आज की दौड़भाग भरी जिंदगी में कई लोग अंदर से दुखी हैं लेकिन बाहर से खुद को खुश दिखाने की कोशिश करते हैं। ये ही लोग दिखावा करने के अलावा खुद को जबरदस्ती खुश रखने की भी कोशिश करते हैं, लेकिन सदगुरू जग्गी वासुदेव के अनुसार इस तरह से बनावटी जीवन जीने में बहुत ऊर्जा खत्म हो जाती है। जिससे कोई भी इंसान अंदर से या पूरी तरह खुश नहीं रह सकता।
आप जितना निराश महसूस करेंगे, उतना ही लोगों के साथ की जरूरत आपको महसूस होगी। लेकिन आप जितना खुश होंगे, आप भीतर से उतना ही उल्लासित और उत्साहित महसूस करेंगे। तब आपको लोगों के साथ की जरूरत उतनी ही कम महसूस होगी। किसी भी व्यक्ति में उल्लास को पैदा नहीं किया जा सकता। अगर यह ओढ़ा हुआ या कृत्रिम रूप से बनाया उल्लास है तो बेशक आपको लोगों के साथ की जरूरत महसूस होगी। अक्सर लोग उल्लास या आनंद का मतलब संगीत सुनना, नाचना और झूमना समझते हैं। जबकि आप शांति से बैठकर भी आनंद महसूस कर सकते हैं।
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