।
कुमारो मङ्गलो भौमो महाकायो धनप्रदः ॥ १॥
ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः ।
विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः ॥ २॥
सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः ।
लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः ॥ ३॥
रक्तमाल्यधरो हेमकुण्डली ग्रहनायकः ।
नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः ॥ ४॥
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