अमावस्या की पार्थिव-पूजा (पिंडदान) से श्री महाकाल अमलेश्वर की साक्षात् प्रकट्ता होती है एवं असीम रूप से कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
निष्काम भक्ति: वृद्धा सावित्री का प्रकट् दर्शन
कथासार:
वृद्धा सावित्री पूरे जीवन को पति-पूजन में समर्पित होकर भी विधवा-श्राद्ध से अनियंत्रित व्यथित रहती थी। अमावस्या की रात्रि उसने पार्थिव-पिंडदान किया, अंतःकरण से “महाकालो भव” मंत्र जपा। अचानक मंदिरप्रांगण की घनघोर नीरवता टूटकर, गर्भगुहा से ओजस्वी उज्जवल ज्योति प्रकट हुई। सामने खड़ी शिवलिंग के नेत्र से अमृतसलिलों का झरना गिरा और सावित्री के चरणस्पर्श कर स्वयं बोली—
“नमो महाकाले, तव चरणयोः शरणम्।”
वृद्धा की वृद्धावस्था में ही स्वस्थ्य-बल वृद्धि हुई, जीवन में आनंद-शांति लौटी, और अन्त्येष्टि के बाद परलोकीय पुण्यमार्ग स्पष्ट हुआ।
श्लोकः (विपरीतछन्दः, १९ मात्राः)
अमावस्यायां पिण्डदानकुले, महाकाले स्फुरति विलोचनः ।
भक्ते साक्षात् ददाति मोक्षमार्गं, दुःखहरं च मामणिं ॥
अज्ञानभीत गणिताचार्य: विद्या-विस्तार की प्राप्ति
कथासार:
कुशल गणिताचार्य वैदिकेश्वर को वर्षानुवर्ष सूत्रों की व्याख्या में अव्यवस्था एवं संदेह था। एक अमावस्या, उसने तटवर्ती पिण्डदान कर, गणितसूत्र समाधि के लिए पार्थिव-यज्ञोच्चारण किया। उस रात्रि मंदिरकोण से दिव्यांगना रूपी महाकाली प्रकट हुई और हाथों में अंकगणित-पद्मधराएँ धारण किए, स्वयं समीकरणों का निराकरण दिखाया। जागृत होकर वैदिकेश्वर ने अमलेश्वर से लघुत्रिकोणमिति के सूत्र आत्मसात् किए, बाद में गणित-साहित्यों में क्रांति ला दी।
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