देश भर में योग याधना की गहराइयों को उजागर करने वाले शिविरों का बड़े स्तर पर आयोजन होता है। अनेक संस्था के योगाचार्यों द्वारा हर स्तर के साधकों को योगासन कराए जाते हैं। साथ ही सैद्धांतिक रूप से योगदर्शन के प्रवचनों एवं व्याख्यानों का भी श्रवण कराया जाता है।
हमारे शास्त्रों में जीवन उत्कृष्टि के तीन मार्ग बताए हैं। ज्ञान, कर्म और भक्ति। समझदारी से कर्म करेंगे तो फल अच्छे आएंगे। कर्म से उपलब्धियों के कारण अहंकार आता है। वह भक्ति से समाप्त होता है। भक्ति से जो अकर्मणयता आती है वह कर्म से ठीक होगी। ज्ञान में होश है, कर्म में उपलब्धि और भक्ति में समर्पण। अतः तीनों ही जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते हैं। पर मानव को तो कर्म करने का अधिकार मिला है। और वास्तव में यह बहुत बड़ा अधिकार है। इसके चार भाग हैं- भाव, इच्छा, कर्म और फल। इन सभी का शोधन योग का विषय है।
हमारी भावनाएं जन्म जन्मांतर के संस्कारों तथा वर्तमान के संपर्कों पर आधारित है। साधना काल में हम बहिमुर्खता से अंतमुर्खता में जब आते हैं और स्वरूप अवस्था ग्रहण करते हैं तो भावनाएं गौण हो जाती हैं। इसी पर निर्भर करती है हमारी इच्छा। इच्छा को नियंत्रित करने का वर्णन पतांजलि योग दर्शन में किया है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’।जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को सीमित करना सीख जाता है तो उसके कर्म भी तदानुसार होने लगते हैं। इच्छा पर ही कर्म आधारित हैं। हम जीवन में वही करेंगे जैसा हम चाहेंगे और वैसी ही उपलब्धि हमें होगी। धन लेना, चाहें धन मिलेगा, वैभव प्राप्त करना चाहें वैभव प्राप्त होगा। कर्म से निवृत्ति चाहें, वह भी मिल जाएगी। साधारण व्यक्ति स्वार्थ पूर्ण कर्म करता है। जब दूसरे भी उससे स्वार्थ व्यवहार करते हैं तो वह सोचने पर मजबूर होता है कि यह ठीक नहीं है।
हमारी भावनाएं जन्म जन्मांतर के संस्कारों तथा वर्तमान के संपर्कों पर आधारित है। साधना काल में हम बहिमुर्खता से अंतमुर्खता में जब आते हैं और स्वरूप अवस्था ग्रहण करते हैं तो भावनाएं गौण हो जाती हैं। इसी पर निर्भर करती है हमारी इच्छा। इच्छा को नियंत्रित करने का वर्णन पतांजलि योग दर्शन में किया है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’।जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को सीमित करना सीख जाता है तो उसके कर्म भी तदानुसार होने लगते हैं। इच्छा पर ही कर्म आधारित हैं। हम जीवन में वही करेंगे जैसा हम चाहेंगे और वैसी ही उपलब्धि हमें होगी। धन लेना, चाहें धन मिलेगा, वैभव प्राप्त करना चाहें वैभव प्राप्त होगा। कर्म से निवृत्ति चाहें, वह भी मिल जाएगी। साधारण व्यक्ति स्वार्थ पूर्ण कर्म करता है। जब दूसरे भी उससे स्वार्थ व्यवहार करते हैं तो वह सोचने पर मजबूर होता है कि यह ठीक नहीं है।
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